Thursday, July 19, 2012

बिछड़े सभी बारी-बारी ..


मेरे घर से तुमको कुछ सामान मिलेगा , दीवाने शायर का एक दीवान मिलेगा और एक चीज़ मिलेगी..टूटा ख़ाली जाम ..फिल्म नमक हराम में रज़ा मुराद के आखि़री पलों में गाते हैं राजेश खन्ना। सबकी आंख नम हो जाती हैं। इससे पहले आनंद में और उससे भी पहले सफ़र फि़ल्म में उन्होंने ऑडियंस को ज़ार ज़ार रुलाया। बाद में उन्होंने कहा-आई हेट टियर्स..लेकिन वे तब तक अनगिनत आंखों में आंसू रोप चुके थे। लोगों ने खुलकर गाया-मेरे सपनों की रानी:::::लेकिन वे नहीं भूले उस उदासी और बेबसी को जो राजेश खन्ना ने पर्दे पर दिखाकर अपने लिए दिलों में एक खास जगह बना ली थी। .ये उनकी सबसे ऊंची परवाज का दौर था। वे जो गाते, वो हर ज़बान पर होता। जो पहनते वो सबकी जिंदगी का हिस्सा बनता। उनकी एक झलक के लिए पब्लिक की दीवानगी इस तरह सामने आती कि अफ़साने बन जाते। लेकिन सबसे ऊंची शाख़ पर बैठे परिंदे को भी कभी नीचे आना पड़ता है। राजेश खन्ना भी बुलंदी से उतरे। ऊंचाई जिस तेजी से  मेले सजाती है ढलान उसी रफतार से अकेलापन सौंपती जाती है। बाद में रह जाती हैं अच्छे दिनों की कहानियां।  राजेश खन्ना की जि़दगी में भी दौलत, शोहरत, मुहब्बत और तोहमतों की कहानियां थीं लेकिन ..सुनने वाले धीरे-धीरे महफिल से उठते जा रहे थे। बारी-बारी बिछड़ते दोस्त और अजीज़ों को उन्होंने किस तरह रुकने को कहा होगा पता नहीं लेकिन जो सामने आया वो थी तन्‍हाई।  काका अपने घर में अकेले रह गए थे। साथ रह गया था जाम। ये जाम भरता तो भरता ही जाता। रोकने वाला कोई हाथ वहां था ही नहीं। यही वजह थी कि पिछले दिनों जब वे पहली बार अस्पताल लाए गए तो उससे कई दिन पहले खाना-पीना छोड़ चुके थे। यक़ीनन ऐसी हालत अकेलेपन का ही नतीजा थी।

आख़री पलों में डिंपल फिर एक बार उनके साथ थीं। जाम पीछे रखा जा चुका था। अपनी तन्हाई की गिरह को खोलते-बांधते उन्होंने जो बातें जाम सामने रखकर की थीं उनकी गूंज को डिंपल ने जरूर सुना होगा, लेकिन अब तक देर हो चुकी थी। यूं भी गूंज, कहे हुए शब्दों को ज्यों का त्यों अभिव्यक्त नहीं कर सकती। ख़ामोशी में राजेश खन्ना ने कहा-मैं सोचता था मेरा नाम गुनगुना रही है वो, लेकिन सचमुच क्या वे कह पाए जाते-जाते, किसी को नहीं पता। जिसे पता है वो है बेजु़बान जाम जो न केवल खाली है बल्कि अब टूटा हुआ भी। लोग राजेश खन्ना को याद रखेंगे। वे उन सारे गीतों को भी याद रखेंगे जिन्होंने कभी मुस्कान दी तो कभी आंसू लेकिन ख़ाली टूटा जाम भुला दिया जाएगा। इस भुलाए जाने को याद रखते हुए भी ये  फिर किसी कलाकार की जिंदगी में दाखिल होगा चुपचाप उसका साथी बनने के लिए, इसे अजीब किस्म की अमरता जो हासिल है।

Tuesday, June 19, 2012

mehdi hasan


शोला था जल बुझा हूं

मैं कब का जा चुका हूं सदाएं मुझे न दो

मेहदी हसन को हम किस तरह याद करेंगे ये सोचना मुश्किल नहीं है क्योंकि
उन्हें सुनते रहिए तो भूलने की हिमाकत हो ही नहीं पाएगी। मुश्किल तो ये
सोच पाना है कि उन्हें भुलाया कैसे जाएगा।  कोई रंग, कोई फूल, कोई मौसम,
कोई आग  और कोई अहसास अछूता नहीं रहा उनकी आवाज से। कोई एक गीत,  नज्म,
या  गज़ल उठा लीजिए वो समझ जाएंगे कि क्या ये सब भुला दिए जाने के लिए
गाया गया है।  मेहदी हसन वाकई उन सारी  हदों से परे एक एक शख्सियत का नाम
है जो जिंदगी और मौत के दौर से इसलिए गुजरती हैं क्योंकि कुदरत का निजाम
यही है। वरना अमर हो जाने की परिभाषा कुछ और हो नहीं सकती।
एक इंतजार था। शायद वे ठीक हो सकेंगे।  फिर से गा सकेंगे, लौट आएगा
पुराना दौर..।  बरसों बीते आि‍खर इंतज़ार मुख्तसर हुआ, चले गए मेहदी
हसन। अब लौटेंगे नहीं लेकिन हमेशा जिंदा रहेंगे उन सुरों में जो सहेज लिए
गए। यूं भी ऐसे कलाकारों का सिर्फ जिस्म ही तो विदा होता है जहां
से...रूह तो अमरता पाकर विचरती फिरती है मौसीकी के मौसमों में।  इस अमरता
को जानते हुए ही शायद उन्होंने बहुत पहले गाया था-अब तुम तो जिंदगी की
दुआएं मुझे न दो...गोया उन्हें यकीन था कि दुनिया में आना और जाना तो महज
एक  दस्तूर है। लेकिन मेहदी हसन के  चाहवान इस बात को कैसे समझ पाते।
बारह बरस वे बीमार रहे और दुनिया दुआएं करती रही उनके जीने की। सेहतमंद
होने की। हर बार जब वे ज्य़ादा बीमार होते तो दुआओं का दौर और ज्यादा तेज़
हो जाता। सच है कि हम उन्हें जाने नहीं देना चाहते थे। जबकि वे कह रहे थे
शोला था जल बुझा हूं हवाएं मुझे न दो  मैं कब का जा चुका हूं सदाएं मुझे
न दो ।  माना जा सकता है कि मेहदी हसन के मयार का कलाकार उनके अंदर से
उसी दिन चला गया होगा जिस दिन उन्हें पता चला कि वे अब गा नहीं सकेंगे।
और अपने अंदर से जिंदगी को चले जाने के बाद भी इतने लंबे अरसे तक खुद को
जिंदा कहलाते हुए देखना कितना तकलीफहेद होगा  उनके लिए, इस बात का हम
सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं।
जिन्होंने मेहदी हसन को लाइव देखा-सुना है वे सब जानते होंगे कि उस्ताद
की आ$गा खान अस्तपाल वाली तस्वीरें कैसे  विचलित कर दिया करती थीं।
अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा वो शहंशाह जिसने पत्थर दिलों को भी एक आवाज़
से छुआ और मोम कर दिया, किस कदर मजबूर और बेबस नज़र आता था। बेहद कमजोर
और बीमार। संासें कभी खु़द आतीं-जातीं तो कभी वेंटीलेटर के बहाने कोशिश
की जाती जिंदगी को आगे ले जाने की। बहुत दिन चली ये लुकाछिपी और उम्मीद
का सफर। अब बाकी रह गया है वो खालीपन और सन्नाटा जिसमें गूंज रही है एक
आवाज़- अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें.. जिस तरह सूखे
हुए फूल किताबों में मिलें।
 गज़ल को किसने ईजाद किया, सोज़ को किसने रंज बख्शा, सुरों को किसने
साधा और रियाज़ की गहराइयां कौन कैसे उतरा..हम सब भूल जाएंगे। याद रहेगी
तो वो आवाज़ जो सीधे रूह पर वार करती है। मेहदी हसन एक दुआ थे दुनिया के
लिए। बरसों सुरों की  बारिश  बनकर बरसते रहे। बारिशें अब  भी बरसेंगीं।
सुर फिर भी सजेंगे। जो मेहदी हसन के शैदाई हैं वे हमेशा उन्हें सुनते
रहेंगे लेकिन शहंशाहे ग़ज़ल का का तख़्त सूना रहेगा। हां ये बात और है कि
बादशाहत फिर भी कायम रहेगी।

उन्हें सुनते ही सुनने का शऊर आ जाता है..

नब्बे के शुरुआती दौर में मेहदी हसन दुनिया भर में खू्ब घूम रहे थे।
प्लेबैक से तकरीबन किनारा कर चुकने के बाद उनका पूरा ध्यान क्लासिकल और
सेमी क्लासिकल रंग में ग़ज़लों को दुनिया तक पहुंचाने पर था। फिल्मी, नॉन
फिल्मी, उर्दू और अन्य ज़बानों में हमें मिल जाता उस सबको सुनकर हमेशा
दिल में एक ख्वाहिश जागती थी कि क्या कभी ग़ज़लों के इस शहंशाह को सामने
बैठकर सुन सकेंगे। एक दिन अखबार में इश्तेहार देखा। मेहदी हसन लाइव इन
कंसर्ट चंडीगढ़ में।  टिकट भी चंडीगढ़ में ही मिल रहे थे। उस वक्त हम इस
शहर से कुछ दूर रहा करते थे। खैर, मेहदी हसन का प्रोग्राम है तो दूरी और
टिकट की कीमत के कोई मायने नहीं थे। एक महीने की पूरी तनख्वाह खर्च करने
पर चार टिकट खरीदे गए।
पीजीआई के भार्गव ऑडिटोरियम में हो रहे इस प्रोग्राम में वक्त पर पहुंचने
के लिए एक रिटर्न टैक्सी का इंतजाम करके हम परवानू से चंडीगढ़ तक पहुंचे।
हमारे साथ जिन लोगों को प्रोग्राम के लिए आना था उनमें से एक किसी वजह से
पहुंच नहीं सके। यानी  हमारे पास एक टिकट फालतू था जब लोग मारे-मारे फिर
रहे थे टिकट के लिए। हम किस कदर फराख दिल थे उस वक्त कि ड्राइवर को ही
कहा-आओ चलो तुम भी सुनो मेहदी हसन को। उसने हैरत से हमारी तरफ देखा कि
शायद ये मज़ाक हो रहा है। हमने फिर कहा, अरे भई सचमुच चलने को कह रहे
हैं। वो उछलकर साथ हो लिया। यूं भी वो रास्तेभर टैक्सी में मेहदी हसन की
कैसेट सुनवाता लाया था और इस जुगाड़ में था कि कहीं से बैठकर उनकी आवाज
ही सुन लेगा।
भार्गव ऑडिटोरियम में अंदर घुसते वक्त हमें यकीन था कि हमारी सीट तो
पक्की है इसलिए परेशानी का तो सवाल ही नहीं। लेकिन अंदर जाकर पता चला कि
वहां जो जहां बैठ सकता था बैठ गया है। क्योंकि प्रोग्राम तकरीबन शुरू हो
चुका था इसलिए हमें  भी जहां जगह मिली बैठ गए।
हॉल में लोग कितनी-कितनी दूर से आए थे ये अंदर जाकर पता चला। फीरोजपुर के
आठ नौजवान एक सुर में फरमाइश करते और उस्ताद को माननी पड़ती। डलहौजी से
आए एक बिजनेसमेैन बार-बार अपनी आंखों पर दूरबीन लगाकर मेहदी हसन को
करीब लाकर देखते रहे। शहर के सबसे रसूखदार लोग उस रात सीढिय़ों पर ज़मीन
में फर्श पर बैठे देखे गए।  रंजिश ही सही...गुलों में रंग भरे और मुहब्बत
करने वाले कम न होंगे..ये ऐसी ग़ज़लें थीं जो एक से ज्यादा बार गानी पड़ी
मेहदी हसन को। प्रोग्राम कितनी देर चला याद नहीं। बस याद इतना है कि वहां
जाने से पहले मेहदी हसन को जिस तरह सुना था लाइव सुनने के बाद वो समझ बदल
गई।  हां, ऐसा ही लगता है कि उन्हें सामने बैठकर सुनते ही सुनने का शऊर आ
जाता है।

उन्हें आखिरी बार सुनना
सन 2000 मई की गरम रात। चंडीगढ़ क्लब में मेहदी हसन की लाइव परफॉर्मेंस
है और लोग वक्त से पहले वहां जुटने लगते हैं। ये मुहब्बत है उनके लिए जो
लोगों को अमृतसर से लेकर शिमला तक से बुला लाई है। यहां सिर्फ मेंबर्स की
एंट्री हो सकती है लेकिन लोग इस एक पास के इंतजाम में कोई भी रकम खर्च
करने को तैयार हैं। तकरीबन आठ बजे मेहदी हसन को बैसाखियों के सहारे स्टेज
तक पहुंचाया जाता है। उनका परिवार साथ है मदद के लिए। क्लब के लॉन में हो
रहे इस प्रोग्राम की शुरुआत होने से पहले जो शोर था वो पहले सुर के साथ
खामोश हो जाता है। कम से कम दस $गज़लें पूरी होने के बाद वे कुछ देर
रुकते हैं और देखते हैं आसमान की तरफ। आसार बारिश के थे और तेज़ हवाओं के
साथ अंदेशा तूफान का भी। मौमस खऱाब होने लगता है। बावजूद इसके न लोग वहां
से जाने को तैयार हैं और न ही उस्ताद प्रोग्राम अधूरा छोडऩे को राजी।
बारिश शुरू हो जाती है लेकिन लोग अब भी जमे हैं अपनी जगह। आखिर लाइट्स
बंद हो जाती हैं और माइक बंद हो जाते हैं। मेहदी हसन जा रहे हैं
बैसाखियों के सहारे स्टेज से उतरते हुए। ये उन्हें हमारा आ$िखरी बार
देखना था।

published in Dainik Bhaskar on  14th june 2012.

Monday, September 27, 2010

अकेला घर करीम का.....

वो देश का सबसे बड़ा अल्‍पसंख्‍यक है। उसकी गिनती ख़ुद से शुरू होती है और वहीं ख़त्‍म भी हो जाती है। पूरे गांव में अकेला मुसलमान, करीमबख्‍़श। उम्र पिचासी पार जाने लगी है और अब बस ख्‍वाहिश इतनी ही बची है कि इसी मिट़टी पर दम निकले, जहां पैदा हुआ था। 1947 का बंटवारा भी उसे इस ज़मीन से जुदा नहीं कर सका था। जिस रात गांव के सारे मुसलमानों ने पाकिस्‍तान जाने का फ़ैसला किया तो करीम बख्‍़श अपने ननिहाल भाग गया। तब उसकी उम्र 22 बरस की थी। बताते हैं उसकी मंगनी हो चुकी थी और फ़साद न होते तो जल्‍दी ब्‍याह भी हो जाता।

खै़र, कुछ अमन हुआ और करीम अपने गांव लौटा तो सारे घर जले हुए थे। असबाब लूटे जा चुके थे और जो बाक़ी थी उसे भी अपना नहीं कहा जा सकता था। पाकिस्‍तान से उजड़कर आए लोगों को ये गांव अलॉट किया जा रहा था। और तो और वो मस्जिद भी करीम की अपनी नहीं रही थी जिसमें वो अज़ान दिया करता था। वहां गुरुग्रंथ साहिब का प्रकाश किया जा चुका था। ये सब तरेसठ साल की बाते हैं।

इतना लंबा वक्‍त बीता और आज तक कभी करीम ने इस गांव से कोई शिकायत नहीं की। दुनिया बदली लेकिन ये इंसान वही रहा जो था। उसने कभी पलटकर ये नहीं कहा कि इस मस्जिद में मैंने नमाज़ पढ़ी है, इसलिए अब वाहेगुरू की फतेह बुलाने से मुझे परहेज़ है। वो कहता है' वो भी रब का नाम था ये भी रब का नाम है। बहुत सहज मन और निर्दोष आवाज में ये बात कहते हुए करीम बख्‍श एक पल में उन सारे मर्मज्ञों को पीछे छोड़ देता है जो इस बात को साबित करने में जीवन लगा गए कि ईश्‍वर एक है, उसे किसी भी भाषा  या स्‍वर में पुकारो, वो सुन ही लेता है। इसी जगह पंद्रह बरस से ग्रंथी के तौर पर रह रहे जरनैल सिंह का कहना है, जब ये मस्जिद थी तो भी रब का घर थी और आज गुरुद्वारा है तो भी रब का घर ही है। यहां आकर लोग सिर झुकाते हैं बस मैं इतना ही जानता हूं।

पूरे गांव के बीच एक अकेला, ग़रीब मुसलमान अपने सेक्‍युलरिज्‍़म के साथ सब पर भारी पड़ता है। करीम का दिल जितना बड़ा है गांव के लोगों ने भी उसे उसी तरह अपनाया है। किसी के घर ग़म हो या खुशी सबसे पहले करीम वहां पाया जाता है। उसकी उम्र के बाक़ी बुजु़र्ग कहते हैं; न ये हमसे अलग है और न ही हम इससे। इसके बेटे शहर में रहते हैं, ये वहां जाता है और वापस आ जाता है। इसका मन यहीं रमता है।

करीमबख्‍श सचमुच इस गांव को छोड़कर कहीं नहीं जा सकता। वो यहीं जी रहा है और एक दिन यहीं मर जाएगा। हां, ये ख़बर पाकर उसके बेटे एक गाड़ी लेकर आएंगे ताकि उसे दफ़नाने के लिए शहर में ले जाया जा सके, करीम के गांव में उसके जीने के लिए तो जगह है, कब्र के लिए नहीं। मुसलमान चले गए थे तो कब्रिस्‍तान की ज़रूरत भी ख़त्‍म हो गई थी। अब वहां मुर्दे नही लोग रहते हैं।

.......................................................



पंजाब में पटियाला जि़ले के ढकौंदा गांव में रहता है ये शख्‍स करीम बख्‍श। इन दिनों जो माहौल है उसमें कुछ ऐसे लोगों की कहानी ढूंढने की कोशिश में मुलाकात हुई इनसे, जो सचमुच रब के बंदे हैं, जिनका ईश्‍वर इमारतों में नहीं रहता।
ये खबर 26 सितंबर 2010 को दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित हुई।

Thursday, September 2, 2010

A room of one's own ...


Restorer Ella Hendriks shows pictures of the various stages of restoration of Vincent Van Gogh's 'The Bedroom' painting, rear left on easel, at the Van Gogh museum in Amsterdam, Netherlands, Thursday Aug. 27, 2010. Vincent van Gogh must have been horrified when he returned to his studio from hospital early in 1889 to find one of his favorite paintings damaged by moisture. He pressed newspaper to the canvas to protect it from further deterioration, rolled it up and sent it to his brother Theo in Paris. Ella Hendriks could still see traces of newsprint when she looked at "The Bedroom" under a microscope, as she picked and scraped at earlier restorations of the canvas and removed yellowing varnish that had been brushed on 80 years ago. Hendriks has completed a painstaking six-month restoration of the masterpiece, which returns to its place on the wall of the Van Gogh Museum on Friday. (AP Photo/Peter Dejong)

note...see this link www.vangoghmuseum.nl/blog/slaapkamergeheimen/en/the-bloggers/ if want to read more about the bedroom masterpiece. 

Monday, August 9, 2010

कि बिना मरे चुप रह सकूँ

 पुलिस तो होती ही ऐसी है, फलां देश के लोग ऐसे ही होते हैं, हिंदुओं में ऐसा ही चलता है, मुसलमानों में यही होता है, सेना के जवान हमेशा ऐसे ही होते हैं....अरे मीडिया का क्‍या है ये सब एक जैसे हैं, बहुत ख़राब होता है किसी भी चीज का जर्नलाइजेशन करना। ऐसा करते हुए हम हमेशा उन सबके साथ अन्‍याय कर रहे होते हैं जो भीड़ का हिस्‍सा नहीं होते। जो बहुत मेहनत करते हुए हजार तकलीफों को सहकर और कई बार बहुत सारे त्‍याग करने के बाद खुद को औरों जैसा होने से बचाए रखता है। मुझे मालूम है कि इस बात से ज्‍़यादातर लोग सहमत होंगे, लेकिन अफ़सोस किया जा सकता है उस स्थिति पर जहां मौक़ा मिलते ही सब फिर से चीजों को जर्नलाइज करते हुए देखने लगें।
मैंने अपनी पिछली पोस्‍ट में एक स्‍पेसिफिक हादसे का जिक्र किया जिसमें एक फेसबुक एंट्री शामिल थी। यह पूरी तरह से एक क्रूरता के जिक्र से उपजी व्‍यथा का मामला था। उसमें एक रिक्‍वेस्‍ट थी कि इस पोस्‍ट को अलग नजरिए और रोशनी में पढ़ा जाए। बहुत अफसोस हुआ ये देखकर कि उस रिक्‍वेस्‍ट को छोड़कर बाक़ी कंटेंट पर ख़ूब चर्चा हुई। कुछ लोगों ने इस मौके़ को लपका कि इस तरह मुझे तक़रीबन राष्‍ट्रविरोधी और सेना की मुखालफत करने वाला साबित कर दिया जाए, कुछ ने कोशिश की ये जताने की गोया वे सबसे बड़े वतनपरस्‍त हैं। कुछ ने मेरी संवेदनाओं को समझा और उस बच्‍चे के प्रति दुख जताया।
उस पोस्‍ट को पढ़ते हुए श्रीनगर में तैनात मेजर गौतम राजरिशी जो कि एक शायर और बहुत मकबूल हिंदी ब्‍लॉगर हैं, भी मुझ तक पहुंचे। उन्‍होंने जो कहा वो पिछली पोस्‍ट के कमेंट़स में दर्ज है। मेरी तकलीफ उस बच्‍चे को लेकर थी और मेजर ने बताया कि हादसा दूसरी तरह का था। बात खत्‍म हुई क्‍योंकि मेजर पर अविश्‍वास करने का कोई कारण था ही नहीं।
क्रूरता, अविश्‍वास, धोखा, नीचता और बदले की भावना, ये सारी चीजें किसी भी व्‍यक्ति में हो सकती हैं, होती भी हैं, इसलिए यहां भी मैं जर्नलाइनजेशन से बचना चाहती हूं। ये सब व्‍यक्तिगत दुर्गुण हो सकते हैं इसलिए किसी भी संप्रदाय, वर्ग, सेना या अन्‍य समूह को इसमें लपे ट लेना गलत है। 
एक बात और समझ आई इस पोस्‍ट के बाद कि आप जो कहना चाहते हैं उसे उसी संदर्भ में वैसा ही कोई समझ ले ये जरूरी नहीं है। बहुत सहज, सादी और मन की बात को भी लोग प्रोपैगैंडा, राष्‍ट्रविरोध और अन्‍य रंगों से रंगकर देख सकते हैं।
खै़र जिसे जो जैसे देखना है देखे, मैं अपने लिए ईश्‍वर से हमेशा ये मांगती रही जो आज फिर से मांगती हूं मेरे प्रिय कवि विजयदेव नारायण साही की लाइनें हैं......
परम गुरु
दो तो ऐसी विनम्रता दो
कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ
और यह अंतहीन सहानुभूति
पाखंड न लगे।

दो तो ऐसा कलेजा दो
कि अपमान, महत्वाकांक्षा और भूख
की गाँठों में मरोड़े हुए
उन लोगों का माथा सहला सकूँ
और इसका डर न लगे
कि कोई हाथ ही काट खाएगा।

दो तो ऐसी निरीहता दो
कि इसे दहाड़ते आतंक क बीच
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिन्ता न हो
कि इसे बहुमुखी युद्ध में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा।

यह भी न दो
तो इतना ही दो
कि बिना मरे चुप रह सकूँ।

नोट....दो साल की ब्‍लॉंगिंग में मैंने कभी अपनी पोस्‍ट पढ़वाने के लिए किसी से आग्रह नहीं किया लेकिन आज यहां एक आग्रह है कि जो रीडर्स यहां तक आए हैं वे अगले कुछ दिन और आते रहें, इस बहाने मैं कश्‍मीर पर कुछ और  एक सीरीज के तहत कहना चाहूंगी।
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Wednesday, August 4, 2010

क्‍या आपके घर में एक सात साल का बच्‍चा है

मैं किसी बहस का हिस्‍सा नहीं हूं। मुझे किसी तरफ खड़े हुए भी मत देखिए। मैं सिर्फ एक बच्‍चे के बारे में बात करना चाहती हूं। सारी बेहयाई, सारे षडयंत्र, सारी राजनीति और सारे उन्‍माद के बीच मैं उस बच्‍चे के बारे में बात करना चाहती हूं जो सात बरस का था। क्‍या उसे इस उम्र में इस तरह मर जाना चाहिए था। ठीक है मर जाना ही हम सब की नियति है तो क्‍या इस तरह मर जाना वो अपने भाग्‍य में लिखवाकर ले आया था....किसने लिखा था उसका ऐसा भाग्‍य....जवाब ढूंढते हुए मुझे अपने घर के उन दो बच्‍चों का चेहरा याद आता है जो पिछले महीने ही सात बरस के हुए हैं। मैं बुरी तरह डर गई हूं, उन सारे बच्‍चों के लिए जो क्रिकेट खेलने के लिए निकलते हैं, क्‍या हमें उनका घर से निकलना बिल्‍कुल बंद कर देना चाहिए। कम से कम हमारे देश के जिम्‍मेदार नेताओं का तो यही कहना है कि अगर जान बचानी है तो बच्‍चों को घर से बाहर न निकलने दो....।

ये एक चश्‍मदीद का बयान है फेसबुक पर.... सुरक्षा बलों द्वारा मार डाले गए बच्‍चे की तस्‍वीर को यहां लगाने का साहस मुझमें नहीं है। 
i am from batamaloo, i eyewitnessed the death of a 7 year old kid yesterday, here in batamaloo! he was coming back from home, after playing cricket with his friends in a nearby ground, while i was as usual collecting strings for my news re...p......ort. suddenly a group of crpf men came in a mobile bunker and started thrashing me, even broke my camera! fired indiscriminately over the residential buildings there! i was hurt! blood dripping from my head! i ran for my life and at that fateful minute, that 7 year old boy passed through that area. the dogs ran after him! and brought him down by a blow of gun on his head! he was beaten to pulp! i cried for help! i cried someone please save us! we are being murdered! no one came out! who would want to risk his life? i tried very hard! but i could barely move! when they thought it was not sufficent, they stick a cane deep down his throat till he died! ya allah! how did i let them do it! even after that little kid, someones son! someones brother died! it didn't satisfy those b------s! please mind my language! those b------s stood up on his chest for 10 minutes kicking his head as if it was a football! it was too much! i went and clashed with them! i was shot in the leg! then they fled away! as soon as they left thousands of people gathered at the place! i held him! i held him in my arms! i could see clearly the bruises on his chest and his broken ribs! his deshaped and cut mouth! his hands pierced with pens and sharp objects! i couldnt do anything! this thought will haunt me for the rest of my life!...Sabeeqa Nazir


नोट. क्रप्‍या इस पोस्‍ट को उसी रोशनी में पढ़ा जाए जिसमें लिखा गया है, पाकिस्‍तान क्‍या कर रहा है, कश्‍मीर में पत्‍थर फेंकना एक व्‍यवसाय है, प्रदर्शनकारी स्‍पॉन्‍सर्ड हैं और कश्‍मीरी लोग इन दिनों जमकर तोड़फोड़ और आगज़नी रहे हैं, ये सब जानने के बाद भी मैं जानना चाहती हूं कि क्‍या इस बच्‍चे को इस तरह मर जाना चाहिए था ...?

Tuesday, August 3, 2010

तेरा पहलू, तेरे दिल की तरह आबाद रहे


उसने एक बार फिर मेरा फोन नहीं उठाया। पिछले डेढ़ दो महीने से ऐसा लगातार हो रहा है। इससे पहले दिन में तीन बार फोन करके कहती थी, यार फलां इज़ ए बास्‍टर्ड... उसने मुझे ये कहा, वो कहा। मेरा मूड खराब है यार, ये लोग ऐसे क्‍यों हैं, वैसे क्‍यों नहीं हैं। खुलेआम कहती थी, एक दिन तुम सबको लात मारकर भाग जाऊंगी और कभी पलटकर देखूंगी भी नहीं । कभी उदास होकर ये भी कहती, यार मेरी जिंदगी में कोई ऐसा आदमी कब आएगा जो मेरे प्‍यार को समझ सकेगा। अपने नए पुराने प्रेमियों को कोसते हुए हमारे बीच गालियों का एक लंबा सेशन चलता था। गालियां उन सारे पुरुषों के लिए होती थीं जिनसे या तो हमें कोई शिकायत थी या फिर जिन्‍होंने हमारा कुछ बिगाड़ा हो। हां कई बार कोई ऐसा भलामानुस भी गा‍ली खा जाता था जिसने हमारे चाहने के बावजूद हमारी तरफ न देखने की गुस्‍ताख़ी की हो।
दिल की सारी भड़ास निकालने के बाद भी उसे नींद नहीं आती। तीन चार बजने के बाद उसे जबर्दस्‍ती फोन रखने के लिए कहने पर सुनने को मिलता था, जा यार तू भी बेवफा है, साली पूरी दुनिया एक जैसी है।
देर रात होने वाली हमारी बातचीत में से ज्‍यादातर वक्‍़त मैं ख़ुद को समझदार और उसे नासमझ जताते हुए टिप्‍स देने में बिताने की कोशिश करती और ये लड़की इस‍ फिराक में रहती कि कैसे मुझे इस बात के लिए कन्विंस कर ले‍ कि हम लड़कियों को सुखी रहने के लिए flirt करना आना ही चाहिए। सच कहूं तो उसकी बातों से कई बार सहमत होते हुए भी मैं इसलिए असहमत रह जाती थी कि इसके सामने मेरी इमेज का कचरा न हो जाए। उसे एक ऐसी भोली बच्‍ची समझती थी जो दुनिया की भीड़ में भटकी हुई है, कभी वो खुद को चालाक दिखाने के फेर में गड़बड़ करती है तो कभी जबर्दस्‍ती दूसरों को इम्‍प्रेस करने के चक्‍कर में वक्‍त गंवाती है। अपनी जिम्‍मेदारी को पूरी ईमानदारी से निभाने के चक्‍कर में कई बार उस पर ज्‍़यादती करते हुए मैं ये भी भूल जाती थी कि मेरा फोन रखते ही वो सबसे पहला काम उन्‍हीं लोगों को फोन करने का करेगी जिनके खिलाफ़ मुझसे समझाइश ले रही है।
तो साहब, घंटों बतियाने के बाद अब ये लड़की अचानक चुप हो गई है। ज्‍यादातर वक्‍त फो़न उठाती ही नहीं। कभी उठा भी ले तो जवाब मिलता है, डार्लिंग मैं कॉलबैक करती हूं। ऐसी शिकायत सिर्फ मेरी नहीं कई लोगों की है। कोई बता रहा था कि अक्‍सर वो  ग़ायब रहने लगी है। जो लोग उसके ड्रेसिंग सेंस और ऊंची आवाज़ पर हमेशा कमेंट किया करते थे आजकल बिल्‍कुल बेरोजगार टाइप सूरत बनाकर बैठे रहते हैं। single  बैडरूम flat में अकेले रहने वाली इस आफत को यूं चुपचाप बकरी की तरह मिमियाते हुए देखने वाले आंखें चौडी़ हो रही हैं।
इन सबको पता नहीं कि क्‍या हुआ है, लेकिन मैं जानती हूं ये लड़की फिर से गिरफ़तार है इश्‍क़ में। हज़ार बार तौबा करने के बाद एक बार फिर सब्‍ज़परी और गुलफ़ाम की कहानियों में मशगूल है। तीन दिन पहले दो मिनट की बातचीत में उसने कहा नहीं यार ऐसा कुछ नहीं है। मुझे मालूम है वो झूठ बोल रही है, लेकिन इस बार मैं उसे कुछ समझाना या डांटना नहीं चाहती बल्कि ये कह देना चाहती हूं कि, ऐ छोकरी ये लड़का जो भी हो उसे अपनी जिंदगी में आने की इजाजत सिर्फ तब देना जब वो सचमुच तेरे साथ रहना चाहता हो।  इस बार मैं बिल्‍कुल तेरी कोई बात सुनने के मूड में नही हूं। न तो मैं तेरे साथ किसी गाली सेशन में शामिल होने वाली हूं और न ही तेरे टूटे दिल को सहलाने की फुर्सत मेरे पास है। गो एंड गैट मैरिड यार। ताकि फिर कभी तुझे रात के तीन बजे फोन करके मुझसे ये न कहना पड़े...I am drunk yaar, वो साला चला गया मुझे छोड़कर। How cud he ...how cud he...?
_________________________________
I wish all the best to u dear ...
तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझपे गुज़रे न क़यामत शबे तन्‍हाई की।

(parveen shakir )
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