Sunday, August 10, 2008

पीठ भी उसकी....साहिर भी उसी का

पिछली पोस्‍ट से जारी....
.... ये सोचना कई बार मुश्किल होता है कि क्‍या रब ने अमृता-इमरोज़ को इसी दुनिया के लिए बनाकर भेजा था.....। फिर ये भी लगता है कि दुनिया में प्‍यार का नाम बाक़ी रहे इसके लिए उसे कुछ न कुछ तो करना ही था न। पर क्‍या इन्‍हें बनाने के बाद रब ने सांचा ही तोड़ डाला....अगर नहीं, तो क्‍यों नहीं दिखते, और कहीं अमृता-इमरोज़...! मेरी सोच गहरी हो जाती, तो वे टोक कर कहते, मेरी नज्‍़मां नईं सुनदी......मैं फिर सुनने लगती ध्‍यान से। बताने लगे "हम एक बार ऐसे ही घूम रहे थे कि अमृता ने पूछा-पैलां वी किसी दे नाल तुरयां ए...(पहले भी कभी किसी के साथ घूमे हो) मैंने कहा-हां तुरयां हां, पर जागा किसे दे नाल नईं (हां, घूमा हूं लेकिन जागा किसी के साथ नहीं)। इसके बाद उसने मेरा हाथ ज़ोर से पकड़ लिया और इस तरह चल पड़ी जैसे सारी सरहदें पार करके आगे जाना हो।" इमरोज़ ने अपनी जाग को फिर कभी ऊंघने नहीं दिया, अमृता के सो जाने के बाद भी।

अमृता-साहिर.इमरोज़.........ये त्रिकोण होकर भी तिकोना नहीं दिखता....कैसी अजीब बात है। इसके कोनों को किसने घिसकर इतना रवां कर दिया कि वे किसी को चुभते ही नहीं। क्‍या था ऐसा.......इमरोज़ बताते हैं-साहिर उसकी मुहब्‍बत था, मैं उससे कैसे इन्‍कार करता...। बरसों से जो वो दिल में रखे थे उसे निकाल फेंकने की कू़वत मुझमें नहीं थी, शायद सच्‍चा इश्‍क़ करने वाले किसी भी इंसान में ऐसी कू़वत नहीं होती। वो तो बस सबकुछ सौंप देता है आंख्‍ा बंद करके, फिर सामने वाले की मर्जी़, वो चाहे जो करे। अमृता की किताबों में दर्ज कि़स्‍से को दोहराते हुए उन्‍होंने कहा "एक बार वो कहीं इंटरव्यू दे आई कि जब वो स्‍कूटर पर पीछे बैठती है तो मेरी पीठ पर उंगली से साहिर-साहिर लिखती रहती है। ये बात मुझे पता नहीं थी। इंटरव्यू आने के बाद लोग मुझसे सवाल करने लगे। मेरा जवाब था- लिखती है तो क्‍या हुआ....ये पीठ भी उसकी है और साहिर भी उसीका, वो चाहे जो करे"। क्‍या सचमुच इतना आसान रहा होगा इसे सहना......उन्‍होंने कहा-हां बिलकुल, मैंने उससे मिलने के बाद ही जाना कि अपने आप को सौंपते वक्‍़त किसी तरह की जिरह की कोई गुंजाइश उठाकर नहीं रखी जाती। खु़द को देना होता है पूरा का पूरा। कुछ भी बचाकर नहीं रखा जाता। कितना सच था इस बात में, वाक़ई कुछ उठाकर रख लेने से ही तो बदनीयती आती है।

वे एक साथ हौज़ख़ास वाले घर में रहे। मैं अंदाजा लगाना चाहती थी इस प्रेम के भौतिक स्‍वरूप का..उन्‍होंने भांपा और बोले-जब शरीर के साथ उस घर में मेरे साथ थी तो हम दोनों मिलकर ख़र्च करते थे। किचन का सामान भरते और साथ मिलकर ही बाक़ी ख़र्च चलाते। कभी पैसे को लेकर कोई सवाल आया ही नहीं। मुझे याद है कि जब मैं इंश्‍योरेंस करवा रहा था तो एजेंट ने पूछा नॉमिनी कौन.... ? मेरा उसके सिवा कौन था जो नाम लेता, कहा अमृता, एजेंट ने पूछा रिश्‍ता बताओ, मैंने वहां लिखवाया दोस्‍त.....क्‍योंकि उस जगह को भरने के लिए एक शब्‍द की ज़रूरत थी। हमारा रिश्‍ता इस शब्‍द का मोहताज नहीं था पर क़ाग़ज़ का पेट भरना ही पड़ा। एजेंट मेरी तरफ़ देखकर हैरान था कि क्‍या दोस्‍त को भी कोई नॉमिनी बनाता है। उसे मेरी बात समझ आनी नहीं थी इसलिए समझाया भी नहीं। बाद में जब वो पॉलिसी मेच्‍योर हुई उसका पैसा हमने साथ मिलकर ख़र्च किया। इमरोज़ फिर सुनाने लगे-दुनिया विच कोई प्राप्ति बणदी........जे मुहब्‍बत कामयाब न होवे....।

अगली पोस्‍ट में जारी..........

9 comments:

मनीषा said...

सही है...प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो....

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर पोस्ट-जारी रहिये.

मीत said...

Shayda Ji, I've gone through almost everything I could lay my hands on - "By and about Amrita and Sahir (Imroz exists always and everywhere" .... but it still seems different and new .... and beautiful, coming from you. Keep it up. We're waiting.

दुनिया विच कोई प्राप्ति बणदी........जे मुहब्‍बत कामयाब न होवे....।

!!! Beauty.

Parul said...

kabhii to lagta hai is trikon me sabsey zyada chubhan imroz ko hui hogi-vo kahen na kahen..jari rakhiye

शायदा said...

सही कहा मीत, अम्रता-इमरोज़ की कहानी सब जानते हैं पूरी की पूरी लेकिन फिर भी सुनते हैं, पढ़ते हैं, लिखते हैं....शायद इसलिए क्‍योंकि इसे दोहराना कहीं न कहीं खु़द को कुछ याद दिला देने जैसा है। आप पढ़ रहे हैं शुक्रिया।
और पारुल, इस त्रिकोण की चुभन इमरोज़ को ज़रूर हुई होगी, होती रही होगी....लेकिन उसके बावजूद निभा ले जाना ही तो कमाल है न। वरना तो ऐसे कि़स्‍से अपने आस पास भी नज़र आ जाएंगे जहां ज़रा सी चुभन के बाद शीशे इस तरह चूर होते हैं कि फिर कभी उनमें कोई अक्‍स नहीं दिख पाता।
आप सब जो पढ़ रहे हैं, शुक्रिया।

नीरज गोस्वामी said...

कहा-हां तुरयां हां, पर जागा किसे दे नाल नईं
वाह....क्या बात है...इमरोज की इस बात का कोई जवाब नहीं...
नीरज

बालकिशन said...

सुंदर और भावुक कर देने वाला लेखन.
अमृता-इमरोज़ गाथा है ही इसी.
जारी रहे...

Mired Mirage said...

पढ़वाती रहिए। कहने को कुछ नहीं है।
घुघूती बासूती

sanjay patel said...

शायदा आपा,
इस क़िस्सागोई के कई रंग पहले भी पढ़े हैं लेकिन हर बार पढ़ने वाले के मन में इमरोज़ और अमृता के शरीरी रिश्ते के बारे में झाँकने की उत्तेजना हमेशा बनी रहती है.मज़ा ये है कि हम संसारी लोग तब बुरा मान जाते हैं जब हमारी निजी स्पेस के बारे में कोई जानना चाहे. मेरा मानना है (और मैने मीनाक्षी जी की प्रेम वाली पोस्ट पर लिखा भी था)कि इमरोज़ और अमृता का प्रेम अशरीरी है.वह एक दूसरे के लिये अपनी पहचान क़ुरबान करने को तत्पर है. आज ज़िन्दगी की सबसे बड़ी परेशानी पहचान को लेकर है.दूसरा जाए भाड़ में मेरी पहचान मुकम्मिल रहना चाहिये. इमरोज़-अमृता ने इस सोच से परे जाकर रिश्ते को निभाया है. एक बड़ी बिरादरी है जो दकियानूसी सोच से हटकर इन दोनो महान मित्रों के हक़ में खड़ी है.मेरे शहर में पिछले बरस इमरोज़ साहब आए थे. प्रश्न-उत्तर सत्र में एक जनाब ने पूछा अमृता के जाने के बाद आप कैसा महसूस करते हैं...पूरा सभागार सन्न....(दबी आवाज़ों में आलोचना भी हुई इस सवाल को लेकर)इमरोज़ विचलित नहीं हुए...बोले ..वह गई ही कहाँ है ?मेरे साथ ही तो है.