Saturday, September 13, 2014

आज तू जो पास नहीं ...

अजब धुन है। गाने और मन दोनों की। महीनों बीत जाएं, कुछ न सुने। सुनने पे आए तो रुकते न बने। ये ग़ज़ल पिछले बरस एेसे ही सर चढ़ बैठी थी। जैसे-तैसे पल्ला छुड़ाया। आज फिर टाकरा हो गया। टाकरा इसलिए क्योंकि ये टक्कर से कुछ आगे की चीज़ है। सो,  फिर से दर्जनों बार सुनी जाएगी। अब तक शायद दस बार तो सुनी जा चुकी है।
सुनते हुए अक्सर इसे शेयर करने से मैं खु़द को रोक नहीं पाती। इसका एक-एक बोल मुझे इतना क़ीमती और सच्चा लगता है कि रहा नहीं जाता इसके बारे में बात किए बगै़र। ज़ाहिर है कई दोस्तों के पास ये ग़ज़ल पहुंच चुकी है।
मैंने पहली बार इसे कब सुना था...शायद तीन साल पहले। या उसके बाद...कुछ ठीक से याद नहीं। पर इसका एक छोटा टुकड़ा कहीं सुना और फिर ढूंढकर पूरी ग़ज़ल सुनी। पता चला 1967  की पाकिस्तानी फिल्म वक़्त की पुकार से है। नासिर बज़्मी की तर्ज़ पर बोल हैं रईस अमरोहवी के। ये फिल्म फ्लॉप बताई जाती है।
खै़र, हमें फिल्म से ज़्यादा सरोकार नहीं। हां इस ग़ज़ल को सुनते हुए तय करना कठिन हो जाता है कि अल्फ़ाज़ और आवाज़ में से उन्नीस कौन है। बराबर बीस वाले इस जादू में जितना डूबो उतना ही उतरते हैं।
मेहदी हसन साहब की आवाज़ में देखें ... जी रहा हूं तेरे बगै़र भी मैं...यहां कैसी नामोशी है लहजे में, जैसे साथ जीने की क़सम को खा लेने के बाद उसे तोड़ दिया गया हो, जैसे गहरी शर्मिन्दगी दामन पकड़े खड़ी हो....आगे देखें...पी रहा हूं अगरचे प्यास नहीं ...कमाल बात है प्यास नहीं है पर आप पी रहे हैं, ये मजबूरी हर कोई कहां समझ पाता है। ये पीना जिंदगी को जीने जैसा भी तो है।

शामे फु़रक़त है और तन्हाई....यहां सुनिए ये सचमुच की तन्हाई जैसी है। कोई आवाज़ है जो इस तन्हाई को दुकेला कर सके, कंपा देने वाली बात ....और फिर दिलासे के बोल-आ के अब कोई आसपास नहीं। जैसे एक शरारत की बात बहुत उदास सुर में कही जाए और रूह को चैन आ जाए।
कुछ 11 मिनट के इस जादू में मैं बार-बार डूबी हूं।
https://www.youtube.com/watch?v=p7NLB843N0Q

शहनाज़ बेगम की अावाज़ में इसी ग़ज़ल को सुनिए...लगेगा घुंघुरुओं की एक पोटली शहद की कटोरी में डुबोकर देर तक रखी गई है। घुंघरू खुलकर बिखर रहे हैं.। इससे पहले मैंने शहनाज़ बेगम को कभी नहीं सुना। उन्होंने यूं गाया जैसे सामने खड़ी ग़ज़ल को हरा देना चाहती हैं। इतनी मिठास के साथ अल्फा़ज़ को जीने और जीत लेने की जि़द इस तरह कम जगह पाई जाती है। ध्यान दें....शामे फु़रक़त है और तन्हाई....में ये आवाज़ तन्हाई तक जाती है  और जैसे तसल्ली भरा हाथ कंधे पर रखकर कहती है-आ के अब कोई आसपास नहीं ...कमाल है ना।
यहां ये जादू साढ़े तीन मिनट का है ...
 https://www.youtube.com/watch?v=EEDGCz2QyWA

और जब जादू बनाए रखने की ये वजहें सामने हों तो कम से कम आज के लिए बाक़ी चीजों को उठाकर कल पर रखा जा सकता है।



Saturday, June 28, 2014

सपने में भी भेड़ प्‍यासी हैं


बचपन हमारे मन के सबसे अंदर वाले कमरे में रखे संदूक जैसा होता है। बड़े होना उस पर एक ताला लगा देने जैसा है। कई बार हम ताला खोलकर उसमें झांक लेते हैं तो कई बार चाभी को कहीं रखकर भूल जाते हैं। बड़े होते हैं और बुढ़ाते हुए मर भी जाते हैं। संदूक भी यूं ही बंद का बंद हमारे साथ चला जाता है। मुझे ये संदूक बहुत प्रिय है। मैंने इस पर कभी ताला नहीं लगाया। मैं इसमें खूब झांकती हूं। आज दोपहर वाली झपकी भी इस संदूक को छूकर गुज़री और सपने में मैं पहुंची मेरठ में अपने उस घर में जो अब हमारा नहीं है।
मैं दरअसल घर में नहीं पहुंची बल्कि घर के बाहर हूं। भेड़ ही भेड़ और बकरियां मेरा रास्‍ता रोक रही हैं। मैं हॉर्न बजाकर उन्‍हें हटाने की कोशिश करती हूं। वे हटती नहीं। आखिर मैं घर के पीछे वाले मैदान में पहुंचती हूं। मैदान एक नदी बन जाता है। जिसमें पानी की जगह भेड़ और बकरियां भरी हैं। वे मुझे रास्‍ता नहीं देतीं। मेरी आंख खुल जाती है। शदीद प्‍यास मुझे अपने होठों से लेकर गले तक महसूस होती है। काफी देर मैं यूं ही पड़ी रहती हूं। मुझे समझ आता है कि वे सारी भेड़ बकरियां प्‍यासी थीं। काफी देर तक मैं पानी नहीं पीती। ये मेरी कोशिश होती है उनकी प्‍यास में शरीक होने की।
ये सारी भेड़ बकरियां जो आज सपने में आईं, दरअसल मेरे बचपन का सच थीं। हमारे घर से कुछ दूर आर्मी का बूचड़खाना था और वहां काटे जाने के लिए अक्‍सर ट्रकों में भरकर भेड़ बकरियां लाई जाती थीं। ये ट्रक हमारे घर के पीछे वाले उस बड़े मैदान में अनलोड हुआ करते थे जो मेरठ कॉलेज की जमीन थी। ये वही मैदान है जहां किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने अपनी पहली ऐतिहासिक रैली की थी। लेकिन ये सब बाद की बाते हैं। मैं बता रही थी कि कैसे वहां ट्रक भर कर आया करते थे। अक्‍सर गर्मियों की रात को जब ये ट्रक अनलोड होते थे भेड़ो के चिल्‍लाने की आवाजें हमारे घर तक आतीं। कुछ भेड़ें बहुत बूढी तो कुछ गर्भवती तक होती थीं। कई बार बहुत छोटे मेमनों के साथ भी हम उन्‍हें देखा करते थे।
मुझे याद है कि जब जब ट्रक अनलोड होते हमारी मां की टेंशन बढ़ जाती। मैं मेरा भाई और मां हम सब मिलकर उन्‍हें पानी पिलाया करते थे। मां कहतीं...बेचारियां न जाने कब से भूखी प्‍यासी होंगी। जाने कब आखिरी बार पानी नसीब हुआ होगा। मरने से पहले कम से कम पानी तो पी लें। हमारे घर में उन दिनों हैंड पंप हुआ करता था। मैं और मेरा भाई नल चलाकर बारी बारी से बाल्‍टी भरते और मां जाकर उन्‍हें पिलाकर आतीं। ये सिलसिला बुरी तरह थक जाने तक चलता। मां दुआ मांगतीं...अल्‍लाह जल्‍दी से इस इलाके में पानी की लाइन बिछवा दे मैं कम से कम इन्‍हें पेटभर पानी तो पिला सकूं।
फिर...बचपन चला गया। हम उस घर से बहुत दूर आ गए। मैदान अब भी वहीं है। बूचड़ख़ाना भी!  भेड़ बकरियां शायद अब भी वहां आती हों। उस इलाके में अब पाइप लाइन भी आ गई हैं। लेकिन क्‍या उनकी प्‍यास को अब भी वहां कोई महसूस कर रहा होगा....। पता नहीं। मुझे लगता है आज ज़रूर वहां भेड़ प्‍यासी होंगी..... प्‍यास तो शाश्‍वत है ! उन्‍हें पानी कौन देता होगा पता नहीं..पर .मां अब सड़क पर घूमने वाली गायों को पानी पिलाया करती हैं।

Saturday, July 20, 2013

मेरे प्रीतम को अभी परेदस है भाया हुआ

अक्‍सर महसूस होता है, मैं हज़ार बरस की हूं। इन बरसों में जीने मरने वाले हज़ारों लोगों के साथ रह चुकी हूं।  उनकी कितनी बातें हैं जो लगता है सिर्फ़ मुझसे कही जाने वाली थीं,  लेकिन या तो मैं सही जगह मौजूद नहीं थी या वो सब लोग मुझे ढूंढ नहीं पाए। मेरे रहने और सहने की क्‍या हद होगी,  खुद समझ नहीं आता। कितने ऐसे लोग हैं जिनका दर्द मुझे अपने दिल में आज भी महसूस होता है, और फिर लगता कि आखिर क्‍यों ये सब मुझसे बिना मिले चले गए....। कभी लिस्‍ट बना सकी तो बना रखूंगी ताकि शिकायत दर्ज की जा सके। फिलहाल.... ज़ोहराबाई अंबालेवाली से शिकवा दिल पर छाया हुआ है। उनका गाया एक गीत ख़ूब सुना जा रहा है। कई कई बार, लगातार। दिल नहीं भरता पर। http://www.youtube.com/watch?v=kZI4oeZFYYY
जोहराबाई यूं तो अपने पड़ोस अंबाले की ही ठहरीं लेकिन आज उनका पता ठिकाना यहां कौन बता पाता है। ज्‍़यादा से ज्‍़यादा पता चलता है कि वे अपनी बेटी रोशन कुमारी के साथ मुंबई में रहा करती थीं। फिर वही बात, कि मेरे वहां पहुंचने से पहले ही जोहराबाई भी चल निकलीं। भला ये भी कोई बात हुई.....थोड़ा तो इंतज़ार किया होता। कम से कम एक सवाल का जवाब तो देती जातीं...

जो़हराबाई मुझे तुमसे पूछना था कि ये गीत गाते हुए तुमने किसके लिए कहा था...... 
 मेरे प्रीतम को अभी परदेस है भाया हुआ....

किस तरह भूलेगा दिल उनका ख़याल आया हुआ
जा नहीं सकता कभी शीशे में बाल आया हुआ


ओ घटा, काली घटा अब के बरस तू न बरस
मेरे प्रीतम को अभी,  परेदस है भाया है
किस तरह.....

आ चमन से दूर बुलबुल जा के रोएं.... रोएं, साथ साथ
तेरा दिल भी चोट है मेरी तरह खाया हुआ
किस तरह...


खुश रहें दुनिया में वो जिसने है तोड़ा है दिल मेरा
दे रहा है ये दुआ आंखों में अश्‍क आया हुआ

किस तरह भूलेगा दिल उनका खयाल आया हुआ
जा नहीं सकता कभी शीशे में बाल आया हुआ 

Thursday, July 19, 2012

बिछड़े सभी बारी-बारी ..


मेरे घर से तुमको कुछ सामान मिलेगा , दीवाने शायर का एक दीवान मिलेगा और एक चीज़ मिलेगी..टूटा ख़ाली जाम ..फिल्म नमक हराम में रज़ा मुराद के आखि़री पलों में गाते हैं राजेश खन्ना। सबकी आंख नम हो जाती हैं। इससे पहले आनंद में और उससे भी पहले सफ़र फि़ल्म में उन्होंने ऑडियंस को ज़ार ज़ार रुलाया। बाद में उन्होंने कहा-आई हेट टियर्स..लेकिन वे तब तक अनगिनत आंखों में आंसू रोप चुके थे। लोगों ने खुलकर गाया-मेरे सपनों की रानी:::::लेकिन वे नहीं भूले उस उदासी और बेबसी को जो राजेश खन्ना ने पर्दे पर दिखाकर अपने लिए दिलों में एक खास जगह बना ली थी। .ये उनकी सबसे ऊंची परवाज का दौर था। वे जो गाते, वो हर ज़बान पर होता। जो पहनते वो सबकी जिंदगी का हिस्सा बनता। उनकी एक झलक के लिए पब्लिक की दीवानगी इस तरह सामने आती कि अफ़साने बन जाते। लेकिन सबसे ऊंची शाख़ पर बैठे परिंदे को भी कभी नीचे आना पड़ता है। राजेश खन्ना भी बुलंदी से उतरे। ऊंचाई जिस तेजी से  मेले सजाती है ढलान उसी रफतार से अकेलापन सौंपती जाती है। बाद में रह जाती हैं अच्छे दिनों की कहानियां।  राजेश खन्ना की जि़दगी में भी दौलत, शोहरत, मुहब्बत और तोहमतों की कहानियां थीं लेकिन ..सुनने वाले धीरे-धीरे महफिल से उठते जा रहे थे। बारी-बारी बिछड़ते दोस्त और अजीज़ों को उन्होंने किस तरह रुकने को कहा होगा पता नहीं लेकिन जो सामने आया वो थी तन्‍हाई।  काका अपने घर में अकेले रह गए थे। साथ रह गया था जाम। ये जाम भरता तो भरता ही जाता। रोकने वाला कोई हाथ वहां था ही नहीं। यही वजह थी कि पिछले दिनों जब वे पहली बार अस्पताल लाए गए तो उससे कई दिन पहले खाना-पीना छोड़ चुके थे। यक़ीनन ऐसी हालत अकेलेपन का ही नतीजा थी।

आख़री पलों में डिंपल फिर एक बार उनके साथ थीं। जाम पीछे रखा जा चुका था। अपनी तन्हाई की गिरह को खोलते-बांधते उन्होंने जो बातें जाम सामने रखकर की थीं उनकी गूंज को डिंपल ने जरूर सुना होगा, लेकिन अब तक देर हो चुकी थी। यूं भी गूंज, कहे हुए शब्दों को ज्यों का त्यों अभिव्यक्त नहीं कर सकती। ख़ामोशी में राजेश खन्ना ने कहा-मैं सोचता था मेरा नाम गुनगुना रही है वो, लेकिन सचमुच क्या वे कह पाए जाते-जाते, किसी को नहीं पता। जिसे पता है वो है बेजु़बान जाम जो न केवल खाली है बल्कि अब टूटा हुआ भी। लोग राजेश खन्ना को याद रखेंगे। वे उन सारे गीतों को भी याद रखेंगे जिन्होंने कभी मुस्कान दी तो कभी आंसू लेकिन ख़ाली टूटा जाम भुला दिया जाएगा। इस भुलाए जाने को याद रखते हुए भी ये  फिर किसी कलाकार की जिंदगी में दाखिल होगा चुपचाप उसका साथी बनने के लिए, इसे अजीब किस्म की अमरता जो हासिल है।

Tuesday, June 19, 2012

mehdi hasan


शोला था जल बुझा हूं

मैं कब का जा चुका हूं सदाएं मुझे न दो

मेहदी हसन को हम किस तरह याद करेंगे ये सोचना मुश्किल नहीं है क्योंकि
उन्हें सुनते रहिए तो भूलने की हिमाकत हो ही नहीं पाएगी। मुश्किल तो ये
सोच पाना है कि उन्हें भुलाया कैसे जाएगा।  कोई रंग, कोई फूल, कोई मौसम,
कोई आग  और कोई अहसास अछूता नहीं रहा उनकी आवाज से। कोई एक गीत,  नज्म,
या  गज़ल उठा लीजिए वो समझ जाएंगे कि क्या ये सब भुला दिए जाने के लिए
गाया गया है।  मेहदी हसन वाकई उन सारी  हदों से परे एक एक शख्सियत का नाम
है जो जिंदगी और मौत के दौर से इसलिए गुजरती हैं क्योंकि कुदरत का निजाम
यही है। वरना अमर हो जाने की परिभाषा कुछ और हो नहीं सकती।
एक इंतजार था। शायद वे ठीक हो सकेंगे।  फिर से गा सकेंगे, लौट आएगा
पुराना दौर..।  बरसों बीते आि‍खर इंतज़ार मुख्तसर हुआ, चले गए मेहदी
हसन। अब लौटेंगे नहीं लेकिन हमेशा जिंदा रहेंगे उन सुरों में जो सहेज लिए
गए। यूं भी ऐसे कलाकारों का सिर्फ जिस्म ही तो विदा होता है जहां
से...रूह तो अमरता पाकर विचरती फिरती है मौसीकी के मौसमों में।  इस अमरता
को जानते हुए ही शायद उन्होंने बहुत पहले गाया था-अब तुम तो जिंदगी की
दुआएं मुझे न दो...गोया उन्हें यकीन था कि दुनिया में आना और जाना तो महज
एक  दस्तूर है। लेकिन मेहदी हसन के  चाहवान इस बात को कैसे समझ पाते।
बारह बरस वे बीमार रहे और दुनिया दुआएं करती रही उनके जीने की। सेहतमंद
होने की। हर बार जब वे ज्य़ादा बीमार होते तो दुआओं का दौर और ज्यादा तेज़
हो जाता। सच है कि हम उन्हें जाने नहीं देना चाहते थे। जबकि वे कह रहे थे
शोला था जल बुझा हूं हवाएं मुझे न दो  मैं कब का जा चुका हूं सदाएं मुझे
न दो ।  माना जा सकता है कि मेहदी हसन के मयार का कलाकार उनके अंदर से
उसी दिन चला गया होगा जिस दिन उन्हें पता चला कि वे अब गा नहीं सकेंगे।
और अपने अंदर से जिंदगी को चले जाने के बाद भी इतने लंबे अरसे तक खुद को
जिंदा कहलाते हुए देखना कितना तकलीफहेद होगा  उनके लिए, इस बात का हम
सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं।
जिन्होंने मेहदी हसन को लाइव देखा-सुना है वे सब जानते होंगे कि उस्ताद
की आ$गा खान अस्तपाल वाली तस्वीरें कैसे  विचलित कर दिया करती थीं।
अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा वो शहंशाह जिसने पत्थर दिलों को भी एक आवाज़
से छुआ और मोम कर दिया, किस कदर मजबूर और बेबस नज़र आता था। बेहद कमजोर
और बीमार। संासें कभी खु़द आतीं-जातीं तो कभी वेंटीलेटर के बहाने कोशिश
की जाती जिंदगी को आगे ले जाने की। बहुत दिन चली ये लुकाछिपी और उम्मीद
का सफर। अब बाकी रह गया है वो खालीपन और सन्नाटा जिसमें गूंज रही है एक
आवाज़- अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें.. जिस तरह सूखे
हुए फूल किताबों में मिलें।
 गज़ल को किसने ईजाद किया, सोज़ को किसने रंज बख्शा, सुरों को किसने
साधा और रियाज़ की गहराइयां कौन कैसे उतरा..हम सब भूल जाएंगे। याद रहेगी
तो वो आवाज़ जो सीधे रूह पर वार करती है। मेहदी हसन एक दुआ थे दुनिया के
लिए। बरसों सुरों की  बारिश  बनकर बरसते रहे। बारिशें अब  भी बरसेंगीं।
सुर फिर भी सजेंगे। जो मेहदी हसन के शैदाई हैं वे हमेशा उन्हें सुनते
रहेंगे लेकिन शहंशाहे ग़ज़ल का का तख़्त सूना रहेगा। हां ये बात और है कि
बादशाहत फिर भी कायम रहेगी।

उन्हें सुनते ही सुनने का शऊर आ जाता है..

नब्बे के शुरुआती दौर में मेहदी हसन दुनिया भर में खू्ब घूम रहे थे।
प्लेबैक से तकरीबन किनारा कर चुकने के बाद उनका पूरा ध्यान क्लासिकल और
सेमी क्लासिकल रंग में ग़ज़लों को दुनिया तक पहुंचाने पर था। फिल्मी, नॉन
फिल्मी, उर्दू और अन्य ज़बानों में हमें मिल जाता उस सबको सुनकर हमेशा
दिल में एक ख्वाहिश जागती थी कि क्या कभी ग़ज़लों के इस शहंशाह को सामने
बैठकर सुन सकेंगे। एक दिन अखबार में इश्तेहार देखा। मेहदी हसन लाइव इन
कंसर्ट चंडीगढ़ में।  टिकट भी चंडीगढ़ में ही मिल रहे थे। उस वक्त हम इस
शहर से कुछ दूर रहा करते थे। खैर, मेहदी हसन का प्रोग्राम है तो दूरी और
टिकट की कीमत के कोई मायने नहीं थे। एक महीने की पूरी तनख्वाह खर्च करने
पर चार टिकट खरीदे गए।
पीजीआई के भार्गव ऑडिटोरियम में हो रहे इस प्रोग्राम में वक्त पर पहुंचने
के लिए एक रिटर्न टैक्सी का इंतजाम करके हम परवानू से चंडीगढ़ तक पहुंचे।
हमारे साथ जिन लोगों को प्रोग्राम के लिए आना था उनमें से एक किसी वजह से
पहुंच नहीं सके। यानी  हमारे पास एक टिकट फालतू था जब लोग मारे-मारे फिर
रहे थे टिकट के लिए। हम किस कदर फराख दिल थे उस वक्त कि ड्राइवर को ही
कहा-आओ चलो तुम भी सुनो मेहदी हसन को। उसने हैरत से हमारी तरफ देखा कि
शायद ये मज़ाक हो रहा है। हमने फिर कहा, अरे भई सचमुच चलने को कह रहे
हैं। वो उछलकर साथ हो लिया। यूं भी वो रास्तेभर टैक्सी में मेहदी हसन की
कैसेट सुनवाता लाया था और इस जुगाड़ में था कि कहीं से बैठकर उनकी आवाज
ही सुन लेगा।
भार्गव ऑडिटोरियम में अंदर घुसते वक्त हमें यकीन था कि हमारी सीट तो
पक्की है इसलिए परेशानी का तो सवाल ही नहीं। लेकिन अंदर जाकर पता चला कि
वहां जो जहां बैठ सकता था बैठ गया है। क्योंकि प्रोग्राम तकरीबन शुरू हो
चुका था इसलिए हमें  भी जहां जगह मिली बैठ गए।
हॉल में लोग कितनी-कितनी दूर से आए थे ये अंदर जाकर पता चला। फीरोजपुर के
आठ नौजवान एक सुर में फरमाइश करते और उस्ताद को माननी पड़ती। डलहौजी से
आए एक बिजनेसमेैन बार-बार अपनी आंखों पर दूरबीन लगाकर मेहदी हसन को
करीब लाकर देखते रहे। शहर के सबसे रसूखदार लोग उस रात सीढिय़ों पर ज़मीन
में फर्श पर बैठे देखे गए।  रंजिश ही सही...गुलों में रंग भरे और मुहब्बत
करने वाले कम न होंगे..ये ऐसी ग़ज़लें थीं जो एक से ज्यादा बार गानी पड़ी
मेहदी हसन को। प्रोग्राम कितनी देर चला याद नहीं। बस याद इतना है कि वहां
जाने से पहले मेहदी हसन को जिस तरह सुना था लाइव सुनने के बाद वो समझ बदल
गई।  हां, ऐसा ही लगता है कि उन्हें सामने बैठकर सुनते ही सुनने का शऊर आ
जाता है।

उन्हें आखिरी बार सुनना
सन 2000 मई की गरम रात। चंडीगढ़ क्लब में मेहदी हसन की लाइव परफॉर्मेंस
है और लोग वक्त से पहले वहां जुटने लगते हैं। ये मुहब्बत है उनके लिए जो
लोगों को अमृतसर से लेकर शिमला तक से बुला लाई है। यहां सिर्फ मेंबर्स की
एंट्री हो सकती है लेकिन लोग इस एक पास के इंतजाम में कोई भी रकम खर्च
करने को तैयार हैं। तकरीबन आठ बजे मेहदी हसन को बैसाखियों के सहारे स्टेज
तक पहुंचाया जाता है। उनका परिवार साथ है मदद के लिए। क्लब के लॉन में हो
रहे इस प्रोग्राम की शुरुआत होने से पहले जो शोर था वो पहले सुर के साथ
खामोश हो जाता है। कम से कम दस $गज़लें पूरी होने के बाद वे कुछ देर
रुकते हैं और देखते हैं आसमान की तरफ। आसार बारिश के थे और तेज़ हवाओं के
साथ अंदेशा तूफान का भी। मौमस खऱाब होने लगता है। बावजूद इसके न लोग वहां
से जाने को तैयार हैं और न ही उस्ताद प्रोग्राम अधूरा छोडऩे को राजी।
बारिश शुरू हो जाती है लेकिन लोग अब भी जमे हैं अपनी जगह। आखिर लाइट्स
बंद हो जाती हैं और माइक बंद हो जाते हैं। मेहदी हसन जा रहे हैं
बैसाखियों के सहारे स्टेज से उतरते हुए। ये उन्हें हमारा आ$िखरी बार
देखना था।

published in Dainik Bhaskar on  14th june 2012.

Monday, September 27, 2010

अकेला घर करीम का.....

वो देश का सबसे बड़ा अल्‍पसंख्‍यक है। उसकी गिनती ख़ुद से शुरू होती है और वहीं ख़त्‍म भी हो जाती है। पूरे गांव में अकेला मुसलमान, करीमबख्‍़श। उम्र पिचासी पार जाने लगी है और अब बस ख्‍वाहिश इतनी ही बची है कि इसी मिट़टी पर दम निकले, जहां पैदा हुआ था। 1947 का बंटवारा भी उसे इस ज़मीन से जुदा नहीं कर सका था। जिस रात गांव के सारे मुसलमानों ने पाकिस्‍तान जाने का फ़ैसला किया तो करीम बख्‍़श अपने ननिहाल भाग गया। तब उसकी उम्र 22 बरस की थी। बताते हैं उसकी मंगनी हो चुकी थी और फ़साद न होते तो जल्‍दी ब्‍याह भी हो जाता।

खै़र, कुछ अमन हुआ और करीम अपने गांव लौटा तो सारे घर जले हुए थे। असबाब लूटे जा चुके थे और जो बाक़ी थी उसे भी अपना नहीं कहा जा सकता था। पाकिस्‍तान से उजड़कर आए लोगों को ये गांव अलॉट किया जा रहा था। और तो और वो मस्जिद भी करीम की अपनी नहीं रही थी जिसमें वो अज़ान दिया करता था। वहां गुरुग्रंथ साहिब का प्रकाश किया जा चुका था। ये सब तरेसठ साल की बाते हैं।

इतना लंबा वक्‍त बीता और आज तक कभी करीम ने इस गांव से कोई शिकायत नहीं की। दुनिया बदली लेकिन ये इंसान वही रहा जो था। उसने कभी पलटकर ये नहीं कहा कि इस मस्जिद में मैंने नमाज़ पढ़ी है, इसलिए अब वाहेगुरू की फतेह बुलाने से मुझे परहेज़ है। वो कहता है' वो भी रब का नाम था ये भी रब का नाम है। बहुत सहज मन और निर्दोष आवाज में ये बात कहते हुए करीम बख्‍श एक पल में उन सारे मर्मज्ञों को पीछे छोड़ देता है जो इस बात को साबित करने में जीवन लगा गए कि ईश्‍वर एक है, उसे किसी भी भाषा  या स्‍वर में पुकारो, वो सुन ही लेता है। इसी जगह पंद्रह बरस से ग्रंथी के तौर पर रह रहे जरनैल सिंह का कहना है, जब ये मस्जिद थी तो भी रब का घर थी और आज गुरुद्वारा है तो भी रब का घर ही है। यहां आकर लोग सिर झुकाते हैं बस मैं इतना ही जानता हूं।

पूरे गांव के बीच एक अकेला, ग़रीब मुसलमान अपने सेक्‍युलरिज्‍़म के साथ सब पर भारी पड़ता है। करीम का दिल जितना बड़ा है गांव के लोगों ने भी उसे उसी तरह अपनाया है। किसी के घर ग़म हो या खुशी सबसे पहले करीम वहां पाया जाता है। उसकी उम्र के बाक़ी बुजु़र्ग कहते हैं; न ये हमसे अलग है और न ही हम इससे। इसके बेटे शहर में रहते हैं, ये वहां जाता है और वापस आ जाता है। इसका मन यहीं रमता है।

करीमबख्‍श सचमुच इस गांव को छोड़कर कहीं नहीं जा सकता। वो यहीं जी रहा है और एक दिन यहीं मर जाएगा। हां, ये ख़बर पाकर उसके बेटे एक गाड़ी लेकर आएंगे ताकि उसे दफ़नाने के लिए शहर में ले जाया जा सके, करीम के गांव में उसके जीने के लिए तो जगह है, कब्र के लिए नहीं। मुसलमान चले गए थे तो कब्रिस्‍तान की ज़रूरत भी ख़त्‍म हो गई थी। अब वहां मुर्दे नही लोग रहते हैं।

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पंजाब में पटियाला जि़ले के ढकौंदा गांव में रहता है ये शख्‍स करीम बख्‍श। इन दिनों जो माहौल है उसमें कुछ ऐसे लोगों की कहानी ढूंढने की कोशिश में मुलाकात हुई इनसे, जो सचमुच रब के बंदे हैं, जिनका ईश्‍वर इमारतों में नहीं रहता।
ये खबर 26 सितंबर 2010 को दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित हुई।

Thursday, September 2, 2010

A room of one's own ...


Restorer Ella Hendriks shows pictures of the various stages of restoration of Vincent Van Gogh's 'The Bedroom' painting, rear left on easel, at the Van Gogh museum in Amsterdam, Netherlands, Thursday Aug. 27, 2010. Vincent van Gogh must have been horrified when he returned to his studio from hospital early in 1889 to find one of his favorite paintings damaged by moisture. He pressed newspaper to the canvas to protect it from further deterioration, rolled it up and sent it to his brother Theo in Paris. Ella Hendriks could still see traces of newsprint when she looked at "The Bedroom" under a microscope, as she picked and scraped at earlier restorations of the canvas and removed yellowing varnish that had been brushed on 80 years ago. Hendriks has completed a painstaking six-month restoration of the masterpiece, which returns to its place on the wall of the Van Gogh Museum on Friday. (AP Photo/Peter Dejong)

note...see this link www.vangoghmuseum.nl/blog/slaapkamergeheimen/en/the-bloggers/ if want to read more about the bedroom masterpiece.