आज बस ये दो लाइनें पढ़ लें-
जा अपने ख़ून दे इल्ज़ाम तों तैनूं बरी कीता..
शहादत देन वाले दा कोई क़ातल नहीं हुंदा ।
कविंदर चांद
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Thursday, October 30, 2008
Wednesday, September 24, 2008
एक पल की मौत.....

रोशनदान पर टुक-टुक करती चिडि़या अपनी जगह थी, नीम के पेड़ की कत्थई होती पत्तियां भी। कैम्पस के सबसे मोटे तने वाला पेड़ अपनी जगह से ज़रा भी नहीं हिला। यहां तक कि लोहे की बैंच भी अपनी जगह पर कायम रही। फ़ज़ल ताबिश का शेर और सिगरेट का ढेर सारा धुआं लौट-लौट कर कमरे पर दस्तक देता रहा....अंदर एक पल मर चुका था।
कौन रोता है एक पल की मौत पर...................।
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