आज सुबह मैंने एक पाप किया। बच्चे पर अपना गुस्सा निकाला, अपनी खीज और फ्रस्ट्रेशन उस पर उतार दी। वो रोकर स्कूल चला गया लेकिन मैं इतने गहरे अपराधबोध में धंसी हूं कि समझ नहीं आ रहा कैसे उसका सामना कंरूं ..। उसकी शरारतों और गलतियों पर अब तक मैंने हमेशा हल्का-फुल्का थप्पड़ मारा है या फिर डांट दिया है। आज मैंने उसे गुस्से में मारा। मैंने जब उसे पहला थप्पड़ मारा तो शायद उसे मुझसे ये उम्मीद नहीं रही होगी...उसने हैरान होकर मेरी तरफ देखा और तब तक मैंने उसे दूसरा चांटा मार दिया था। ये सब बहुत बुरा था। क्या बड़े होते जाना मानवीयता को खोते जाने जैसा है, क्या हम उतने ही निर्दोष और मासूम नहीं रह सकते सारी उम्र, जितना बचपन में थे।
दोपहर में जब वो स्कूल से वापस आया तो सारी बात भूल चुका था,लेकिन मुझे तो याद था अपना अपराध। मैं उसका सामना नहीं कर सकी। घर से निकलते हुए आज मैंने उससे बात नहीं की, चुपचाप निकल आई। मैं कैसे इस ग्लानि और अपराधबोध से बाहर आ सकूंगी...क्या सबको ऐसा ही लगता है बच्चों को मारने के बाद...क्या सब ठीक हो जाएगा जल्दी ही...।
-ये बच्चा मेरे भाई का बेटा है, इसका नाम शान है जिसे हम प्यार से पिंगू कहते हैं। मैं इसके साथ रहती हूं।
दोपहर में जब वो स्कूल से वापस आया तो सारी बात भूल चुका था,लेकिन मुझे तो याद था अपना अपराध। मैं उसका सामना नहीं कर सकी। घर से निकलते हुए आज मैंने उससे बात नहीं की, चुपचाप निकल आई। मैं कैसे इस ग्लानि और अपराधबोध से बाहर आ सकूंगी...क्या सबको ऐसा ही लगता है बच्चों को मारने के बाद...क्या सब ठीक हो जाएगा जल्दी ही...।
-ये बच्चा मेरे भाई का बेटा है, इसका नाम शान है जिसे हम प्यार से पिंगू कहते हैं। मैं इसके साथ रहती हूं।

