Wednesday, June 17, 2009

तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे......


गंगा मेरे घर से बहुत दूर थी। कई शहर दूर। उसके खतों को गंगा के हवाले नहीं कर सकता था। जला सकता था लेकिन जगजीत  और रहबर साहब  बार-बार आड़े आते रहे। तेरे खु़शबू में बसे खत मैं जलाता कैसे...शायद सौवीं बार मैं इस नज्म को सुन रहा था। हर बार आंख भर आने के बाद मैं कमज़ोर पड़ जाता था। नहीं जला सका...बहुत सोचने पर भी नहीं जला सका। किसी चीज़ को जला देना उसका अंतिम संस्कार है या उसे नष्ट कर देने की प्रक्रिया,  इस भेद में बहुत गहरे न जाते हुए भी मैं उन्हें आग में jhonk देने का साहस कभी नहीं कर पाया। हालांकि अरसे तक उस खु्शबू से परेशान रहा हूं जो उन्हें पढ़ते हुए मुझे लगातार महसूस हुआ करती थी। शुरु-शुरु में इसे वहम समझकर टालने की नीयत से मैंने उन्हें धूप में रखा कि अगर किसी गुलाब या perfumed कागज़ का असर हुआ तो खत्म हो जाएगा...लेकिन खु़शबू कहीं गई नहीं। मैंने उससे पूछा था कि हर दिन मुझे इतने लंबे खत को लिखते हुए वो कभी थकती नहीं और इनमें खु़शबू कहां से भरकर लाती है...उसने कभी मेरी बात का जवाब नहीं दिया.। ये बात तभी की है जब मैं इस ख़ुशबू में खो जाना चाहता था, बाद में मेरा मन उससे भर गया और एक दिन उन सबको एक बड़े लिफाफे में भरकर मैंने परछत्ती पर फेंक दिया।

मैं सुन रहा था...मुझको प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह...और मेरी आंख छलक-छलक जाती थी। इस भावुकता का क्या अर्थ है जब मैंने अरसे से उन खतो को खोलकर देखा तक नहीं । परछत्ती की सफाई का zimma अगर न लिया होता तो शायद मुझे खयाल तक न आता कि उनका कोई वजूद अब है भी। नज्म का एक टुकड़ा आकर  दिल पर लगता है-जिनको एक उम्र कलेजे से लगाए रखा...साथ ही याद आ जाता है कि लंबे अरसे तक मैं हर रोज़ सारे खतों को एक बार पढ़कर सोया करता था। पूरी नींद खु़शबू से गमक जाती थी। बाद में जब मैंने इस खु़शबू को खारिज किया तो भी वो हर रोज मेरी डायरी के बीच एक खत रखकर जाती थी। फिर पूरा दिन मेरी तरफ इस उमीद से देखा करती कि अब मैं उसे पढ़ूंगा.. लेकिन मैंने उन्हें पढ़ना बंद कर दिया था।

नज्म को बार-बार सुनने के पीछे भावुक होकर उन खतों को सीने से लगा लेने का मेरा कोई इरादा नही था। मैं दरअसल इन खतों को बाइज्ज़त गंगा के सुपुर्द कर देने का जज्बा अपने अंदर पैदा करने की कोशिश कर रहा था। कितनी पवित्र qism का आइडिया है खतों को गंगा के हवाले कर देना...न मन पर किसी तरह का बोझ रहे और न ही उन्हें अपने साथ रखे रहने का टंटा बचे। मुझे vishwas था कि मैं अगर लगातार इसे सुनता रहूंगा तो  दो दिन की छुट्टी लेकर गंगा तक जाने का प्रोग्राम बना लूंगा। हर बार नज्म के शुरु होने पर मैं सोचता रहा कि इन्हें जला देना ठीक होगा और aakhir तक आते-आते उन्हें गंगा में बहा देने का मूड बन जाता।

लगातार तीसरे दिन नज्म को सुनते हुए मैंने वो लिफा़फा गाड़ी में रखा। तेरे खु़शबू में बसे खत मैं जलाता कैसे...सचमुच जलाना मेरे लिए मुश्किल है और गंगा तक जाने का वक्त वाकई मेरे पास नहीं है। मैंने गाड़ी शहर के बाहर वाली उस सड़क पर डाल दी जहां एक छोटा  राजबाहा जाकर आगे बड़ी नहर से मिलता है। हां इसमें गंगा का नाम कहीं नहीं है लेकिन इस वक्त मेरे पास इससे बेहतर और कोई रास्ता भी कहां है। मैंने पुल के ऊपर खड़े होकर वो लिफाफा खोला और उसका मुंह नीचे की तरफ कर दिया। सारे कागज़ पानी में गिर गए थे। बीच में रखे सूखे गुलाब के फूलों की कुछ पçत्तयां पानी के ऊपर नज़र आ रही थीं। दो मिनट खड़े होकर मैंने उन्हें देखा और वापस आकर गाड़ी में एक बार फिर वही नज्म सुनी।  खु़शबू अब भी गाड़ी में बाकी  थी।








-जगजीत सिंह और राजेंद्र नाथ रहबर से माफी चाहते हुए।






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5 comments:

ओम आर्य said...

इतनी छोटी से नदी में आपने इतना बड़ा आग लगा दिया.

Udan Tashtari said...

आपकी लेखनी हर बर पिछली बार से ज्यादा कायल बना जाती है..बधाई.

डॉ .अनुराग said...

कुछ लोग आमद न दे तो उनसे शिकायत करने का जी चाहता है ...हमारी भी दर्ज कर ले ......

Vidhu said...

तृष्णा नही ,जरूरत भी नही,अनुभूति की एक और ही दुनिया होती है ...शायदा जी वाकई तारीफे काबिल है आप और आप का लिखा बधाई ...

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

बेहतरीन... वाकई काबिले तारीफ...

..शुक्रिया.