Saturday, June 20, 2009
फादर्स डे
बहुत दिन पहले की बात है. जंगल में एक शेर रहा करता था....अब नहीं रहता.
This May 7, 2009 photo provided by the Wildlife Conservation Society shows Bronx Zoo's lion M’wasi, left, and daughter Moxie enjoying a playful outing in the Zoo's African Plains exhibit in the Bronx Borough of New York. (AP Photo/Wildlife Conservation Society, Julie Larsen Maher)
Wednesday, June 17, 2009
तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे......
गंगा मेरे घर से बहुत दूर थी। कई शहर दूर। उसके खतों को गंगा के हवाले नहीं कर सकता था। जला सकता था लेकिन जगजीत और रहबर साहब बार-बार आड़े आते रहे। तेरे खु़शबू में बसे खत मैं जलाता कैसे...शायद सौवीं बार मैं इस नज्म को सुन रहा था। हर बार आंख भर आने के बाद मैं कमज़ोर पड़ जाता था। नहीं जला सका...बहुत सोचने पर भी नहीं जला सका। किसी चीज़ को जला देना उसका अंतिम संस्कार है या उसे नष्ट कर देने की प्रक्रिया, इस भेद में बहुत गहरे न जाते हुए भी मैं उन्हें आग में jhonk देने का साहस कभी नहीं कर पाया। हालांकि अरसे तक उस खु्शबू से परेशान रहा हूं जो उन्हें पढ़ते हुए मुझे लगातार महसूस हुआ करती थी। शुरु-शुरु में इसे वहम समझकर टालने की नीयत से मैंने उन्हें धूप में रखा कि अगर किसी गुलाब या perfumed कागज़ का असर हुआ तो खत्म हो जाएगा...लेकिन खु़शबू कहीं गई नहीं। मैंने उससे पूछा था कि हर दिन मुझे इतने लंबे खत को लिखते हुए वो कभी थकती नहीं और इनमें खु़शबू कहां से भरकर लाती है...उसने कभी मेरी बात का जवाब नहीं दिया.। ये बात तभी की है जब मैं इस ख़ुशबू में खो जाना चाहता था, बाद में मेरा मन उससे भर गया और एक दिन उन सबको एक बड़े लिफाफे में भरकर मैंने परछत्ती पर फेंक दिया।
मैं सुन रहा था...मुझको प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह...और मेरी आंख छलक-छलक जाती थी। इस भावुकता का क्या अर्थ है जब मैंने अरसे से उन खतो को खोलकर देखा तक नहीं । परछत्ती की सफाई का zimma अगर न लिया होता तो शायद मुझे खयाल तक न आता कि उनका कोई वजूद अब है भी। नज्म का एक टुकड़ा आकर दिल पर लगता है-जिनको एक उम्र कलेजे से लगाए रखा...साथ ही याद आ जाता है कि लंबे अरसे तक मैं हर रोज़ सारे खतों को एक बार पढ़कर सोया करता था। पूरी नींद खु़शबू से गमक जाती थी। बाद में जब मैंने इस खु़शबू को खारिज किया तो भी वो हर रोज मेरी डायरी के बीच एक खत रखकर जाती थी। फिर पूरा दिन मेरी तरफ इस उमीद से देखा करती कि अब मैं उसे पढ़ूंगा.. लेकिन मैंने उन्हें पढ़ना बंद कर दिया था।
नज्म को बार-बार सुनने के पीछे भावुक होकर उन खतों को सीने से लगा लेने का मेरा कोई इरादा नही था। मैं दरअसल इन खतों को बाइज्ज़त गंगा के सुपुर्द कर देने का जज्बा अपने अंदर पैदा करने की कोशिश कर रहा था। कितनी पवित्र qism का आइडिया है खतों को गंगा के हवाले कर देना...न मन पर किसी तरह का बोझ रहे और न ही उन्हें अपने साथ रखे रहने का टंटा बचे। मुझे vishwas था कि मैं अगर लगातार इसे सुनता रहूंगा तो दो दिन की छुट्टी लेकर गंगा तक जाने का प्रोग्राम बना लूंगा। हर बार नज्म के शुरु होने पर मैं सोचता रहा कि इन्हें जला देना ठीक होगा और aakhir तक आते-आते उन्हें गंगा में बहा देने का मूड बन जाता।
लगातार तीसरे दिन नज्म को सुनते हुए मैंने वो लिफा़फा गाड़ी में रखा। तेरे खु़शबू में बसे खत मैं जलाता कैसे...सचमुच जलाना मेरे लिए मुश्किल है और गंगा तक जाने का वक्त वाकई मेरे पास नहीं है। मैंने गाड़ी शहर के बाहर वाली उस सड़क पर डाल दी जहां एक छोटा राजबाहा जाकर आगे बड़ी नहर से मिलता है। हां इसमें गंगा का नाम कहीं नहीं है लेकिन इस वक्त मेरे पास इससे बेहतर और कोई रास्ता भी कहां है। मैंने पुल के ऊपर खड़े होकर वो लिफाफा खोला और उसका मुंह नीचे की तरफ कर दिया। सारे कागज़ पानी में गिर गए थे। बीच में रखे सूखे गुलाब के फूलों की कुछ पçत्तयां पानी के ऊपर नज़र आ रही थीं। दो मिनट खड़े होकर मैंने उन्हें देखा और वापस आकर गाड़ी में एक बार फिर वही नज्म सुनी। खु़शबू अब भी गाड़ी में बाकी थी।
-जगजीत सिंह और राजेंद्र नाथ रहबर से माफी चाहते हुए।
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Sunday, May 17, 2009
कैसी अफीम घुली थी उन दिनों में
कुछ तो ऐसा है जो मुझे समझ नहीं आता, जिसे डीकोड करने की कोशिश में अक्सर मैं उस जगह जाकर खड़ा होता हूं , जहां से पहली बार उसे आते हुए देखा था। अब वहां खड़ा होने पर मैं उसे नज़र नहीं आता... न ही वहां खड़े हुए उसका आना मैं देख पाता हूं। इस पहेली का सिरा कहां है...? कल देर तक इसे सुलझाने की कोशिश करते हुए एक कड़वाहट और पल्ले पड़ ही गई। गाड़ी के धूल पर भरे शीशे पर लिखा एक शब्द अमली...मुझे काटने क्यों दौड़ा? इस नाम को तो कभी मैने खु़द अपने लिए तय किया था। पन्ने खोलने पड़ते हैं उन दिनों की तहों में जाने के लिए जब हर वक़्त एक नशे मंे रहने का सा अहसास होता था। मै उससे बाहर कब आना चाहता था? एक दिन मैंने गहरे डूबकर उससे कहा-तुम औरत नहीं अफीम हो...और साथ ही उसके मोबाइल के कॉन्टेक्ट ऑप्शन में जाकर अपने नाम के बदले अमली सेव कर दिया था। लंबे समय तक उसके फोन पर वहां अमली शब्द दिखता रहा...पता नहीं अब भी उसने बदला है या नहीं। लेकिन अपने दिमाग से मैं उस नशे और अमल...सब को डिलीट कर चुका हूं। एक उंगली से उकेरे गए इन नाम पर कभी मैं किस तरह न्यौछावर होने को उतावला था...आज उस उंगली को चूम लेने का खयाल एक अजीब सी koft से भर देता है।
कैसे बदल जाते हैं दिन....और क्यों बदल जाते हैं? मैं खु़द से हज़ार सवाल पूछते हुए हैरान होता हूं कि क्या ये मैं ही हूं जो आज यह सब कर रहा हूं जबकि कभी मैंने ही इस अफीम जैसी औरत को घूंट-घूंट चख लेने तक का सब्र नहीं किया था। मुझे बहुत जल्दी थी। उस नशे की बात बिल्कुल अकेलेपन में सोचते हुए भी शर्मसारी सिर चढ़ी जाती है। क्या जवाब दूंगा मै¡ अपनी उम्र के उन बरसों को जो मैंने उस नशे मंे बिता दिए..जिसका आज कोई मतलब नहीं। कल जब मैं लिखूंगा इन सबके बारे में तो शब्द मेरे पास आने से इनकार तो नहीं कर देंगे? अपने लेखन मंे उसे खारिज करने का काम मैंने काफी पहले कर दिया था। यहां तक कि जिन जगहों पर अफीम में डूबे उन दिनों का जि़क्र था उन्हें एक फलसफे का जामा पहनाकर दोबारा इस तरह दुरुस्त कर दिया है कि कोई पारखी वहां तक जाकर उसके असली रंग को देख नहीं सकेगा। लेकिन ये सब करते रहना क्या हमेशा आसान बना रह सकेगा मेरे लिए?
अपनी होशियारी पर कायल होना मुझे कभी भूलता नहीं। लेकिन उसे अपने सामने पाकर मेरे अंदर एक कॉप्लेक्स तो ज़रूर जागता है कि मेरी कोई होशियारी उससे छिप क्यों नहीं पाती? अपनी बढ़ाई हुई दाढ़ी के कारण भाव छिपा जाने की कला में मुझे महारत है, लेकिन वो न देखते हुए भी सब कैसे समझ लेती है। कई बार ऐसा लगता है जैसे मैं उसके सामने पारदर्शी हो गया हूं। मेरे अंदर की हर हलचल उसे दिख रही है। यहां तक कि मेरी सोच का सारा सर्किट उसकी नज़र मंे है और आंतों से लेकर ब्लड कॉपोनेंट तक की सारी तफसील उसके पास दर्ज है। इतना खुलापन...मैं इस सब से उकता गया हूं, इस हद तक कि अब लगता है बस...और नहीं। मैं छिपकर रहना चाहता हूं, अपने आप पर एक ऐसा parda चढ़ाकर जिसके परे सिर्फ वही दिखे जो मैं दिखाना चाहता हूं। काश कि मैं उसे कह सकूं वो उस हवा मंे सांस न ले जहां मैं ले रहा हूं...दूर चली जाए अपनी अफीम की महक वाली सारी सांसें लेकर ताकि मैं उन दिनों की सारी स्मृतियांे को जड़ से खुरच कर साफ कर सकूं।
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-इस पोस्ट का शीर्षक ब्लॉगर महेन मेहता की एक कविता की एक लाइन ही है। जब मैंने यह कविता पढ़ी तो ये लाइन अटक गई थी कहीं। खै़र यहां बिना पूछे लगा ली गई है, आभार सहित।
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ek diary ka panna
कैसे बदल जाते हैं दिन....और क्यों बदल जाते हैं? मैं खु़द से हज़ार सवाल पूछते हुए हैरान होता हूं कि क्या ये मैं ही हूं जो आज यह सब कर रहा हूं जबकि कभी मैंने ही इस अफीम जैसी औरत को घूंट-घूंट चख लेने तक का सब्र नहीं किया था। मुझे बहुत जल्दी थी। उस नशे की बात बिल्कुल अकेलेपन में सोचते हुए भी शर्मसारी सिर चढ़ी जाती है। क्या जवाब दूंगा मै¡ अपनी उम्र के उन बरसों को जो मैंने उस नशे मंे बिता दिए..जिसका आज कोई मतलब नहीं। कल जब मैं लिखूंगा इन सबके बारे में तो शब्द मेरे पास आने से इनकार तो नहीं कर देंगे? अपने लेखन मंे उसे खारिज करने का काम मैंने काफी पहले कर दिया था। यहां तक कि जिन जगहों पर अफीम में डूबे उन दिनों का जि़क्र था उन्हें एक फलसफे का जामा पहनाकर दोबारा इस तरह दुरुस्त कर दिया है कि कोई पारखी वहां तक जाकर उसके असली रंग को देख नहीं सकेगा। लेकिन ये सब करते रहना क्या हमेशा आसान बना रह सकेगा मेरे लिए?
अपनी होशियारी पर कायल होना मुझे कभी भूलता नहीं। लेकिन उसे अपने सामने पाकर मेरे अंदर एक कॉप्लेक्स तो ज़रूर जागता है कि मेरी कोई होशियारी उससे छिप क्यों नहीं पाती? अपनी बढ़ाई हुई दाढ़ी के कारण भाव छिपा जाने की कला में मुझे महारत है, लेकिन वो न देखते हुए भी सब कैसे समझ लेती है। कई बार ऐसा लगता है जैसे मैं उसके सामने पारदर्शी हो गया हूं। मेरे अंदर की हर हलचल उसे दिख रही है। यहां तक कि मेरी सोच का सारा सर्किट उसकी नज़र मंे है और आंतों से लेकर ब्लड कॉपोनेंट तक की सारी तफसील उसके पास दर्ज है। इतना खुलापन...मैं इस सब से उकता गया हूं, इस हद तक कि अब लगता है बस...और नहीं। मैं छिपकर रहना चाहता हूं, अपने आप पर एक ऐसा parda चढ़ाकर जिसके परे सिर्फ वही दिखे जो मैं दिखाना चाहता हूं। काश कि मैं उसे कह सकूं वो उस हवा मंे सांस न ले जहां मैं ले रहा हूं...दूर चली जाए अपनी अफीम की महक वाली सारी सांसें लेकर ताकि मैं उन दिनों की सारी स्मृतियांे को जड़ से खुरच कर साफ कर सकूं।
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-इस पोस्ट का शीर्षक ब्लॉगर महेन मेहता की एक कविता की एक लाइन ही है। जब मैंने यह कविता पढ़ी तो ये लाइन अटक गई थी कहीं। खै़र यहां बिना पूछे लगा ली गई है, आभार सहित।
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ek diary ka panna
कैसी अफीम घुली थी उन दिनों मंे
कुछ तो ऐसा है जो मुझे समझ नहीं आता, जिसे डीकोड करने की कोशिश में अक्सर मैं उस जगह जाकर खड़ा होता हूं , जहां से पहली बार उसे आते हुए देखा था। अब वहां खड़ा होने पर मैं उसे नज़र नहीं आता... न ही वहां खड़े हुए उसका आना मैं देख पाता हूं। इस पहेली का सिरा कहां है...? कल देर तक इसे सुलझाने की कोशिश करते हुए aur एक कड़वाहट और पल्ले पड़ ही गई। गाड़ी के धूल पर भरे शीशे पर लिखा एक शब्द अमली...मुझे काटने क्यों दौड़ा? इस नाम को तो कभी मैने खु़द अपने लिए तय किया था। पन्ने खोलने पड़ते हैं उन दिनों की तहों में जाने के लिए जब हर वक़्त एक नशे मंे रहने का सा अहसास होता था। मै उससे बाहर कब आना चाहता था? एक दिन मैंने गहरे डूबकर उससे कहा-तुम औरत नहीं अफीम हो...और साथ ही उसके मोबाइल के कॉन्टेक्ट ऑप्शन में जाकर अपने नाम के बदले अमली सेव कर दिया था। लंबे समय तक उसके फोन पर वहां अमली शब्द दिखता रहा...पता नहीं अब भी उसने बदला है या नहीं। लेकिन अपने दिमाग से मैं उस नशे और अमल...सब को डिलीट कर चुका हूं। एक उंगली से उकेरे गए इन नाम पर कभी मैं किस तरह न्यौछावर होने को उतावला था...आज उस उंगली को चूम लेने का खयाल एक अजीब सी koft से भर देता है।
कैसे बदल जाते हैं दिन....और क्यों बदल जाते हैं? मैं खु़द से हज़ार सवाल पूछते हुए हैरान होता हूं कि क्या ये मैं ही हूं जो आज यह सब कर रहा हूं जबकि कभी मैंने ही इस अफीम जैसी औरत को घूंट-घूंट चख लेने तक का सब्र नहीं किया था। मुझे बहुत जल्दी थी। उस नशे की बात बिल्कुल अकेलेपन में सोचते हुए भी शर्मसारी सिर चढ़ी जाती है। क्या जवाब दूंगा मै¡ अपनी उम्र के उन बरसों को जो मैंने उस नशे मंे बिता दिए..जिसका आज कोई मतलब नहीं। कल जब मैं लिखूंगा इन सबके बारे में तो शब्द मेरे पास आने से इनकार तो नहीं कर देंगे? अपने लेखन मंे उसे खारिज करने का काम मैंने काफी पहले कर दिया था। यहां तक कि जिन जगहों पर अफीम में डूबे उन दिनों का जि़क्र था उन्हें एक फलसफे का जामा पहनाकर दोबारा इस तरह दुरुस्त कर दिया है कि कोई पारखी वहां तक जाकर उसके असली रंग को देख नहीं सकेगा। लेकिन ये सब करते रहना क्या हमेशा आसान बना रह सकेगा मेरे लिए?
अपनी होशियारी पर कायल होना मुझे कभी भूलता नहीं। लेकिन उसे अपने सामने पाकर मेरे अंदर एक कॉप्लेक्स तो ज़रूर जागता है कि मेरी कोई होशियारी उससे छिप क्यों नहीं पाती? अपनी बढ़ाई हुई दाढ़ी के कारण भाव छिपा जाने की कला में मुझे महारत है, लेकिन वो न देखते हुए भी सब कैसे समझ लेती है। कई बार ऐसा लगता है जैसे मैं उसके सामने पारदर्शी हो गया हूं। मेरे अंदर की हर हलचल उसे दिख रही है। यहां तक कि मेरी सोच का सारा सर्किट उसकी नज़र मंे है और आंतों से लेकर ब्लड कॉपोनेंट तक की सारी तफसील उसके पास दर्ज है। इतना खुलापन...मैं इस सब से उकता गया हूं, इस हद तक कि अब लगता है बस...और नहीं। मैं छिपकर रहना चाहता हूं, अपने आप पर एक ऐसा parda चढ़ाकर जिसके परे सिर्फ वही दिखे जो मैं दिखाना चाहता हूं। काश कि मैं उसे कह सकूं वो उस हवा मंे सांस न ले जहां मैं ले रहा हूं...दूर चली जाए अपनी अफीम की महक वाली सारी सांसें लेकर ताकि मैं उन दिनों की सारी स्मृतियांे को जड़ से खुरच कर साफ कर सकूं।
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-इस पोस्ट का शीर्षक ब्लॉगर महेन मेहता की एक कविता की एक लाइन ही है। जब मैंने यह कविता पढ़ी तो ये लाइन अटक गई थी कहीं। खै़र यहां बिना पूछे लगा ली गई है, आभार सहित।
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ek diary ka panna
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ek diary ka panna
Wednesday, May 13, 2009
अब कभी ऐसी खबर न मिले
मिल गए मुकुल शिवपुत्र। होशंगाबाद रेलवे स्टेशन से इन्हें लगभग उसी तरह नशे की हालत में पहचाना गया जैसा पिछले दिनों भोपाल में देखा गया था। अखबार में खबर छपने के बाद वे वहां से चले गए थे। उनके दोस्त, मीडिया और सरकारी अधिकारी सभी उन्हें ढूंढने में लगे थे। ब्लॉग्स पर भी मुकुल की इस हालत के बाद लोगों की बेचैनी जाहिर हुई। संतोष की बात है कि वे मिल गए और उनके दोस्त अब उन्हें अपने साथ भोपाल ले आए हैं। मुकुल को वास्तव में बहुत सारे अपनेपन, भावनात्मक सहारे और मेडिकल हेल्प की ज़रूरत है। कुमार गंधर्व के बेटे और खु़द बेहद काबिल गायक के बारे में अब कभी ऐसी खबर न मिले और वे जल्दी ही इस स्थिति से उबरकर संगीत यात्रा को आगे बढ़ाएं ऐसी दुआ है।
जानकारी दैनिक भास्कर से साभार।
जानकारी दैनिक भास्कर से साभार।
Monday, April 27, 2009
मैं न सोने से डरती हूं....
मैं सोचती थी कि हम एक-दूसरे की आत्मा तक को देख सकते हैं, कि हम जुड़े हुए हैं, एक-दूसरे से....सियामी जुड़वाओं की तरह संबद़ध हैं। उसने ख़ुद को मुझसे दूर कर लिया था, मुझसे झूठ बोला था, और मैं यहां बैठी थी, कैफे़ की बेंच पर अकेली। मैं लगातार उसके चेहरे और आवाज़ को अपने ज़हन में लाती रही और उस क्रुद़ध नाराज़गी की आग को हवा देती रही, जिसमें मैं जले जा रही थी। यह वैसी बीमारी की तरह था, जिसमें आप ख़ुद ही अपनी पीड़ा निर्मित करते हैं- हर सांस आप के फेफड़ों को चिथड़े कर देती है, पर उसके बावजूद आप सांस लेने को मजबूर होते हैं....
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मैं न सोने से डरती हूं, और सो जाने से भी डरती हूं। मेरे बिस्तर के बग़ल में वह ख़ाली बिस्तर, ये बेसिलवट ठंडी चादरें....मैं नींद की गोलियां लेती हूं, पर बेकार....क्योंकि मुझे सपने आ जाते हैं। सपनों में मैं अक्सर परेशानी से बेहोश हो जाती हूं। मैं निश्चल और ज़माने भर का दुख अपने चेहरे पर लिए मॉरिस की निगाहों के सामने पड़ी रहती हूं। मुझे लगता है कि वह लपककर मेरे पास आएगा। वह उदासीनता से मेरी ओर देखता है और चल देता है। मैं जाग गई, अभी भी रात थी। मैं अंधेरे के बोझ को महसूस कर सकती थी। मैं कॉरीडोर में थी, मैं तेज़ी से उसमें चली जा रही थी, और वह संकरा, और संकरा होता जा रहा था। मैं सांस नहीं ले पा रही थी। फि़लहाल मुझे उसमें रेंगना होगा और मरने तक दो दीवारों के बीच फंसे रहना होगा। मैं चिल्ला पड़ी। मैं ज़्यादा हौले से उसे पुकारने लगी, और पुकारते हुए रोने लगी। मैं उसे हर रात पुकारती हूं। उसे नहीं दूसरे को, उसे, जो मुझे प्यार करता था। और मैं सोचने लगती हूं कि क्या उसका मर जाना मुझे ज़्यादा अच्छा नहीं लगेगा...।
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शायद सबके साथ ऐसा होता है कि कहीं किसी देशकाल, संदर्भ और मनोस्थिति में किसी लिखे गए गए को पढ़ते हुए आप ठिठक जाते हैं, सोच में पड़ जाते हैं कि जो यहां लिखा दिख रहा है वह सिर्फ़ वहीं नहीं है, वह कहीं और भी है। कभी आपके इर्द-गिर्द तो कभी आपके बिल्कुल भीतर भी...जबकि आप तो वहां महज़ पाठक ही होते हैं, .फिर कैसे जुड़ते जाते हैं सारे शब्द और भाव.... हैरान ही होती हूं देखकर....।
खै़र उपरोक्त दो टुकड़े दिमाग़ में अटके थे, सिमोन वाली एक गुमशुदा औरत की डायरी से...।
Thursday, March 26, 2009
आखि़री रंग की नीलाई
ख़्वाब का दर शायद खुला रह गया था...पांव एक बार बाहर निकला और वापसी की राह धुंधला गई। बाहर की दुनिया में सात रंग थे..दिखते तभी थे जब उनपर नज़र रखो, पाबंदी इतनी कि आंखें झपक न जाएं। .उसने दोनों हाथों में भरकर उन्हें बंद कर लिया...इतना कसकर कि उड़ न सकें। पर हथेलियों को रंग छुपा सकने का हुनर कहां याद था और सीख सकने की सारी गुंजाइशों के रास्ते सपनो से होकर ही तो गुज़रते थे। आंख झपकी और पहला रंग हाथ से फिसलकर हवा में घुल गया। वो रंग के पीछे दौड़ती है...भला इस रंग का नाम क्या है...कोई बता सकेगा..? कोई बताता नहीं और एक अनचीन्ही धुन उसे खींचती है ... पांव पूरा करते हैं एक चक्कर...कोई गिन रहा है क्या..? एक और रंग फिर हाथ से छूटता है....हवा में बिखर जाने के बाद ..उसे पलकों से बुहार कर वापस हथेलियों तक लाने की सीख तो किसी ने दी ही नहीं...। रंगों की चटख़ आंखों को खुलने भी कहां देती है...।
सारंगी बजाती हुई जो छाया अभी-अभी पीछे छूटी है उस ने तो हांक लगाकर कहा था ...पांव के नीचे जब भी कांटा आए. या हाथ से छूटकर रंग उड़े तो एक बार..मुझे पुकार लेना..लेकिन पुकारने पर तो वो चुप ही रह गया...शायद अपनी धुन रहा होगा, सुन न पाया हो अपनी ही बात की प्रतिगूंज को। वो पीछे कैसे छूट गया... खु़द ही अपनी रफ़तार को धीमा क्यों कर लिया....सोच में डूबने से पहले ही रंग फिर हाथ से फिसल जाता है। बाहर की दुनिया में रंगों के बिना जीने की अनुमति है क्या...? बीन बजाती छाया से वो पूछना चाहती है...जवाब यहां भी नहीं मिलता... और आगे जाना होगा क्या..शायद वहीं तक जहां से वो आवाज आ रही है, एक रंग अब भी कसके पकड़ रखा है उसने ...लेकिन कितनी देर ।
कैसे छूटा उसके हाथ ये आखि़री रंग....नीलाई दूर तक फैली है...कुछ नज़र नहीं आता साफ़-साफ़.। कैसी .थकान है कि झुककर उन कांटों को भी नहीं निकाल पाती जिनसे पांव बिंधे हैं...। रेत पर कुछ निशान हैं...गिरे हुए रंगों के और लहूलुहान पांव के भी....रंग लगी ख़ाली हथेलियों से वो उस द्वारे को बार-बार टोह लेना चाहती है जो कहीं खो गया है....वही दर तो उसे ले जाएगा सपनों की उस दुनिया में वापस, वहां रंगहीन होने पर जी सकने की इजाज़त अब भी बाक़ी है ..।
.............................................अंदर ख़्वाब विछोड़ा होया, ख़बर न पैंदी तेरी।
सुज्जी बन विच लुट़टी साइयां, चोर शंग ने घेरी।
बुल्लेशाह कहते हैं- हम ख़्वाब में एक दूजे से बिछुड़ गए हैं, अब पता नहीं चलता कि तुम कहां हो। मेरे साईं मैं वन में अकेली लुट रही हूं, चोर-डाकुओं ने मुझे घेर रखा है।
नोट-तस्वीर में नीली रोशनी का यह जादू कै़द किया हमारे सहयोगी सुनील कैंथवास ने।
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