(लिवइन रिलेशनशिप पर इमरोज़)
गुलज़ार की बात से शुरू करूं तो यह कहना क्या ग़लत है कि सिर्फ़ अहसास है ये रूह से महसूस करो...। यह भी कहा जा सकता हे कि सिर्फ़ महसूस करने से तो पेट नहीं भर जाता, लेकिन मैं तो अपना उदाहरण देकर ही बता सकता हूं कि अहसास सबसे बड़ी चीज़ है और अगर आपमें ईमानदारी और निष्ठा है तो फिर उस आदर्श जीवन की कल्पना आराम से की जा सकती है जिसमें किसी क़ानून की ज़रूरत हो ही नहीं। सारी बात अपने ज़मीर को जगाए रखने की है जिसमें मेरे ख़याल से क़ानून तो कोई मदद कर नहीं सकता।
ये कहना है इमरोज़ का। लिव इन पर चल रही चर्चा के तहत उनसे लंबी बातचीत हुई अखबार के लिए। थोड़ी सी फेर बदल के साथ यहां पेश है। लेख लंबा है, थोड़े धैर्य की ज़रूरत तो होगी ही-
हमारे दोस्त बताते हैं कि कुछ मुल्कों में ऐसा कानून है कि दो लोग दो साल या इससे ज़्यादा वक़्त तक एक साथ रह रहे हैं तो उनके बीच मियां-बीवी का रिश्ता मान लिया जाता है। अब मुंबई में इसके लिए क़ानून की धारा में संशोधन की बात चल रही है तो मैं एक ही बात सोच रहा 9हूं कि क्या रिश्तों को जोड़ने और तोड़ने के लिए किसी क़ानून की ज़रूरत होनी चाहिए....क्या इंसान के अंदर की ईमानदारी और कमिटमेंट निबाह लेने के लिए काफ़ी नहीं हैं...? लिव-इन हो या पक्के मंत्र पढ़कर बनाया गया साथ रहने का इंतज़ाम, दोनों में ही ’ज़्यादा ज़रूरी तो ईमानदारी ही है। अगर ईमानदारी और जिम्मेदारी व्यक्ति में है ही नहीं तो उसे पैदा करने के लिए किस धारा में संशोधन किया जा सकेगा...? ज़मीर को जगाने के लिए कौन का क़ानून बनाया जाएगा...।
मुझे लिव इन में एक अच्छी बात तो यही दिखती है कि कोई एक दूसरे का मालिक नहीं होता। एक साथ रहने का फै़सला इसलिए नहीं लिया गया होता कि वे किसी बंधन में हैं। इसके उलट विधिवत शादी में पहले दिन से पुरुष, स्त्री का स्वामी बन गया होता है। हैरान कर देने वाली बात यह भी है कि आज तक इस बात पर किसी ने एतराज़ भी नहीं जताया। किसी औरत ने पलटकर यह नहीं कहा कि यह शब्द हटाओ। मैं किसी की मिल्कियत नहीं हूं। मेरा कोई स्वामी नहीं है, हां साथी हो सकता है।
यह शादी है क्या....? तो दिखता है कि यह पूरी तरह एक क़ानून और व्यवस्था है, जिसके तहत दो अजनबियों को एकसाथ रहने की इजाज़त मिल जाती है। उनसे उम्मीद की जाती है शादी की पहली ही रात एक ऐसा संबंध बना लेने की जो एक और अजनबी को पैदा करके उनकी जिंदगी में अजनबियत का जंगल खड़ा कर दे। ऐसा ही होता भी है। तो इनके बीच में रिश्ता नहीं कानून रहता है। व्यवस्था रहती है और उस व्यवस्था को अक्सर निभाया ही जाता है, जिया नहीं जाता। इस बात से इत्तेफ़ाक़ न रखने वाले लोग काफ़ी हो सकते हैं लेकिन ध्यान से देखें तो सच यही दिखेगा। एक औरत और मर्द के बीच पहले रिश्ता हो और बाद में साथ रहने की व्यवस्था....क्या ऐसा होता है हमारे समाज में। रिश्ता जोड़ने के नाम पर ज़्यादा से ज़्यादा हम एक दूसरे को देखने जाते हैं शादी से पहले। परिवारों के बीच परिचय होता है, एक दूसरे की संपत्ति की पहचान करते हैं और इस बात तो मापते हैं कि इस तरह जुड़ने में कितने फ़ायदे और नुकसान हैं । शादी हो जाती है। बहुत हुआ तो इस बीच लड़के-लड़की को मिलने की इजाज़त मिल जाती है, जहां वे पूरी तरह से नकली होकर एक दूसरे को इम्प्रेस करने की कोशिश करते रहते हैं। इसका नतीजा क्या होता है....एक झूठ को आप सच समझने की भूल करते हैं और बाद में जब सच सामने आता है तो सब सपने टूटते लगते हैं। जब ऐसा ज़्यादातर मामलों में हो ही रहा है तो क्या अर्थ है उस व्यवस्था का जिसे शादी कहते हैं।
जिस का़नून की हम बात कर रहे हैं अगर वह बनता भी है तो उससे इतनी मदद होगी कि पुरुष, स्त्री को छोड़कर भागने से पहले एक बार सोचेगा ज़रूर, और अगर चला भी गया तो कम से कम पीछे छूट गई औरत उस सामाजिक प्रताड़ना से बच जाएगी जिससे वह अब गुज़रती है। लेकिन इसके बावजूद सवाल वहीं है कि जो आदमी किसी को छोड़कर भागता है क्या वह रिश्तों में ईमानदार था....अगर नहीं तो ऐसे आदमी की पत्नी कहलाने में किसे गौरव महसूस करना है। हां इसके आर्थिक पहलू ज़रूर मायने रखते हैं।
इस संदर्भ में एक बात और कही जा सकती है कि गै़र जि़म्मेदार और बेईमान आदमी चाहे लिव इन रिलेशनशिप में हो या शादी की व्यवस्था में...उसका कुछ नहीं किया जा सकता। सामर्थ्य पुरुष को अराजक बनाती है और वे चाहे छुपकर इस तरह के संबंध बनाएं या खुलकर उन्हें बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता। मुंबई की ही बात लें तो दिखता नहीं है क्या कि किस तरह सक्षम लोग एक से ज़्यादा संबंध जीवन भर आराम से चलाते रहते हैं। उन्हें कभी न तो प्रताडि़त किया जाता है और न ही उन्हें किसी क़ानून की ज़रूरत होती है। क्योंकि ये सामर्थ्यवान हैं तो अपनी जिंदगी में आई औरत के लिए आर्थिक व्यवस्था कर देना इनके लिए मुश्किल नहीं होता।
यानी इस क़ानून की ज़रूरत मध्यम वर्ग के लिए ही हुई न। यही मध्यम वर्ग तो शादी को सात जनम का बंधन मानकर चलता है और अब लिव इन के नए खा़के में फि़ट होकर जिंदगी के अर्थ ढूंढना चाहता है। लेकिन अहम सवाल अब भी बाक़ी है अगर का़नून लिव इन को पति-पत्नी के दर्जे की स्वीकृति दे भी दे तो क्या इससे लोगों के अंदर ईमानदारी और जि़म्मेदारी पैदा हो जाएगी...? याद रख लेने की बात है कि एक ऐसी व्यवस्था का़नून ज़रूर दे सकता है जो साथ रहने को वैध कर दे लेकिन ऐसे जज़्बात तो अपने अंदर ही पैदा करने होंगे जो इस साथ को रिश्ते का नाम दे सकें। मैं तो यह भी कहता हूं कि ईमानदार सिर्फ़ साथ रहने में नहीं एक दूसरे का साथ छोड़ने में भी होनी चाहिए। अगर आप रिश्तों को निबाह पाने में असमर्थ हैं तो बेईमानी करने से बेहतर है कि साफ़ कह दिया जाए। लेकिन देखने में यही आता है कि लोग बरसों बरस उन रिश्तों को ओढ़ते-बिछाते रहते हैं जो दरअसल रिश्ते रह ही नहीं गए होते।
Showing posts with label तेरी रज़ा मेरी रज़ा. Show all posts
Showing posts with label तेरी रज़ा मेरी रज़ा. Show all posts
Wednesday, October 22, 2008
Friday, September 12, 2008
टेबल कैलेंडर पर चौमासा
बूंदें बाहर आकर भिगो तो नहीं डालेंगी.. और न ही सख़्त गर्मी की उमस आकर सांस को घोटना शुरू करेगी । गर्मी, जंगल, नदी और पहाड़ सब से बात की जा सकती है लेकिन इस ह्यूमिडिटी का क्या करूं, जो बारिश के बाद भी छंटती नहीं। और.. हवा कितनी भारी सी हो जाती है इन दिनों, मुझे हल्की हवा चाहिए, जो सांस में आराम से घुल जाए, मेहनत न करनी पड़े। आप कह सकते हैं कि कितनी फिजू़ल सोच है, हवा क्या ज़रूरत के मुताबिक़ हल्की और भारी की जा सकती है। सही है, सबकी तरह हवा की भी तो अपनी मर्जी है। तो ठीक है न, करे वो भी अपनी मर्जी़... पर ... इस टेबल कैलेंडर को तो मेरी मर्जी़ से ही चलना होगा। मैं इससे बिल्कुल नहीं डरती। महीना बदले और पन्ना भी बदलूं, ज़रूरी नहीं है। भूल भी सकती हूं। याद आने पर पिछले महीनों से माफ़ी भी क्यों मांगूं मैं....। जब तक वो मेरी बाईं टेबल पर पड़ा है, उसे मेरी मर्जी़ से ही चलना होगा। बाद में दिल करेगा, तो रद्दी में दबा दूंगी, न हुआ तो बालकनी से ऐसे उछालकर फेंक दूंगी कि दूर जाकर गिरेगा।
कैलेंडर की तारीख़ों पर लगे टिक हर बार ज़रूरी नहीं कि एक लंबी कहानी कहेंगे, उनके अंदर, ज़्यादा अंदर झांकने की ज़रूरत भी नहीं है। हो सकता है, जून की जिस तारीख़ पर आप टकटकी लगाकर कुछ डीकोड करना चाह रहे हैं, वहां धोबी को एडवांस दिए गए पैसों की ख़ुफि़या इबारत दर्ज हो। या फिर किसी ऐसे जन्मदिन की तारीख़, जिसे याद रखने का ज़रा सा भी मन नहीं था। अब ये साबित करने पर भी न तुल जाइए कि बेहद वाहियात किस्म की बातों को याद करके गोले लगाए गए हैं इस महीने की तारीख़ों के आगे। सोचने की ज़रूरत है कि इतनी गर्मी के बीच इस कैलेंडर पर टिकी हरियाली और पीला बसंत नकली होते हुए भी महीने भर अजीब सी राहत देता रहा है। कई बार नकली चीजे बड़ी राहत देती हैं, इसमें वाहियात क्या है....।
मुझसे कोई हिसाब नहीं दिया जाएगा। किसी धोबी, दूधवाले या काम वाली किसी का भी नहीं। पहले ही बता दिया था, गणित कमज़ोर है। इतिहास की बातें कर लेना, चाहो तो। सारी किताबें ज़बानी याद हैं। बिना गोले लगी तारीखों में भी ढूंढकर बता सकती हूं कि रजि़या ने किस दिन याक़ूत को हव्वा की नज़र से देखा था। उसके बाद की कहानी भी बिना किसी झोल के सुनाई जा सकती है। कोई ज़रूरी है क्या कि गोलों में क़ैद तारीखें ही सच बोलें। अगर ऐसा होता, तो इंडिया-पाकिस्तान के मैच के बाद देर रात पड़ोस के मियां-बीवी की ऐतिहासिक मारपीट वाली तारीख़ पर गोला न लग गया होता। या फिर उस रात की कहानी पर भी तो गोला लगाया ही जा सकता था, जब उसी मियां-बीवी को मैंने छत पर नाचते-गाते देखा था।
टेबल कैलेंडर पर बनाई तस्वीरें स्कूली बच्चों की हैं और तारीखों पर लगे गोले उन हाथों के, जिन्होंने कभी झूठ नहीं लिखा था।
कैलेंडर की तारीख़ों पर लगे टिक हर बार ज़रूरी नहीं कि एक लंबी कहानी कहेंगे, उनके अंदर, ज़्यादा अंदर झांकने की ज़रूरत भी नहीं है। हो सकता है, जून की जिस तारीख़ पर आप टकटकी लगाकर कुछ डीकोड करना चाह रहे हैं, वहां धोबी को एडवांस दिए गए पैसों की ख़ुफि़या इबारत दर्ज हो। या फिर किसी ऐसे जन्मदिन की तारीख़, जिसे याद रखने का ज़रा सा भी मन नहीं था। अब ये साबित करने पर भी न तुल जाइए कि बेहद वाहियात किस्म की बातों को याद करके गोले लगाए गए हैं इस महीने की तारीख़ों के आगे। सोचने की ज़रूरत है कि इतनी गर्मी के बीच इस कैलेंडर पर टिकी हरियाली और पीला बसंत नकली होते हुए भी महीने भर अजीब सी राहत देता रहा है। कई बार नकली चीजे बड़ी राहत देती हैं, इसमें वाहियात क्या है....।टेबल कैलेंडर कोई इंसान है क्या, जो बता देगा कि जुलाई में आप किन तारी़खों पर झगड़ते रहे और किन पर बिल्कुल शांत होकर अपना काम करते रहे। हां उसने देख लिया था आपके नथुनो को फूलते-पिचकते, कई बार गु़स्से में इतना जो़र से चिल्लाते कि बेचारा वो भी हिलकर रह गया, लेकिन तो भी वो ये सब बता तो नहीं सकता। एक नज़र डालते ही आपको याद आ गया न कि बारिश में छाता लिए इन बच्चों ने कितनी बार कहा था जाओ यार ऑफिस के बाहर निकलो, बारिश देखो, भीग लो ज़रा सा। नहीं माने न, अब तारीख़ों से बिल्कुल मत पूछिए उस कहानी को। कुछ नहीं मिलेगा वहां से। हां ख़ुद ही डूबते रहिए उस तारीख़ के गोले में, जब आपने घुटना-घुटना पानी में घर जाकर पकौड़े बनाए थे।
सावन और भादों का फ़र्क़ कम से कम इस कैलेंडर के जरिए समझने की ज़रूरत मुझे नहीं है। मेरा हिसाब अलग है। मैं अड़कर बैठी हूं कि चार महीने सिर्फ़ सावन होता है, जि़द पर अड़ा हुआ, अटका हुआ सावन। तारीखें झूठ न भी बोलें, तो भी मैं अपनी बात से नहीं हटने वाली। जन्माष्टमी और राखी को आना है, तो इसी सावन में आ जाएं। और भी अगर कोई आना चाहे, तो सावन अभी बाक़ी है। पर, तारीख पर लगा एक गोला जोर से चिल्लाकर मुझे महीनों पहले रची गई साजि़श का हिसाब क्यों गिनाता है। मैं दिन जोड़ती हूं, हां बिल्कुल ठीक निकलता है हिसाब। लेकिन इतने दिनों तक समझ क्यों नहीं आया, मेरा गणित शुरू से कमज़ोर रहा है, बड़ी शर्म की बात है। एक और गोला शर्मिंदगी का।
मुझसे कोई हिसाब नहीं दिया जाएगा। किसी धोबी, दूधवाले या काम वाली किसी का भी नहीं। पहले ही बता दिया था, गणित कमज़ोर है। इतिहास की बातें कर लेना, चाहो तो। सारी किताबें ज़बानी याद हैं। बिना गोले लगी तारीखों में भी ढूंढकर बता सकती हूं कि रजि़या ने किस दिन याक़ूत को हव्वा की नज़र से देखा था। उसके बाद की कहानी भी बिना किसी झोल के सुनाई जा सकती है। कोई ज़रूरी है क्या कि गोलों में क़ैद तारीखें ही सच बोलें। अगर ऐसा होता, तो इंडिया-पाकिस्तान के मैच के बाद देर रात पड़ोस के मियां-बीवी की ऐतिहासिक मारपीट वाली तारीख़ पर गोला न लग गया होता। या फिर उस रात की कहानी पर भी तो गोला लगाया ही जा सकता था, जब उसी मियां-बीवी को मैंने छत पर नाचते-गाते देखा था।
टेबल कैलेंडर पर बनाई तस्वीरें स्कूली बच्चों की हैं और तारीखों पर लगे गोले उन हाथों के, जिन्होंने कभी झूठ नहीं लिखा था।
Monday, August 11, 2008
अपने-अपने इमरोज़
पहली पोस्ट पर अपने कमेंट में घुघूती जी ने लिखा था...हम सब अपने-अपने इमरोज़ को ढूँढ रही हैं। परन्तु क्या इतने इमरोज़ इस संसार ने पैदा किये हैं?....ऐसे ही सवाल निरुपमा में घर में भी उठे थे उस दिन। लंबी बातचीत के बीच कभी कोई कह उठती हमें इमरोज़ क्यों नहीं मिला.. तो किसी ने कहा- हमारे हिस्से का इमरोज़ कहां है....? कहां है वो शख्स जो अपनी पीठ पर एक गै़र नाम की इबारत को महसूस करते हुए भी पीठ नहीं दिखाता? एक हाथ से दी गई थाली को दो हाथों से स्वीकार करते हुए अपने चेहरे पर एक शिकन तक आने नहीं देता... कहां है वो प्रेम जो खु़द को मिटा देने की बात करता है.... कहां है वो इंसान जो किसी के चले जाने के बाद भी उसके साथ होने की बात करता है? हम सब ढूंढती हैं पर वो कहीं नहीं दिखता। शायद इसलिए कि ऐसे इमरोज़ को पाने से पहले अमृता हो जाना पड़ता है। दुनियादारी की चादर को इस तरह तह करके रखकर भूल जाना होता है कि उसकी याद तक न आए। उस चादर को बिना बरते जिंदगी गुज़ार सकने की हिम्मत पैदा कर लेनी होती है। हो सकता है, बहुत सारे अमृता और इमरोज एक ही वक़्त पर एक ही जगह इसलिए भी न दिख पाते हों कि उन्हें याद ही नहीं रहा है दुनियादारी और दुश्वारियों की चादर को कैसे तह करके रखा जाता है।
खै़र अपनी-अपनी चादरों की संभाल के बीच भी अपने-अपने इमरोज़ को ढूंढते रहा जा सकता है, क्योंकि ईश्वर अभी भी है कहीं...। मैंने उनसे इजाज़त ली और एक बार फिर ये नज़्म सुनाने को कहा-
साथ
उसने जिस्म छडया है, साथ नहीं
ओह हुण वी मिलदी है
कदे बदलां छांवे
कदे तारेयां दी छांवे
कदे किरणां दी रोशनी विच
कदे ख्यालां दे उजाले विच
असी रल के तुरदे रैंदे वां।
दुख-सुख, इक दूजे नूं वेख-वेख
कुझ कैंदे रैंदे आं
कुझ सुणदे रैंदे आं।
बगीचे विच सानूं
तुरदेयां वेख के
फुल्ल हर वार सानूं बुला लेंदे हण
असी फुल्लां दे घेरे विच बैठ के
फुल्लां नूं वी
अपणा-अपणा कलाम सुनादें आं।
ओ अपनी अनलिखी कविता सुनांदी है
ते मैं वी अपणी अनलिखी नज़म सुनांदा वा
कोल खड़ा वक्त
एह अनलिखी शायरी सुनदा-सुनदा
अपणा रोज दा
नेम भुल जांदा ए।
जदों वक्त नूं
वक्त याद आंदा ए
कदे शाम हो गई होंदी है
कदे रात उतर आई होंदी है
ते कदे दिन चढ़या आया होंदा है।
उसने जिस्म छडया है साथ नहीं...
- इमरोज़
Sunday, August 10, 2008
इस बार तू पहले ब्याह मत करना
पिछली पोस्ट से आगे
सच को दूर से देखो तो उस पर सहज ही विश्वास हो जाता है। सामने आकर खड़ा हो जाए तो उसे छूकर, परख लेने का जी होता है। शायद हम तसल्ली कर लेना चाहते हैं कि सच को छूना ऐसा होता है, उसे जान लेना ऐसा होता है। अमृता-इमरोज़ का प्रेम ऐसा सच है जो पूरा का पूरा उजागर है। कहीं कुछ छिपा हुआ नहीं दिखता... तो भी इमरोज़ को सामने पाकर इच्छा होती है जान लेने कि फलां बात कैसे शुरू हुई थी, फलां वक़्त क्या गुज़री थी उनपर। यही वजह थी दोपहर से लेकर शाम तक इमरोज अमृता की ही बातें करते रहे। ये सारी बातें वही थीं जो हम अब तक कई बार पढ़ चुके थे, सुन चुके थे।
इमरोज़ सुनाने लगे- उड़दे क़ाग़ज़ ते मैं उसनूं नज्मां लिखदा रहंदा हां, जदों वी कोई पंछी आके मेरे बनेरे ते आ बैठदा, मैं जवाब पढ़ लेंदा हां....। नज़्मों का अमृता तक जाना और उसके जवाब का आ जाना... ये बात शायद किसी के लिए एक ख़याल भर हो सकती है, लेकिन इमरोज़ के लिए उतना ही सच है, जितना उनके आंगन में खिले वो हरे बूटे जिन्हें पानी देते हुए वे अक्सर 'बरकते...' कहकर अमृता को पुकारा करते थे। उनमें से कुछ पौधों ने उन्हें साथ देखा ही होगा न, और उस बनेरे ने भी... जिस पर आकर पंछी बैठते हैं। मुझे लगा कि उन्हें साथ देखकर ही किसी दिन पंछी और बनेरे के बीच तय हुआ होगा इस संदेस के ले जाने और लाने का मामला।
इमरोज़ उस घर में रहते हैं जहां अमृता का परिवार है। जब मैंने पहली बार वो घर देखा तो ऊपरी तरफ़ कुछ विदेशी लड़कियां किराए पर रहती थीं। और नीचे की जगह में 'नागमणि' का दफ़्तर था। अब वहां क्या है...? इमरोज़ बताते हैं- अब नीचे भी किराए पर दे दी है जगह। अपनी जेब से इमरोज़ काग़ज़ का पैकेट सा निकालते हैं। पता चला वे चमड़े का बटुवा नहीं रखते। एक काग़ज के लिफ़ाफे़ में पैसे रखकर उस पर कुछ टेलीफोन नंबर लिखते हैं जिन्हें इमरजेंसी में कॉल किया जा सके। ये नंबर उनके हैं जो अमृता के बच्चे हैं। इमरोज़ और अमृता के नहीं। इतना साथ, इतना प्यार, इतना समर्पण, तो इन दोनों के बच्चे क्यों नहीं.....? इमरोज़ बताते हैं- अमृता तो पहले ही दो बच्चों की मां थी। हमने मिलकर तय किया था कि इनके अलावा हम और कुछ नहीं सोचेंगे। लेकिन क्या तय कर लेना भर काफ़ी था, अपनी इच्छाओं के आगे...? उन्होंने कहा- काफ़ी नहीं था पर हमने इसे मुमकिन कर लिया था। एक बार मैंने उसे कहा- अगली बार जब मिलेंगे, तो हम अपने बच्चे पैदा करेंगे... बस इस बार तू मुझसे पहले ही ब्याह मत कर लेना। अमृता ने जाते-जाते भी मुझसे यही कहा है न- मैं तैनूं फेर मिलांगीं...

इमरोज़ उस तस्वीर को देख रहे थे जिसमें अमृता उनके हाथ में खाने की थाली पकड़ा रही हैं। तस्वीर का सच उनके चेहरे पर उतर कर आ बैठा था। मानो कह रहा हो, कितने मूर्ख हो तुम सब, जो इस रिश्ते को परिभाषा में बांधने की बात करते हो। इस तस्वीर को देखो और दुनिया की किसी भी पतिव्रता के चेहरे से उसका मिलान कर लो, कहीं भी कोई भाव को उतार पाएगी क्या, जो अम्रता की आंखों में नजर आ रहा है। अमृता दाएं हाथ से थाली पकड़ा रही हैं और इमरोज़ दोनों हाथों से उसे स्वीकार कर रहे हैं। ये महज तस्वीर नहीं है, इसमें एक फ़लसफ़ा नज़र आ रहा है। किसी को खुद को सौंप देने का, किसी का उसे दोनों हाथों से स्वीकार कर लेने का, हमेशा-हमेशा के लिए। ग़ौर से देखेंगे, तो आप भी पाएंगे कि वहां रखे पतीले और चमचे से लेकर हर छोटी-बड़ी चीज़ बुलंद आवाज़ में बता रही है कि यहां किसी ऐसे सीमेंट की ज़रूरत नहीं है, जो इन दोनों को पक्के जोड़ में जकड़ दे। न ही किसी ऐसी भीड़ की ज़रूरत, जिसकी गवाही में इन दोनों को बताना पड़े कि हां हमें साथ रहना है अब। एक वक़्त की रोटी जब इस तरह साथ खाई जाती है, तो फिर जन्म भर क्या किसी और थाली से खाने की भूख रह जाती होगी....। इमरोज़ शायद इसीलिए कभी किसी और ठौर पर रोटी खाने नहीं गए होंगे।
अगली पोस्ट में जारी....
सच को दूर से देखो तो उस पर सहज ही विश्वास हो जाता है। सामने आकर खड़ा हो जाए तो उसे छूकर, परख लेने का जी होता है। शायद हम तसल्ली कर लेना चाहते हैं कि सच को छूना ऐसा होता है, उसे जान लेना ऐसा होता है। अमृता-इमरोज़ का प्रेम ऐसा सच है जो पूरा का पूरा उजागर है। कहीं कुछ छिपा हुआ नहीं दिखता... तो भी इमरोज़ को सामने पाकर इच्छा होती है जान लेने कि फलां बात कैसे शुरू हुई थी, फलां वक़्त क्या गुज़री थी उनपर। यही वजह थी दोपहर से लेकर शाम तक इमरोज अमृता की ही बातें करते रहे। ये सारी बातें वही थीं जो हम अब तक कई बार पढ़ चुके थे, सुन चुके थे।
इमरोज़ सुनाने लगे- उड़दे क़ाग़ज़ ते मैं उसनूं नज्मां लिखदा रहंदा हां, जदों वी कोई पंछी आके मेरे बनेरे ते आ बैठदा, मैं जवाब पढ़ लेंदा हां....। नज़्मों का अमृता तक जाना और उसके जवाब का आ जाना... ये बात शायद किसी के लिए एक ख़याल भर हो सकती है, लेकिन इमरोज़ के लिए उतना ही सच है, जितना उनके आंगन में खिले वो हरे बूटे जिन्हें पानी देते हुए वे अक्सर 'बरकते...' कहकर अमृता को पुकारा करते थे। उनमें से कुछ पौधों ने उन्हें साथ देखा ही होगा न, और उस बनेरे ने भी... जिस पर आकर पंछी बैठते हैं। मुझे लगा कि उन्हें साथ देखकर ही किसी दिन पंछी और बनेरे के बीच तय हुआ होगा इस संदेस के ले जाने और लाने का मामला।
इमरोज़ उस घर में रहते हैं जहां अमृता का परिवार है। जब मैंने पहली बार वो घर देखा तो ऊपरी तरफ़ कुछ विदेशी लड़कियां किराए पर रहती थीं। और नीचे की जगह में 'नागमणि' का दफ़्तर था। अब वहां क्या है...? इमरोज़ बताते हैं- अब नीचे भी किराए पर दे दी है जगह। अपनी जेब से इमरोज़ काग़ज़ का पैकेट सा निकालते हैं। पता चला वे चमड़े का बटुवा नहीं रखते। एक काग़ज के लिफ़ाफे़ में पैसे रखकर उस पर कुछ टेलीफोन नंबर लिखते हैं जिन्हें इमरजेंसी में कॉल किया जा सके। ये नंबर उनके हैं जो अमृता के बच्चे हैं। इमरोज़ और अमृता के नहीं। इतना साथ, इतना प्यार, इतना समर्पण, तो इन दोनों के बच्चे क्यों नहीं.....? इमरोज़ बताते हैं- अमृता तो पहले ही दो बच्चों की मां थी। हमने मिलकर तय किया था कि इनके अलावा हम और कुछ नहीं सोचेंगे। लेकिन क्या तय कर लेना भर काफ़ी था, अपनी इच्छाओं के आगे...? उन्होंने कहा- काफ़ी नहीं था पर हमने इसे मुमकिन कर लिया था। एक बार मैंने उसे कहा- अगली बार जब मिलेंगे, तो हम अपने बच्चे पैदा करेंगे... बस इस बार तू मुझसे पहले ही ब्याह मत कर लेना। अमृता ने जाते-जाते भी मुझसे यही कहा है न- मैं तैनूं फेर मिलांगीं...
इमरोज़ उस तस्वीर को देख रहे थे जिसमें अमृता उनके हाथ में खाने की थाली पकड़ा रही हैं। तस्वीर का सच उनके चेहरे पर उतर कर आ बैठा था। मानो कह रहा हो, कितने मूर्ख हो तुम सब, जो इस रिश्ते को परिभाषा में बांधने की बात करते हो। इस तस्वीर को देखो और दुनिया की किसी भी पतिव्रता के चेहरे से उसका मिलान कर लो, कहीं भी कोई भाव को उतार पाएगी क्या, जो अम्रता की आंखों में नजर आ रहा है। अमृता दाएं हाथ से थाली पकड़ा रही हैं और इमरोज़ दोनों हाथों से उसे स्वीकार कर रहे हैं। ये महज तस्वीर नहीं है, इसमें एक फ़लसफ़ा नज़र आ रहा है। किसी को खुद को सौंप देने का, किसी का उसे दोनों हाथों से स्वीकार कर लेने का, हमेशा-हमेशा के लिए। ग़ौर से देखेंगे, तो आप भी पाएंगे कि वहां रखे पतीले और चमचे से लेकर हर छोटी-बड़ी चीज़ बुलंद आवाज़ में बता रही है कि यहां किसी ऐसे सीमेंट की ज़रूरत नहीं है, जो इन दोनों को पक्के जोड़ में जकड़ दे। न ही किसी ऐसी भीड़ की ज़रूरत, जिसकी गवाही में इन दोनों को बताना पड़े कि हां हमें साथ रहना है अब। एक वक़्त की रोटी जब इस तरह साथ खाई जाती है, तो फिर जन्म भर क्या किसी और थाली से खाने की भूख रह जाती होगी....। इमरोज़ शायद इसीलिए कभी किसी और ठौर पर रोटी खाने नहीं गए होंगे।
अगली पोस्ट में जारी....
Friday, August 8, 2008
एक है अमृता... एक है इमरोज़
इस ब्लॉग की शुरुआत किसी और पोस्ट से होनी थी। जिसमें होता आज जैसे ही एक दिन का जि़क्र.... ताजमहल, बरसात, नाटक और असमय इस दुनिया से चले गए किसी दोस्त की याद... या फिर इमली के पेड़ और उबले हुए मसालेदार भुट्टे की बात... या फिर कोई ऐसा कि़स्सा जो लंबे रास्ते पर रुकी हुई एक किलोमीटर लंबी बारिश से जुड़ा हो... ऐसा हुआ नहीं, शायद होना नहीं था इसीलिए ही। सो, सब एक उधार की तरह दर्ज हो रहा है कहीं न कहीं, फि़लहाल जो लिखा जा सकता है, वो पढि़ए-

हम ऑनलाइन थे, लेकिन निरुपमा को अपनी बात कहने के लिए फोन करना ठीक लगता है। बताया... इमरोज़ आ रहे हैं. सात तारीख़ को दोपहर में तुम भी आ जाओ। पहुंची, तो देखा पूरा घर अमृता की पेंटिंग्स और स्केचेज़ से सजा था। जैसे बारात आई हो निरुपमा के घर और दूल्हा बने बैठे हों इमरोज़। तक़रीबन पंद्रह बरस के बाद देखा था उन्हें। लगा, जैसे उनका चेहरा अमृता जैसा होता जा रहा है, प्रेम का संक्रमण ऐसा भी होता है क्या...। थोड़ी देर में ही निरुपमा दत्त का घर दोस्तों से भर गया। इमरोज़ ने नज़्म पढ़ना शुरू किया। एक के बाद एक, पढ़ते गए। हाथ में फोटोस्टेट किए पचास से ज़्यादा काग़ज़ थे। सबमें अमृता। वो उसके अलावा कुछ और सोच सकते हैं क्या, मुझे लगा नहीं और कुछ सोचना भी नहीं चाहिए उन्हें।
एक थी अमृता... कहने से पहले ही इमरोज़ टोक देते हैं। फिर दुरुस्त कराते हैं- कहो एक है अमृता। हां, उनके लिए अमृता कहीं गई ही नहीं। कहने लगे- एक तसव्वुर इतना गाढ़ा है कि उसमें किसी ऐसी हक़ीक़त का ख़याल ही नहीं कर पाता, जिसमें मैं अकेला हूं। हम उस घर में जैसे पहले रहते थे, वैसे ही अब भी रहते हैं। लोग कहते हैं, अमृता नहीं रही... मैं कहता हूं- हां, उसने जिस्म छोड़ दिया, पर साथ नहीं। ये बात कोई और कहता, तो कितनी किताबी-सी लगती। उनके मुंह से सुना, तो लगा जैसे कोई इश्कि़या दरवेश एक सच्चे कि़स्से की शुरुआत करने बैठा है। उन्होंने सुनाया- प्यार सबतों सरल इबादत है...सादे पाणी वरगी। हां, ऐसा ही तो है, बिलकुल ऐसा ही, हम कह उठते हैं। लेकिन ये सादा पानी कितनों के नसीब में है... इस पानी में कोई न कोई रंग मिलाकर ही तो देख पाते हैं हम। वो ताब ही कहां है, जो इस पानी की सादगी को झेल सके।
घर के बाहर बरसात थी और अंदर भी। नज़्मों और रूह से गिरते उन आंसुओं की, जो कइयों को भिगो रहे थे। पहली मुलाक़ात का जि़क्र हमेशा से करते आए हैं, एक बार फिर सुनाने लगे- उसे एक किताब का कवर बनवाना था। मैंने उस दिन के बाद सारे रंगों को उसी के नाम कर दिया। जहां इमरोज़ बैठे थे, ठीक पीछे एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो रखा था। एक रेलिंग के सहारे हाथ में हाथ पकड़े उन दोनों को देखकर मैंने पूछा, ये कहां का है। उन्होंने बताया- जब हम पहली बार घूमने निकले, तो पठानकोट बस स्टैंड पर ये फोटो खिंचवाया था। इमरोज़ को रंगों से खेलना अच्छा लगता है, लेकिन अपनी जि़ंदगी में वे बहुत सीधे तौर पर ब्लैक एंड व्हाइट को तरजीह देते हैं। यहां तक कि अपने कमरे की चादरों में भी यही रंग पसंद हैं उन्हें, जबकि अमृता के कमरे में हमेशा रंगीन चादरों को देखा गया।
जारी... अगली पोस्ट में

हम ऑनलाइन थे, लेकिन निरुपमा को अपनी बात कहने के लिए फोन करना ठीक लगता है। बताया... इमरोज़ आ रहे हैं. सात तारीख़ को दोपहर में तुम भी आ जाओ। पहुंची, तो देखा पूरा घर अमृता की पेंटिंग्स और स्केचेज़ से सजा था। जैसे बारात आई हो निरुपमा के घर और दूल्हा बने बैठे हों इमरोज़। तक़रीबन पंद्रह बरस के बाद देखा था उन्हें। लगा, जैसे उनका चेहरा अमृता जैसा होता जा रहा है, प्रेम का संक्रमण ऐसा भी होता है क्या...। थोड़ी देर में ही निरुपमा दत्त का घर दोस्तों से भर गया। इमरोज़ ने नज़्म पढ़ना शुरू किया। एक के बाद एक, पढ़ते गए। हाथ में फोटोस्टेट किए पचास से ज़्यादा काग़ज़ थे। सबमें अमृता। वो उसके अलावा कुछ और सोच सकते हैं क्या, मुझे लगा नहीं और कुछ सोचना भी नहीं चाहिए उन्हें।
एक थी अमृता... कहने से पहले ही इमरोज़ टोक देते हैं। फिर दुरुस्त कराते हैं- कहो एक है अमृता। हां, उनके लिए अमृता कहीं गई ही नहीं। कहने लगे- एक तसव्वुर इतना गाढ़ा है कि उसमें किसी ऐसी हक़ीक़त का ख़याल ही नहीं कर पाता, जिसमें मैं अकेला हूं। हम उस घर में जैसे पहले रहते थे, वैसे ही अब भी रहते हैं। लोग कहते हैं, अमृता नहीं रही... मैं कहता हूं- हां, उसने जिस्म छोड़ दिया, पर साथ नहीं। ये बात कोई और कहता, तो कितनी किताबी-सी लगती। उनके मुंह से सुना, तो लगा जैसे कोई इश्कि़या दरवेश एक सच्चे कि़स्से की शुरुआत करने बैठा है। उन्होंने सुनाया- प्यार सबतों सरल इबादत है...सादे पाणी वरगी। हां, ऐसा ही तो है, बिलकुल ऐसा ही, हम कह उठते हैं। लेकिन ये सादा पानी कितनों के नसीब में है... इस पानी में कोई न कोई रंग मिलाकर ही तो देख पाते हैं हम। वो ताब ही कहां है, जो इस पानी की सादगी को झेल सके।
घर के बाहर बरसात थी और अंदर भी। नज़्मों और रूह से गिरते उन आंसुओं की, जो कइयों को भिगो रहे थे। पहली मुलाक़ात का जि़क्र हमेशा से करते आए हैं, एक बार फिर सुनाने लगे- उसे एक किताब का कवर बनवाना था। मैंने उस दिन के बाद सारे रंगों को उसी के नाम कर दिया। जहां इमरोज़ बैठे थे, ठीक पीछे एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो रखा था। एक रेलिंग के सहारे हाथ में हाथ पकड़े उन दोनों को देखकर मैंने पूछा, ये कहां का है। उन्होंने बताया- जब हम पहली बार घूमने निकले, तो पठानकोट बस स्टैंड पर ये फोटो खिंचवाया था। इमरोज़ को रंगों से खेलना अच्छा लगता है, लेकिन अपनी जि़ंदगी में वे बहुत सीधे तौर पर ब्लैक एंड व्हाइट को तरजीह देते हैं। यहां तक कि अपने कमरे की चादरों में भी यही रंग पसंद हैं उन्हें, जबकि अमृता के कमरे में हमेशा रंगीन चादरों को देखा गया।
जारी... अगली पोस्ट में
Subscribe to:
Posts (Atom)
