पहली पोस्ट पर अपने कमेंट में घुघूती जी ने लिखा था...हम सब अपने-अपने इमरोज़ को ढूँढ रही हैं। परन्तु क्या इतने इमरोज़ इस संसार ने पैदा किये हैं?....ऐसे ही सवाल निरुपमा में घर में भी उठे थे उस दिन। लंबी बातचीत के बीच कभी कोई कह उठती हमें इमरोज़ क्यों नहीं मिला.. तो किसी ने कहा- हमारे हिस्से का इमरोज़ कहां है....? कहां है वो शख्स जो अपनी पीठ पर एक गै़र नाम की इबारत को महसूस करते हुए भी पीठ नहीं दिखाता? एक हाथ से दी गई थाली को दो हाथों से स्वीकार करते हुए अपने चेहरे पर एक शिकन तक आने नहीं देता... कहां है वो प्रेम जो खु़द को मिटा देने की बात करता है.... कहां है वो इंसान जो किसी के चले जाने के बाद भी उसके साथ होने की बात करता है? हम सब ढूंढती हैं पर वो कहीं नहीं दिखता। शायद इसलिए कि ऐसे इमरोज़ को पाने से पहले अमृता हो जाना पड़ता है। दुनियादारी की चादर को इस तरह तह करके रखकर भूल जाना होता है कि उसकी याद तक न आए। उस चादर को बिना बरते जिंदगी गुज़ार सकने की हिम्मत पैदा कर लेनी होती है। हो सकता है, बहुत सारे अमृता और इमरोज एक ही वक़्त पर एक ही जगह इसलिए भी न दिख पाते हों कि उन्हें याद ही नहीं रहा है दुनियादारी और दुश्वारियों की चादर को कैसे तह करके रखा जाता है।
खै़र अपनी-अपनी चादरों की संभाल के बीच भी अपने-अपने इमरोज़ को ढूंढते रहा जा सकता है, क्योंकि ईश्वर अभी भी है कहीं...। मैंने उनसे इजाज़त ली और एक बार फिर ये नज़्म सुनाने को कहा-
साथ
उसने जिस्म छडया है, साथ नहीं
ओह हुण वी मिलदी है
कदे बदलां छांवे
कदे तारेयां दी छांवे
कदे किरणां दी रोशनी विच
कदे ख्यालां दे उजाले विच
असी रल के तुरदे रैंदे वां।
दुख-सुख, इक दूजे नूं वेख-वेख
कुझ कैंदे रैंदे आं
कुझ सुणदे रैंदे आं।
बगीचे विच सानूं
तुरदेयां वेख के
फुल्ल हर वार सानूं बुला लेंदे हण
असी फुल्लां दे घेरे विच बैठ के
फुल्लां नूं वी
अपणा-अपणा कलाम सुनादें आं।
ओ अपनी अनलिखी कविता सुनांदी है
ते मैं वी अपणी अनलिखी नज़म सुनांदा वा
कोल खड़ा वक्त
एह अनलिखी शायरी सुनदा-सुनदा
अपणा रोज दा
नेम भुल जांदा ए।
जदों वक्त नूं
वक्त याद आंदा ए
कदे शाम हो गई होंदी है
कदे रात उतर आई होंदी है
ते कदे दिन चढ़या आया होंदा है।
उसने जिस्म छडया है साथ नहीं...
- इमरोज़
