Wednesday, November 11, 2009

कैसे उसका सामना करूं


आज  सुबह मैंने एक पाप किया। बच्‍चे पर अपना गुस्‍सा निकाला,  अपनी खीज और फ्रस्‍ट्रेशन उस पर उतार दी। वो रोकर स्‍कूल चला गया लेकिन मैं इतने गहरे अपराधबोध में धंसी हूं कि समझ नहीं आ रहा कैसे उसका  सामना कंरूं ..। उसकी शरारतों और गलतियों पर अब तक मैंने हमेशा हल्‍का-फुल्‍का थप्‍पड़ मारा है या फिर डांट दिया है। आज मैंने उसे गुस्‍से में मारा। मैंने जब उसे पहला थप्‍पड़ मारा तो शायद उसे मुझसे ये उम्‍मीद नहीं रही होगी...उसने हैरान होकर मेरी तरफ देखा और तब तक मैंने उसे दूसरा चांटा मार दिया था। ये सब बहुत बुरा था। क्‍या बड़े होते जाना मानवीयता को खोते जाने जैसा है, क्‍या हम उतने ही निर्दोष और मासूम नहीं रह सकते सारी उम्र, जितना बचपन में थे।
दोपहर में जब वो स्‍कूल से वापस आया तो सारी बात भूल चुका था,लेकिन मुझे तो याद था अपना अपराध। मैं उसका सामना नहीं कर सकी। घर से निकलते हुए आज मैंने उससे बात नहीं की, चुपचाप निकल आई। मैं कैसे इस ग्‍लानि और अपराधबोध से बाहर आ सकूंगी...क्‍या सबको ऐसा ही लगता है बच्‍चों को मारने के बाद...क्‍या सब ठीक हो जाएगा जल्‍दी ही...।


-ये बच्‍चा मेरे भाई का बेटा है, इसका नाम शान है जिसे हम प्‍यार से पिंगू कहते हैं। मैं इसके साथ रहती हूं।

Friday, October 30, 2009

मिलिए इस जांबाज़ से




झुग्‍गी में तीन प्राणी थे। पांच बरस का टाइगर, डेढ़ बरस का संदीप और 3 बरस का कुलदीप। टाइगर सबसे बड़ा था और उसकी जि़म्‍मेदारी भी सबसे ज्‍यादा थी। घर का मालिक हरीराम उसे जाते वक्‍़त कहकर जाता था-टाइगर, घर का ध्‍यान रखना और बच्‍चों का भी। हमेशा तो यही करता रहा वह,  लेकिन पिछले कल यानी 29 अक्‍टूबर का दिन इस घर के लिए क़हर बनकर आया। हरीराम और उसकी पत्‍नी गीता रोज़ की तरह काम पर चले गए और झुग्‍गी में टाइगर, बच्‍चों के साथ था। संदीप माचिस की डिब्‍बी से खेल रहा था और खेलते हुए उसने तीली जलाना शुरू कर दी। सरकंडों से बनी झुग्‍गी में किसी तरह आग फैली और सब कुछ जलने लगा। टाइगर की रस्‍सी जली और वह बाहर की तरफ भागा जबकि बच्‍चे बाहर नहीं निकल सके।
घर के बाहर भीड़ जमा हो चुकी थी और लोग कोशिश कर रहे थे कि किसी तरह आग पर काबू पाया जाए व  बच्‍चों को बाहर निकाला जा सके। टाइगर  ये सब देख रहा और एकाएक वह झुग्‍गी के अंदर की तरफ दौड़ गया। वापस लौटा संदीप को अपने मुंह से पकड़कर खींचता हुआ। उसे लोगों ने जब तक संभाला, वह दोबारा अदंर की ओर दौड़ा और दूसरी बार में इसी तरह कुलदीप को खींच कर साथ ले आया। वो बच्‍चों को जिंदा खींचकर लाया था मौत के मुंह से। झुलसे हुए बच्‍चों को अस्‍पताल पहुंचाया गया जहां बाद में उन्‍होंने ज्‍यादा जल जाने के कारण दम तोड़ दिया। टाइगर ने अपनी जान पर खेलकर उन्‍हें बचाने की कोशिश की लेकिन दुर्भाग्‍यवश बच्‍चो को बचाया नहीं जा सका।
ये कहानी नहीं है बल्कि एक हादसे का बयान है जो चंडीगढ में ही बसे एक गांव कैम्‍बवाला में हुआ। लोग एक तरफ टाइगर की हिम्‍मत का चर्चा कर रहे हैं तो दूसरी तरफ सबको दुख है उन दो मासूमों के न रहने का।
टाइगर भी बहुत उदास है। वो दुखी है अपने मालिक हरीराम के ग़म से। चाहकर भी वो उन दो बच्‍चों को नहीं बचा सका जिनकी जि़म्‍मेदारी उसे दी गई थी। उसका मुंह और शरीर जगह-जगह से जल गया है लेकिन उसकी तकलीफ इन चीजों को लेकर नहीं है।वह बार-बार उस जगह जाकर बैठ जाता है जहां हर रोज़ उसे हरीराम रस्‍सी से बांधकर जाते हुए कहा करता था-टाइगर घर की देखभाल करना और बच्‍चों की भी।
मुझे नहीं पता किस इस हादसे से लोग किस तरह का सबक़ ले सकते हैं लेकिन ये ज़रूर समझ आ रहा है कि हम सो कॉल्‍ड इंसानों को वफ़ादारी  सबक़ सीखने के लिए टाइगर जैसे प्राणियों की तरफ़ ज़रूर देखते रहना चाहिए।





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उपरोक्‍त जानकारी और तस्‍वीरें दैनिक भास्‍कर के क्राइम रिपोर्टर कुलदीप सिंह द्वारा।

Monday, October 26, 2009

चुनिन्दा तथ्यों को लिखने का रिवाज़ है


हम कितने ईमानदार होते हैं अक्‍सर...बायोडाटा, अपना प्रोफाइल और अन्‍या जानकारियां देते वक्‍त...। विस्वावा शिम्बोर्स्का की यह कविता यूं ही तो याद नहीं आ गई न...। खै़र पढि़ए, अनुवाद अशोक पांडे का है, हां वही कबाड़ख़ाना वाले।


बायोडाटा लिखना


क्या किया जाना है?
आवेदनपत्र भरो
और नत्थी करो बायोडाटा


जीवन कितना भी बड़ा हो
बायोडाटा छोटे ही अच्छे माने जाते हैं.


स्पष्ट, बढ़िया, चुनिन्दा तथ्यों को लिखने का रिवाज़ है
लैंडस्केपों की जगह ले लेते हैं पते
लड़खड़ाती स्मृति ने रास्ता बनाना होता है ठोस तारीख़ों के लिए.


अपने सारे प्रेमों में से सिर्फ़ विवाह का ज़िक्र करो
और अपने बच्चों में से सिर्फ़ उनका जो पैदा हुए


तुम्हें कौन जानता है
यह अधिक महत्वपूर्ण है बजाए इस के कि तुम किसे जानते हो.
यात्राएं बस वे जो विदेशों में की गई हों
सदस्यताएं कौन सी, मगर किसलिए - यह नहीं
प्राप्त सम्मानों की सूची, पर ये नहीं कि वे कैसे अर्जित किए गए.


लिखो, इस तरह जैसे तुमने अपने आप से कभी बातें नहीं कीं
और अपने आप को ख़ुद से रखा हाथ भर दूर.


अपने कुत्तों, बिल्लियों, चिड़ियों,
धूलभरी निशानियों, दोस्तों, और सपनों को अनदेखा करो.


क़ीमत, वह फ़ालतू है
और शीर्षक भी
अब देखा जाए भीतर है क्या
उसके जूते का साइज़
यह नहीं कि वह किस तरफ़ जा रहा है-
वह जिसे तुम मैं कह देते हो
और साथ में एक तस्वीर जिसमें दिख रहा हो कान
- उसका आकार महत्वपूर्ण है, वह नहीं जो उसे सुनाई देता है.
और सुनने को है भी क्या?
-फ़क़त
काग़ज़ चिन्दी करने वाली मशीनों की खटरपटर.




-चित्र गूगल से साभार

Sunday, October 25, 2009

रब से एक दुआ

आज रात मुझे कई काम करने थे। सोचा था एक अधूरी किताब पूरी कर सकूंगी। संडे को बुक फेयर जा सकने और उससे पहले सिर में तेल लगवाकर सिर धो सकने का वक्‍़त निकालने के लिए जैसे-तैसे सुबह होने से पहले सो सकूंगी....। लेकिन हमेशा तो यही हुआ है कि जो सोचा वो नहीं हो सका। सोना तो बहुत दूर की बात है मैं लेट भी नहीं पा रही हूं।  बार-बार बालकनी में जाकर उसे देख रही हूं और दुआ कर रही हूं कि किसी तरह इसका दुख दूर हो जाए। क्‍या दुख है इसका वो तक पता नहीं। ये एक गाय है दो घंटे से गली में रंभाती घूम रही है। इसकी आवाज़ में जो तकलीफ़ है वो सोने नहीं देगी, पक्‍का है।

पता नहीं ये किसी से बिछुड़ गई है, रास्‍ता भूली है या इसका बच्‍चा इससे दूर हो गया है....? दिमाग़ में कई तरह की बातें हैं, काश इसके लिए कुछ किया जा सकता। जब भी वो बालकनी के सामने सड़क से आवाज़ सी लगाती गुज़रती है उसे आवाज़ लगाती हूं,  लेकिन वो सुनती नहीं....मेरी आवाज़ शायद उस तक जा भी नहीं रही है। क्‍या उसकी आवाज़ वहां तक जा रही है जहां वो पहुंचाना चाहती हो.....ईश्‍वर तक तो जा ही रही होगी न....क्‍या सुन रहा है ईश्‍वर...? जब वो कुछ दूर तक चली जाती है और आवाज़ आना बंद हो जाए तो लगता है शायद इस बार लौटेगी नहीं लेकिन थोड़ी देर में ही फिर लौटती है। हर बार उसका लौटना दुख को और गहरा कर रहा है।

बचपन में सुनते थे कि कुत्‍ता, बिल्‍ली, तोता और गाय अपने घर और मालिक को बहुत अच्‍छी तरह पहचानते हैं। कभी खो जाएं या बिछड़ जाएं तो ढूंढते हुए वापस आ जाते हैं। ईश्‍वर इस गाय का दुख दूर कर दे, इसका जो भी खोया हो उसे इससे मिला दे, जहां से ये बिछड़ गई हो, वहां इसे पहुंचा दे, मैं उसके लिए रब से दुआ मांग रही हूं- मैंने अगर कोई अच्‍छा काम कभी किया हो तो प्‍लीज़   इस गाय का दुख दूर कर दे।

Monday, October 19, 2009

ख़याल भी सच हो जाते हैं


दिवाली मनाना हमेशा आपके हाथ में ही होता है क्या... कभी आप दिये लेकर बैठे रह जाते हैं और देहरी तक पहुंच नहीं पाते, कभी देहरी पर बैठे रात गुज़र जाती है और दिये ही राह भूल जाते हैं...लेकिन नीयत नेक हो तो अंधेरा एक दिन भाग ही जाता है, कम से कम मुझे इस पर बहुत भरोसा है। आज एक नेक नीयत इंसान का दिवाली कार्ड मिला, मेरा भरोसा और ज्यादा गहरा हो गया।
कार्ड के साथ इमरोज़ ने एक छोटा सा ख़त लिखा है-
डियर शायदा
ख़याल भी सच हो जाते हैं,

आम जिंदगी में
जिंदगी के
मुश्किल से एक दो फूल खिलते हैं
पर मुहब्‍बत की जिंदगी में
जिंदगी के सारे के सारे फूल
जिंदगी भर खिले रहते हैं

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Monday, October 12, 2009

किसी को याद है....हठकर बैठा चांद

बचपन अपने साथ बहुत सारी चीजें ले जाता है, जैसे ये कविता-
हठकर बैठा चांद एक दिन माता यह बोला,
सिलवा दे मुझे भी ऊन का मोटा एक
झिंगोला...
.अगर किसी के पास है पूरी कविता तो प्‍लीज भेज दें, काफी दिन से मैं इसे ढूंढ रही हूं।
मुझे सिर्फ इतनी याद है..

हठकर बैठा चांद एक दिन माता से यह बोला
सिलवा दे मुझे भी ऊन का मोटा एक झिंगोला
सन-सन चलती हवा रात भ्‍ार जाड़े में मरता हूं
ठिठुर ठिठुर कर किसी तरह से यात्रा पूरी करता हूं


यह कविता यूपी की प्राइमरी क्‍लासों में लगी थी कभी, आज लगती है या नहीं, पता नहीं। ऐसी ही एक कविता थी
अम्‍मा जरा देख तो ऊपर चले आ रहे हैं बादल,
ये भी मुझे पिछले दिनों ब्‍लॉग पर ही देखने को‍ मिली। उम्‍मीद है चांद वाली भी मिल ही जाएगी।

Wednesday, September 30, 2009

हमारे सपनो की भाषा क्‍या है....

पहली पोस्‍ट से जारी....

आज इतने वर्ष बाद सोचने पर लगता है हिंदी-उर्दू में फ़र्क़ कहां है। मेरे लिए तो सचमुच फ़र्क़ नहीं है। जिस दिन फ़र्क़ दिखेगा, मैं ईश्‍वर  से कहूंगा-
हे ईश्‍वर , मुझे उस शून्‍य की आरे से चलो..
मुझे पीछे मुड़कर देखने पर महसूस होता है, ईश्‍वर शायद  मेरी प्रार्थना का आखि़री हिस्‍सा ही सुन पाया।  वो मुझे ले गया, शून्‍य की ओर, एक शून्‍य से दूसरे शून्‍य तक। फिर  तीसरे-चौथे शून्‍य की ओर। अब सिर्फ महाशून्‍य बाक़ी है, जिसकी ओर मेरे क़दम तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

लेकिन मैंने तो ईश्‍वर से कहा था, मुझे उस युग में ले चलो, जब शब्‍द नहीं थे, और अक्षर भी नहीं थे, जब भाषा भी नहीं थी और शून्‍य था। ईश्‍वर मुझे जिस युग में ले आया वहां शून्‍य ज़रूर है, मगर शब्‍द भी हैं और अक्षर भी, भाषा भी है। केवल संवेदनाएं नहीं है।

ख़ताओं और बेवफ़ाइयों के घटाटोप में मेरे अंदर साहस भी कहां रह गया है कि मैं अपने ईश्‍वर से कहूं-हे ईश्‍वर मुझे इस शून्‍य से उबारो और मेरी बेतरतीब चलनेवाली सांसों को विराम दो।
ईश्‍वर सुनता है, सबकी सुनता है, ऐसा मैंने किताबों में पढ़ा है। ईश्‍वर मेरी भी सुनेगा, ज़रूर सुनेगा।

एक दिन, किसी गोष्‍ठी में, मैंने अगंभीर लहजे में कहा था-मैं हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में लिखता हूं। इसके पीछे एक छोटा सा राज़ है। दरअसल मुझे ये दोनों भाषाएं नहीं आती । हिंदी में इस कारण लिखता हूं कि ग़लती पकड़े जाने पर आसानी से कहकर निकल सकूं कि यह रचना उर्दू की है, उर्दू में मूलरूप से लिखी गई है। उर्दू में लिखते वक्‍़त दिमाग़ में यही ख़याल रहता है, कोई उस्‍ताद मेरी ग़लतियों की गिरफ़त कर ले तो मैं हिंदी का सहारा लेकर अपनी अज्ञानता और नादानी पर पर्दा डाल सकूं। हिंदी और उर्दू वाले मेरी इस नादानी से अच्‍छी तरह परिचित हैं। हिंदी वाले मुझे उर्दूवाला और उर्दू वाले मुझे हिंदीवाला मानकर मेरी भाषाई कमज़ोरियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

कभी-कभी लगता है, मेरी जड़ें कहां हैं, कोई भी मुझे अपना मानने को तैयार नहीं।

हिंदी हो या उर्दू, दोनों का हाल एक जैसा है। अपनी-अपनी जगह दोनों को तिरस्‍कार के कड़वे घूंट पीने पड़ रहे हैं। दोनों भाषाएं दोहरी बदकि़स्‍मती का शिकार हैं। इनके विरोधी इनके समर्थकों से ज्‍़यादा जागरूक हैं!  हमने इन्‍हें अपने दिलों में रच-बस जाने की इजाज़त नहीं दी है। हमारी अभिव्‍यक्ति इन  भाषाओं से कतराती है, इन्‍हें भरोसेमंद नहीं मानती।

लोग कहते हैं,राजसत्‍ताएं और कंपनियां बाज़ार में भाषा का मूल्‍य तय करती हैं। भाषा का ग्राफ़ इसी मूल्‍य पर ऊपर या नीचे की ओर आता-जाता रहता है। बाज़ार में खपत नहीं हो तो भाषाएं लुप्‍त होने लगती हैं। अंग्रेजी भाषा आज भी भारतीय बाज़ार की सबसे अधिक मूल्‍य वाली वस्‍तु है। हम इसे अपने सीने से लगाए रखने को आतुर रहते हैं।
अंग्रेजी भाषा के प्रति हमारी यह आतुरता ही हिंदी और उर्दू, दोनों भाषाओं के स्‍वभाविक विकास और फैलाव के रास्‍ते की रुकावट है। ऐसा मैं अंग्रेजी नहीं जानने या कम जानने के कारण नहीं कह रहा हूं।

मैं सपने देखने का आदी हूं। मेरी आंखों की झील में सांवले सपनो की छाया तैरती रहती है। सपने जो इंसान को इंसानों से जोड़ते हैं, शब्‍द को शब्‍दों से, अक्षर को अक्षरों से जोड़ते हैं, और रूह की गहराइयों तक उतरने में हमारी मदद करते हैं।

बचपन से लेकर आज तक, मैंने जितने सपने देखे हैं उनकी भाषा हिंदी रही है, या उर्दू। अंग्रेजी मेरे सपनों की भाषा कभी नहीं रही, आगे भी नहीं रहेगी। अंग्रेजी से मेरा लगाव मुझे बेचैन नहीं करता। मेरी बेचैनियां तो हिंदी और उर्दू को लेकर हैं।

-सितंबर 1995 
अतीत का चेहरा, जाबिर हुसैन की डायरी .।