प्रेम तब भी बाक़ी थी जब एक परित्यक्त पल में गिटार सहेज कर रख दिया गया। उसकी उदासी हमारी आंखों से ज़्यादा नम थी। आवाज़ देकर अगर उसने रुकने को कहा होता तो शायद अच्छा था...। आहूत धुनों की शर्मिन्दगी से आंख बचाते हुए हमने सारी हरी कोमल पत्तियों को बुहार दिया....ये बहुत मुश्किल, पर समझदारी का काम रहा। दिक़्क़त नहीं हुई उसे कपड़े में लपेटकर परछत्ती तक रख देने में। हमें पता था उदास गिटार बोलते नहीं ..ज्यादातर चुप रहते हैं, जब तक कि किसी स्थगित धुन के लिए दी गई क़सम उसे याद न दिला दी जाए...।
फोटो-गूगल से।
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Friday, November 27, 2009
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