मुझे लगा था, वो जा चुकी है...हमेशा के लिए।
इतने दिनों के मौन ने काफी तसल्ली दी थी, और मैंने इस बीच कई कवियों को पूरा पढ़ डाला। इस बात को तक़रीबन भूलते हुए कि मैं अब भी उससे उतना ही प्रेम करता हूं, पहले दिन जितना। लेकिन इसके बावजूद मैं कह सकता था ....प्रेम, सचमुच मुझे मालूम नहीं।
प्रेम से मुक्ति का अहसास, ओह-उसका चला जाना कितना सुकून दे सकता है। कुर्सी पर सिर टिकाकर आंख बंद करता हूं... और वो अचानक नमूदार होकर कहती है-
चलो, ज़रा प्यार भरी बातें करो मुझसे...। रात भर बुरे सपनों ने डराए रखा। मेरा मूड ठीक करो।
कहे चली जाती है-
माथा चूमने पर
मिट जाती हैं सब चिन्ताएँ
चलो मेरा माथा चूमो....
आँखें चूमने पर
दूर हो जाता है निद्रा-रोग-
चलो मेरी आंखें चूमो
होंठ चूमने पर
बुझ जाती है प्यास-
चलो मेरे होंठ चूमो
मैं बंद आंख और खुले कान से पूरी बात सुन रहा हूं। समझ सकता हूं कि इस वक़्त उसके चेहरे पर वही कहानी होगी जिससे मैं सबसे ज़्यादा डरता हूं। शर्तिया कह सकता हूं कि इसके ठीक तीन मिनट बाद वो साजि़शाना हंसी हंसेगी।
मैं न कह दूंगा और वो अपनी बद-दुआओं का झोला मेरे मुंह पर खोल देगी। मेरी सात पुश्तें पनाह मांगेगी और वो बिना थके बके चली जाएगी।
यही होता है हमेशा। इस बार भी प्यार भरी बातें नहीं कर पाया। सपाट जवाब देते हुए मैंने कहा-चुप रहो और जाकर अपना काम करो, हालांकि उसके ढीठ होने के हज़ार कि़स्से मेरे दिमाग़ में दस्तक देते हुए कह रहे थे-निपटा दो यार, दो चार बातें कहो और कल्टी मार लो।
उससे कुछ देर पहले मैं पढ़ रहा था...
होल्ड मी...कम्फर्ट मी
....................
होल्ड मी टु योर ब्रेस्ट,
मुझे पता है, उसके फरिश्ते भी नहीं जान सकते कि सादी युसुफ कौन हुए, कहां से गुज़रे और क्यों लिख गए ऐसी कविताएं। इसके आने से ठीक पहले मैं उस दोस्त के फोन का इंतज़ार कर रहा था जो मुझे एक लंबी कविता सुनाने वाला है।
वो फिर कहती है-सुना नहीं तुमने...किस मी नाउ...खराब ख्वाबों के बाद, भयानक दुख में हूं।
ओह...तो कांटा यहां गड़ा है, फिर से किसी ऐसे सपने का सीन सुनना होगा जिसमें एक नवजात की मौत या उसके गले की नसें खिंच जाने तक की भूख का मामला होगा, या पानी में डूबती एक बच्ची की कहानी। ये भी हो सकता है कि वो किसी अजन्मे बच्चे का जन्मदिन न मना सकने पर मेरा गिरेबान पकड़ ले। लेकिन, ऐसा कुछ सुनने के मूड में बिल्कुल नहीं हूं मैं। साफ कहता हूं-प्लीज, गो एंड लीव मी अलोन।
वो मुड़ रही है, मुझे लगता है चली जाएगी। दम साधे उसके बिना मुड़कर चले जाने का इंतजार करता हूं।
जारी:::::
नोट-बोल्ड लाइनें मरीना की कविता से। photo google.
Thursday, March 11, 2010
Wednesday, December 23, 2009
प्रेम भटकने नहीं देता
एक गडरिए ने अपनी सभी भेड़ों को चराने के बाद बाड़े में लाकर बंद कर दिया, सिवाय भेड़ के एक बच्चे के। जिसे वह कंधे पर बिठाकर लाया था। उसने उसे नहला-धुलाकर हरी घास खिलाई। उक्त नजारे को पास ही एक पेड़ के नीचे बैठे ईसा मसीह अपने शिष्यों सहित देख रहे थे। अंतत उन्होंने गडरिए से ऐसा करने का कारण पूछा, तो गडरिए ने उत्तर दिया-यह रोज भटक जाता है, इसलिए इसे इतना प्रेम देता हूं कि वह फिर से न भटके। यह सुनकर ईसा मसीह ने अपने शिष्यों से कहा-प्रेम के अभाव में ही लोग भटकते हैं और भटके हुए लोग प्रेम से ही रास्ते पर आते हैं, यह तुम गडरिए से सीखो।
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कितनी सुंदर बात यहां कितनी सादगी से कही गई है। इस मासूम से प्रसंग को 23 दिसंबर के दिन दैनिक भास्कर की साप्ताहिक पत्रिका मधुरिमा में पढ़ा। यहां बांटने से खुद को रोक नहीं पाई क्योंकि प्रेम के इतने सादे और सुंदर भाव बांटने के लिए ही होते हैं। वैसे सोचो तो प्रेम मेमने सा मासूम ही तो लगता है।
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कितनी सुंदर बात यहां कितनी सादगी से कही गई है। इस मासूम से प्रसंग को 23 दिसंबर के दिन दैनिक भास्कर की साप्ताहिक पत्रिका मधुरिमा में पढ़ा। यहां बांटने से खुद को रोक नहीं पाई क्योंकि प्रेम के इतने सादे और सुंदर भाव बांटने के लिए ही होते हैं। वैसे सोचो तो प्रेम मेमने सा मासूम ही तो लगता है।
Tuesday, December 22, 2009
अब ईश्वर नहीं पहले की तरह उदार...
क्या बुरा था...भयानक ठंड और गाढ़े कोहरे के बीच, हाईवे पर हर रात सैकड़ों किलोमीटर गाड़ी चला सकने का जुनून...।
और, निहायत यूं ही सी एक छोटी सड़क आत्मविश्वास को पानी कर देती है...।
मित्र नहीं होते प्रतिभाओं और पागलों के...
अनसुना करते हुए एक बांई हथेली की अभ्यस्त जकड़ बताती है-सड़क हमेशा देखभाल कर पार करनी चाहिए...
अभिनय का अभ्यास उसे खूब था।
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आदत, देर नहीं लगाती, उंगली से दामन तक आने में.., फिर डर लगने लगता है हाईवे की भीड़ से।
अब कभी अकेले सड़क पार नहीं हो पाएगी...बुरा किया, आदत डाल ली...।
उड़ान भरो, ओ मेरे युवा बाज..
कहां गई उड़ान...कहां,
सड़क पर सारे लोग जैसे मार डालने के लिए ही तो उतरे हैं,
सांस ऐसे फूलती है जैसे पानी बस, डुबो ही लेगा,,,
अब ईश्वर नहीं रहा पहले की तरह उदार..
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सही कहा-प्रेम से अधिक, अप्रेम पर होता है आश्चर्य
अब मेरा घर और दफ़तर सड़क के एक ही तरफ़ है
सड़क पार न करने का विवशता नहीं, बस भय है
हाईवे के फि़तूर हवा हुए भी वक़्त हो चला....
हवाओं का क्या है...गूंजता रहे
मरीना, मुझे प्यार करती हो न...
बहुत।
सदा करती रहोगी...
हां।
बहुत।
सदा करती रहोगी...
हां।
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बोल्ड की गई लाइनें और शीर्षक आएंगे दिन कविताओं के / मरीना स्विताएवा, से। अनुवाद वरियाम सिंह का।
Wednesday, December 16, 2009
तुम सुधर नहीं सकतीं सिंड्रेला...
सर्दी बढ़ रही है...सुधर जाओ सिंड्रेला।
ज़रा ख़याल करो।
अपने पांव देखो...कितने खुरदरे और रूखे हैं,जैसे कभी कोमल थे ही नहीं।
कब तक राजकुमार पर बोझ बनी रहोगी...?
खिड़की पर सिर टिकाए, राह देखोगी कि वह आकर तुम्हारा हाल पूछे...?
ज़रा ख़याल करो।
अपने पांव देखो...कितने खुरदरे और रूखे हैं,जैसे कभी कोमल थे ही नहीं।
कब तक राजकुमार पर बोझ बनी रहोगी...?
खिड़की पर सिर टिकाए, राह देखोगी कि वह आकर तुम्हारा हाल पूछे...?
बहुत समय बीता उस बात को , जब उसने कांच के नाजु़क सैंडल लेकर लोगों को तुम्हारी तलाश में दौड़ा दिया था।
मत सोचो कि वो सिर्फ तुम्हारे लिए बने थे, इत्तेफा़क़ भी तो हो सकता है, उनके नाप का सही होना।
चलो मान लिया, राजकुमार ने तुम्हें पांव ज़मीन पर न रखने की ताक़ीद की थी...
चलो मान लिया, राजकुमार ने तुम्हें पांव ज़मीन पर न रखने की ताक़ीद की थी...
पर ये तो नहीं कहा था कि ज़मीन और पांव के बीच की सारी तकलीफों की किताब उसे ही पढ़नी होगी हमेशा...।
क्या ये याद रखना बहुत मुश्किल है कि पांव तुम्हारे हैं, इसलिए उनकी फटी बिवाइयों का दुख भी तुम्हें ही जानना चाहिए....।
जाओ सिंड्रेला अपने लिए एक जोड़ी जूते खरीद लो, राजकुमार के पास कुछ और नहीं है तुम्हारे लिए, और यूं भी नंगे पांव रहना, तुम्हें शोभता है क्या...?
क्या ये याद रखना बहुत मुश्किल है कि पांव तुम्हारे हैं, इसलिए उनकी फटी बिवाइयों का दुख भी तुम्हें ही जानना चाहिए....।
जाओ सिंड्रेला अपने लिए एक जोड़ी जूते खरीद लो, राजकुमार के पास कुछ और नहीं है तुम्हारे लिए, और यूं भी नंगे पांव रहना, तुम्हें शोभता है क्या...?
सिंड्रेला, इस बात का भी अब कोई भरोसा है क्या... कि राजकुमार के पास तुम्हारे साथ नाच लेने का वक़्त होगा ही।
सुनो, हो सके तो सीख लो, सर्दी को सहना, यही दरअसल सर्द नज़र को सीख लेने का पहला सबक़ है।
लेकिन मुझे पता है, तुमसे कुछ भी नहीं होगा....तुम सुधर नहीं सकतीं सिंड्रेला... क्या अब भी नहीं!
लेकिन मुझे पता है, तुमसे कुछ भी नहीं होगा....तुम सुधर नहीं सकतीं सिंड्रेला... क्या अब भी नहीं!
Monday, December 14, 2009
Go to the desrt and shout,
Who is indeed that I can say hello to? Mrs. Principal is dead, Haj Esmail is missing, my only daughter has fallen into the claws of a wolf....The cat died, coal tongs fell on the spider, and the spider died too...And now, what a snow is falling! Whenever it snows I get so depressed that I'd like to bang my head against the wall. The health insurance doctor said,'whenever you feel sad and there's no one you can share your sadness with, talk to yourself loudly.' Meaning that you have to become your own agony aunt. He said,'Go to the desert and shout, swear at anybody you want to...'
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The health insurance doctor said,'swear loudly at anybody you want to, so that your head cools off.' And now my mouth is always full of curses. God only knows that i used to be a romantic; I used to like steams and trees and meadows and the moon in the sky.
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अवसाद और अकेलेपन से मुक्ति पाने के लिए वह निटिंग करती है...लेकिन कितनी बार उधेड़ना और बुनना, इस मर्ज की दवा हो सकता है..।.बे यारो-मददगार, एक औरत का होना और उस होने की यंत्रणा हर भाषा और हर मुल्क में लगभग एक जैसा ही क्यों है...। ईरानी लेखक Simin Daneshvar की शॉर्ट स्टोरी To Whom shall I say Hello? को पढ़ने के बाद इस अकेलेपन को और ज़्यादा गहराई से महसूस करते हुए ऊपर कॉपी किया कुछ लाइनों को।
;फोटो गूगल से।
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The health insurance doctor said,'swear loudly at anybody you want to, so that your head cools off.' And now my mouth is always full of curses. God only knows that i used to be a romantic; I used to like steams and trees and meadows and the moon in the sky.
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अवसाद और अकेलेपन से मुक्ति पाने के लिए वह निटिंग करती है...लेकिन कितनी बार उधेड़ना और बुनना, इस मर्ज की दवा हो सकता है..।.बे यारो-मददगार, एक औरत का होना और उस होने की यंत्रणा हर भाषा और हर मुल्क में लगभग एक जैसा ही क्यों है...। ईरानी लेखक Simin Daneshvar की शॉर्ट स्टोरी To Whom shall I say Hello? को पढ़ने के बाद इस अकेलेपन को और ज़्यादा गहराई से महसूस करते हुए ऊपर कॉपी किया कुछ लाइनों को।
;फोटो गूगल से।
Friday, November 27, 2009
उदास गिटार और एक स्थगित धुन
प्रेम तब भी बाक़ी थी जब एक परित्यक्त पल में गिटार सहेज कर रख दिया गया। उसकी उदासी हमारी आंखों से ज़्यादा नम थी। आवाज़ देकर अगर उसने रुकने को कहा होता तो शायद अच्छा था...। आहूत धुनों की शर्मिन्दगी से आंख बचाते हुए हमने सारी हरी कोमल पत्तियों को बुहार दिया....ये बहुत मुश्किल, पर समझदारी का काम रहा। दिक़्क़त नहीं हुई उसे कपड़े में लपेटकर परछत्ती तक रख देने में। हमें पता था उदास गिटार बोलते नहीं ..ज्यादातर चुप रहते हैं, जब तक कि किसी स्थगित धुन के लिए दी गई क़सम उसे याद न दिला दी जाए...।
फोटो-गूगल से।
फोटो-गूगल से।
Monday, November 23, 2009
लीविंग यू लॉस्ट एंड लोनली...
जादुई शीशा तोड़ने के अपराध में तुम्हें कटघरे में नहीं खड़ा किया जाएगा...न ही ये जवाब मांगा जाएगा कि बिखरी किरचों से खुद को बचाने का हुनर तुमने मुझसे क्यों नहीं बांटा. ..तुम्हें माफ़ कर दिया जाएगा इस क्रूरता के लिए । पीली आंख और बेरौनक चेहरे के साथ अकेले न्रत्य करते रहने की यातना के बीच ही मैंने शीश्ो का खाली फ्रेम उतारकर नीचे रख दिया है...। तुम्हारे साथ रहते हुए जीवित ही स्वर्ग के द्वार तक पहुंच जाने की चाह को भी सहेजकर रख देने से मुझे गुरेज नहीं है...। मैं एक बार भी तुम्हें शर्मिन्दा नहीं करूंगी वो सब याद दिलाकर जिस तुमने काल्पनिक और बेमानी कहकर कल ही चिंदी करते हुए फेंक दिया था। बस एक बार सामने आकर कहो कि अर्थशास्त्र और सांख्यिकी की किताब के कौन से पन्ने पर तुमने अपने नफ़े का सवाल हल किया था...कैसे तय किया था कि हमारा नुकसान अलग-अलग हो सकता है, .ये कहना ही होगा तुम्हें, इसके बाद मैं मान लूंगी कि वाकई तुममें कुछ बेहतर पाने की चाह रही थी।
फोटो. गूगल से साभार
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