Wednesday, September 30, 2009

हमारे सपनो की भाषा क्‍या है....

पहली पोस्‍ट से जारी....

आज इतने वर्ष बाद सोचने पर लगता है हिंदी-उर्दू में फ़र्क़ कहां है। मेरे लिए तो सचमुच फ़र्क़ नहीं है। जिस दिन फ़र्क़ दिखेगा, मैं ईश्‍वर  से कहूंगा-
हे ईश्‍वर , मुझे उस शून्‍य की आरे से चलो..
मुझे पीछे मुड़कर देखने पर महसूस होता है, ईश्‍वर शायद  मेरी प्रार्थना का आखि़री हिस्‍सा ही सुन पाया।  वो मुझे ले गया, शून्‍य की ओर, एक शून्‍य से दूसरे शून्‍य तक। फिर  तीसरे-चौथे शून्‍य की ओर। अब सिर्फ महाशून्‍य बाक़ी है, जिसकी ओर मेरे क़दम तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

लेकिन मैंने तो ईश्‍वर से कहा था, मुझे उस युग में ले चलो, जब शब्‍द नहीं थे, और अक्षर भी नहीं थे, जब भाषा भी नहीं थी और शून्‍य था। ईश्‍वर मुझे जिस युग में ले आया वहां शून्‍य ज़रूर है, मगर शब्‍द भी हैं और अक्षर भी, भाषा भी है। केवल संवेदनाएं नहीं है।

ख़ताओं और बेवफ़ाइयों के घटाटोप में मेरे अंदर साहस भी कहां रह गया है कि मैं अपने ईश्‍वर से कहूं-हे ईश्‍वर मुझे इस शून्‍य से उबारो और मेरी बेतरतीब चलनेवाली सांसों को विराम दो।
ईश्‍वर सुनता है, सबकी सुनता है, ऐसा मैंने किताबों में पढ़ा है। ईश्‍वर मेरी भी सुनेगा, ज़रूर सुनेगा।

एक दिन, किसी गोष्‍ठी में, मैंने अगंभीर लहजे में कहा था-मैं हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में लिखता हूं। इसके पीछे एक छोटा सा राज़ है। दरअसल मुझे ये दोनों भाषाएं नहीं आती । हिंदी में इस कारण लिखता हूं कि ग़लती पकड़े जाने पर आसानी से कहकर निकल सकूं कि यह रचना उर्दू की है, उर्दू में मूलरूप से लिखी गई है। उर्दू में लिखते वक्‍़त दिमाग़ में यही ख़याल रहता है, कोई उस्‍ताद मेरी ग़लतियों की गिरफ़त कर ले तो मैं हिंदी का सहारा लेकर अपनी अज्ञानता और नादानी पर पर्दा डाल सकूं। हिंदी और उर्दू वाले मेरी इस नादानी से अच्‍छी तरह परिचित हैं। हिंदी वाले मुझे उर्दूवाला और उर्दू वाले मुझे हिंदीवाला मानकर मेरी भाषाई कमज़ोरियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

कभी-कभी लगता है, मेरी जड़ें कहां हैं, कोई भी मुझे अपना मानने को तैयार नहीं।

हिंदी हो या उर्दू, दोनों का हाल एक जैसा है। अपनी-अपनी जगह दोनों को तिरस्‍कार के कड़वे घूंट पीने पड़ रहे हैं। दोनों भाषाएं दोहरी बदकि़स्‍मती का शिकार हैं। इनके विरोधी इनके समर्थकों से ज्‍़यादा जागरूक हैं!  हमने इन्‍हें अपने दिलों में रच-बस जाने की इजाज़त नहीं दी है। हमारी अभिव्‍यक्ति इन  भाषाओं से कतराती है, इन्‍हें भरोसेमंद नहीं मानती।

लोग कहते हैं,राजसत्‍ताएं और कंपनियां बाज़ार में भाषा का मूल्‍य तय करती हैं। भाषा का ग्राफ़ इसी मूल्‍य पर ऊपर या नीचे की ओर आता-जाता रहता है। बाज़ार में खपत नहीं हो तो भाषाएं लुप्‍त होने लगती हैं। अंग्रेजी भाषा आज भी भारतीय बाज़ार की सबसे अधिक मूल्‍य वाली वस्‍तु है। हम इसे अपने सीने से लगाए रखने को आतुर रहते हैं।
अंग्रेजी भाषा के प्रति हमारी यह आतुरता ही हिंदी और उर्दू, दोनों भाषाओं के स्‍वभाविक विकास और फैलाव के रास्‍ते की रुकावट है। ऐसा मैं अंग्रेजी नहीं जानने या कम जानने के कारण नहीं कह रहा हूं।

मैं सपने देखने का आदी हूं। मेरी आंखों की झील में सांवले सपनो की छाया तैरती रहती है। सपने जो इंसान को इंसानों से जोड़ते हैं, शब्‍द को शब्‍दों से, अक्षर को अक्षरों से जोड़ते हैं, और रूह की गहराइयों तक उतरने में हमारी मदद करते हैं।

बचपन से लेकर आज तक, मैंने जितने सपने देखे हैं उनकी भाषा हिंदी रही है, या उर्दू। अंग्रेजी मेरे सपनों की भाषा कभी नहीं रही, आगे भी नहीं रहेगी। अंग्रेजी से मेरा लगाव मुझे बेचैन नहीं करता। मेरी बेचैनियां तो हिंदी और उर्दू को लेकर हैं।

-सितंबर 1995 
अतीत का चेहरा, जाबिर हुसैन की डायरी .।

Sunday, September 27, 2009

हमारे सपनों की भाषा क्‍या है....



 दफ़तर की लाइब्रेरी में कुछ और खोजते हुए हाथ लगी थी एक किताब अतीत का चेहरा, जाबिर हुसेन की डायरी। राजकमल ने इसे छापा है। पढ़ते हुए एक जगह मैं बार-बार अटकी हूं, कई बार पढ़ा इस प्रसंग को। मुझे लगा यहां बांट लेना चाहिए इसे, पढ़कर देखिए आप भी



मैंने हिंदी कैसे सीखी


मेरे हिंदी सीखने की दास्‍तान भी अजीब है।
मुझे नहीं मालूम बाबू त्रप्तिनारायाण सिंह इस समय कहां हैं पहले वन विभाग की सेवा में थे। मेरे पिता और वो एकसाथ चाईबासा में कार्यरत थेत्र अलग-अलग विभागों में रहने के बावजूद सरकार ने उन्‍हेंएक ही मकान के दो हिस्‍सों में जगह दे रखी थी। बीच में सिर्फ़ ढाई फीट का चौडा  दरवाज़ा था।
यह दरवाज़ा कुछ दिनों बंद रहा,फिर खुल गया। खुला तो ऐसा कि फिर कभी बंद नहीं हो पाया।
इन्‍हीं बाबू त्रप्तिनारायण सिंह की धर्मपत्‍नी को मैं आज स्‍मरण करना चाहता हूं। वो धार्मिक स्‍वभाव की महिला थीं। अपने मकान के एक कमरे को उन्‍होंने बाज़ाप्‍ता एक छोटे मंदिर का रूप दे रखा था। दिन रात, हर वक्‍त पूजा-पाठ  मे लगी रहती थीं। दो बच्‍चे थे उनके, एक बेटी और एक बेटा। बेटा बड़ी मिन्‍नतों से पैदा हुआ था। बड़ी-बड़ी जटाएं थीं उसकी और मां ने किसी तीर्थ स्‍थान जाने तक
 उसे यूं ही रखने की क़सम खाई थी।
तब मेरी उम्र तीन-चार वर्ष रही होगी।
अचानक एक दिन मकान के बग़ल वाले हिस्‍से में तांगे से बाबू त्रप्ति नारायण सिंह का परिवार उतरा। परिवार में दो बच्‍चे भी उतरे। हम अपनी बहनों समेत उस दालान की तरफ़ दौड़े जहां छोटी सी
गोपा अपने भाई के साथ खड़ी थी। कुछ क्षणों में ही  हम  दोस्‍ती के रिश्‍ते में बंध गए।
गोपा और उसके भाई को हिंदी पढ़ाने के लिए एक मास्‍टर बहाल किया गया। मकान के बाहरी दालान में एक चटाई पर हम तीनों तस्‍वीरों वाली एक रंगीन किताब से हिंदी पढ़ने लगे। हर रोज़ स्‍लेट और पेंसिल लेकर हम दालान में मास्‍टर के आने का इंतजार करते होते।
बाबू त्रप्ति नारायण सिंह हमें लगन से हिंदी पढ़ता देखकर खु़श होते थे। यह खु़शी उनके चेहरे से ज़ाहिर होती थी।
 एक दिन चाईबासा के किसी गांव में दंगों की आशंका पैदा हो गई और हमारे मकान के सामने वाले मैदान में हमारी सुरक्षा के लिए कुछ पुलिस के जवान तैनात कर दिए गए। हमें घर से
बाहर, दालान तक जाने से मनाही हो गई।
गोपा,  उसके भाई, बाबू त्रप्ति नारायण सिंह और उनकी पत्‍नी, सबका हमारी तरफ़ आना-जाना बंद हो गया। मेरी हिंदी की पढ़ाई भी रुक गई। मुझे अच्‍छी तरह याद है, मैं अपनी स्‍लेट और तस्‍वीरों वाली रंगीन किताब लिए घंटों उस दरवाज़े पर बैठा रहने लगा, जो हमारे और गोपा के मकानों को जोड़ता था।

एक दिन, उसी दरवाज़े पर मुझे बैठे-बैठे मुझे अचानक दूसरी तरफ़ से मास्‍टर साहेब की आवाज़ सुनाई थी। वो गोपा और उसके भाई को उसी तस्‍वीरों वाली किताब से हिंदी पढ़ा रहे थे।
पढ़ाई का काम दरवाले के ठीक उस तरफ़ वाले दालान में हो रहा था।
उस दिन से लेकर अगले चार सप्‍ताह तक मैं ठीक समय पर, दरवाजे़ की ओर अपने कान लगाए, अपनी स्‍लेट और किताब से हिंदी सीखता रहा। मास्‍टर साहेब के चले जाने पर मैं घंटों वहीं,
ज़मीन पर बैठा-बैठा  अ से आम, क से कौवा लिखने-बोलने का अभ्‍यास करता।
एक दिन हालात सामन्‍य होने की ख़बर आई और मैदान से पुलिस के ख़ेमे उठ गए। सबसे पहले बाबू त्रप्ति नारायण की पत्‍नी हमारे घर में आईं फिर गोपा और उसका भाई।

दूसरे दिन मास्‍टर साहेब आए, गोपा के दालान पर चटाई बिछी। गोपा की मां ने दोनों मकानों के बीच का पांच सप्‍ताहों से बंद दरवाज़ा अपने हाथों से खोला। सबसे पहले मुझे पुकारा,
 फिर मेरी बहन को। अपने हाथों से, प्‍यार  से, गोपा की मां ने हमें पूजा का प्रसाद खिलाया।
प्रसाद लेकर मैं बाहर दालान में आया। मास्‍टर साहेब ने मुझे देखकर कहा, तुम्‍हारी पढ़ाई छूट गई। कोई बात नहीं, मैं पिछला हिस्‍सा दोबारा पढ़ा दूंगा।

मैंने मास्‍टर साहेब के पांव छुए और धीमी आवाज़ में कहा, नहीं सर, आप आज का सबक़ पढ़ाएं। मैंने दरवाज़े के उस पार से कल तक का सबक़ पढ़ लिया है।
पास खड़ी गोपा की मां, मुझे अच्‍दी तरह याद है, फूट-फूट कर रोने लगी। इस क़दर  कि मेरी मां बावरचीख़ाने से बाहर आ गईं और तक़रीबन दौड़ती-भागती गोपा के दालान पहुंचीं।
मैंने भरी-भरी आंखों से अपनी और गोपा की मां को देखा। मेरे लिए यह तय करना मुश्किल था कि इनमें से सचमुच मेरी मां कौन सी है और गोपा की कौन सी।


contd....

Monday, August 24, 2009

फिर से एक बार हर एक चीज़ वही हो जो है....

दिन, किसी खूंटी पर टंगी क़मीज़ नहीं थे....तो भी उन्‍हें झटक कर पहनना सीख लिया मैंने।  हर सुबह घर से निकलते हुए साफ़ और बेदाग़ दिखता हूं,  जैसे देर रात इस्‍तरी से हर शिकन को मिटा दिया गया था......अब आदत हो गई है इसकी। कोसी आवाज़ में कोई पूछता है- आज क्‍या है?  दिमाग़ पर ज़ोर डाले बिना तारीख़ दिन और साल बताने लगता हूं। उसकी पीली आंखों में आंसू मटमैले होकर कोरों से बाहर आएं इससे पहले ही, खु़द को इस सारी स्थिति से झटक कर दूर करते हुए बाहर निकल जाता हूं। मुझे सफ़ेद रंग पसंद है, पीला और मटमैला नहीं। इससे पहले दिनभर मेरी कुर्सी के ठीक बाईं तरफ़ रास्‍ते के बीचोंबीच फर्श पर बिछी दो बाई दो की सफे़द टाइल मेरा मखौल उ़ड़ाती रहती है। वो पहली बार इसी जगह आकर खड़ी हुई थी मेरे सामने....कौन सा दिन था वह....मैं एक बार फिर क़मीज़ पर चिपके किसी दिन को झटकने का उपक्रम करता हूं। याद आ सकने की सारी गुंजाइशों को ख़ारिज करने की कामयाब कोशिश मुझे ख़ास कि़स्‍म की अमीरी से भर देती है। 
वापस लौटता हूं....दो बाई दो टाइल पर किसी पांव के निशान नहीं हैं, सफेद चमकती हुई बेदाग़ टाइल....उसका रंग मेरी क़मीज़ से ज्‍़यादा सफे़द नहीं है.... खु़द को तसल्‍ली देता हूं, लेकिन अगले ही पल उस टाइल पर दो पांव नज़र आते हैं,  चेहरा देखे बिना भी जानता हूं, वही है,  फिर से वही है। फिर पूछेगी.आज क्‍या है...मुझे गिनना होगा दिन, महीना और तारीख़। वो हमेशा आकर उसी जगह क्‍यों रुकती है....जैसे कदम नाप रखे हों.....ठीक उसी टाइल तक आने के लिए, न एक इंच इधर, न उधर....। जिस वक्‍़त कोई इस कमरे में नहीं होता, मैं आराम से उस जगह पर सिगरेट पीते हुए चहलक़दमी करना चाहता हूं....एक सावधानी हमेशा मेरे दिमाग पर टन्‍न से बजते हुए मुझसे दो क़दम आगे रहती है, आगाह करते हुए कि इस टाइल पर पांव मत रखना। कितनी भी हडबड़ी हो, कैसी भी बेख़याली हो मैं उस टाइल पर बरसों से जमकर खड़े हुए एक दिन से टकराता नहीं। वहां पांव पड़ना जैसे किसी अपशकुन के घेरे में जाने जैसा लगता है। यह दिन यहां कब से एक पिलर की तरह खड़ा है....जब ये इमारत बनी थी तब से...;नहीं शायद उससे भी पहले से, पता नहीं .दिमाग़ पर ज़ोर डालना चाहता हूं....कौन सा दिन रहा होगा वो.....।  हिसाब लगा लेना चाहता हूं कितने बरस हो गए सावधानी से चलते हुए,  अमीरी महसूस करने का एक मौक़ा हाथ से फिसल जाता है। इस फ़र्श को बदलना दूंगा  हूं.....टाइल समेत। चालाकियों को परे सरकाते हुए अपनी कमीज़ के अंदर झांकता हूं....आंख में मटमैले आंसू उतरने लगते हैं, बेहद ग़रीब से एक आंसू को उगंली के पोर पर रखकर फूंक से उड़ा देता हूं। उसकी हैसियत उड़ जाने भर की है.....। 
रो देना....किसी दिन को मिटा देने का पूरा और पुख्‍ता इलाज नहीं है। मैं हार जाना चाहता हूं, इस सफ़ेदी से...थोड़ा सा मैल और थोड़ी सी गर्द, कभी कफ़ और कॉलर पर नजर आ जाए.. दिनों के बंद सिरे को उधेड़कर, रेशा-रेशा धुनकर बिखेरते हुए दिन की धज्जियों को उड़ाकर कुछ देर खु़श हो जाना चाहता हूं। इतना ख़ुश कि मेरी आंखों से सारा गंदला पानी बह जाए....बाक़ी बची रहे साफ़ और बेगुनाह नमी....। ..सचमुच मेरी आंखों से पानी बहने लगता है....पोंछने के लिए रूमाल निकालता हूं...कब से धुला नहीं है, शायद तभी से जब मैंने साफ़ क़मीज़ पहननी शुरु की थी.....पत्‍नी को आवाज़ लगाता हूं-इस घर में मुझे एक साफ़ बेदाग़ रूमाल मिल सकेगा.....। जवाब नहीं आता, बस एक और रूमाल मुझ पर आ गिरता है उतना ही मटमैला जितना पहले से मेरे हाथ में है...।  

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.-एक पाई हुई डायरी का पीला पन्‍ना

Tuesday, July 7, 2009

उसकी आंख में बादल था

जिनकी आंख में बादल था...
उसने पांचवीं बार यही लाइन कही लेकिन पूरा होने से पहले ही इस बार भी लड़की ने उसे टोक दिया।
बोली-ये सब बाद में सुनाना बारह बजने से पहले अपने मोबाइल से दो एसएमस कर दो ताज के लिए...

नहीं, मैं नहीं करूंगा।

क्‍यों नहीं करोगे, तुम प्रेम विरोधी हो.....।

नहीं हूं, लेकिन एक भव्‍य स्‍मारक बनाने के लिए हजारों लोगों पर हुए जुल्‍म और उसे बनाने वाले संगतराश के हाथ काटे जाने की बात से द्रवित ज़रूर होता हूं।
ताजमहल के लिए वोट करना, एक तरह से उस सारी क्रूरता के पक्ष में खड़े होना है।

ओह...तुम्‍हारा आदर्शवाद, ये भी कोई बात हुई....।

बात हो या न हो, मैं नहीं करने वाला वोट।
बारह बजने वाले हैं कर दो प्‍लीज एसएमएस, हो सकता है हमारी वोट से ही ताज सेवल वंडर्स में आ जाए...।
ओके कर देता हूं लेकिन मैं इसके पक्ष में नहीं हूं...

अच्‍छा अब सुनो दो लाइनें....
जिनकी आंख में बादल था...

यार आज मेरा मन सिर्फ़ ताजमहल की बात करने का है। तुम साहिर क्‍यों नहीं सुनाते....।

साहिर की ताजमहल वाली ग़ज़ल,
मेरी महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे,
ऐसे नहीं गाकर सुनाओ..।
गाकर नहीं सुना सकता, तुम्‍हें पता है न,
गाकर ही सुनाओ....
ओके; सुनो....मेरी महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे...
और
ताजमहल उनके बीच आ बैठा था
सफे़द और ठंडा, उसे छूकर देखते हुए वो बोली
चलो आगरा चलते हैं न,,,
नहीं बनारस ठीक रहेगा,
ओहो आगरा, ठीक है पहले आगरा फिर बनारस...
ताजमहल दौड़ रहा था, सात अजूबों की रेस में
उसकी सांस तेज थी, बहुत तेज
प्रेम के स्‍मारक को जीतना ही होगा
सारी दुनिया इंतजार कर रही है,
पटाखे़, फुलझड़ी और रोशनियों के सारे इंतजाम करके
हमारा ताज ओह हमारा ताज
और जीत गया हमारा ताज....।

जीत की आतिशबाजि़यों के बीच लड़के ने एक बार फिर कहा
अब सुनोगी जो मैं कहना चाहता था...लड़की ने नहीं सुना.प्रेम के स्‍मारक का जीत का शोर बहुत था। लड़की सुन नहीं पा रही थी,

लड़के ने बुदबुदाया
जिनक आंख में बादल था
गालों पर बरसात हुई.......


बारिश सचमुच आ गई थी....उसने मुंह आसमान की तरफ़ किया और चुपचाप वापस हो लिया था।
.............................................

07/07/07
.आज से ठीक दो साल पहले, जब ताजमहल को विश्‍व के सात अजूबों में शामिल करने की मुहिम जो़रों पर थी तो यह द्रश्‍य दिखा था।

Saturday, June 20, 2009

फादर्स डे



बहुत दिन पहले की बात है. जंगल में एक शेर रहा करता था....अब नहीं रहता.


This May 7, 2009 photo provided by the Wildlife Conservation Society shows Bronx Zoo's lion M’wasi, left, and daughter Moxie enjoying a playful outing in the Zoo's African Plains exhibit in the Bronx Borough of New York. (AP Photo/Wildlife Conservation Society, Julie Larsen Maher)

Wednesday, June 17, 2009

तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे......


गंगा मेरे घर से बहुत दूर थी। कई शहर दूर। उसके खतों को गंगा के हवाले नहीं कर सकता था। जला सकता था लेकिन जगजीत  और रहबर साहब  बार-बार आड़े आते रहे। तेरे खु़शबू में बसे खत मैं जलाता कैसे...शायद सौवीं बार मैं इस नज्म को सुन रहा था। हर बार आंख भर आने के बाद मैं कमज़ोर पड़ जाता था। नहीं जला सका...बहुत सोचने पर भी नहीं जला सका। किसी चीज़ को जला देना उसका अंतिम संस्कार है या उसे नष्ट कर देने की प्रक्रिया,  इस भेद में बहुत गहरे न जाते हुए भी मैं उन्हें आग में jhonk देने का साहस कभी नहीं कर पाया। हालांकि अरसे तक उस खु्शबू से परेशान रहा हूं जो उन्हें पढ़ते हुए मुझे लगातार महसूस हुआ करती थी। शुरु-शुरु में इसे वहम समझकर टालने की नीयत से मैंने उन्हें धूप में रखा कि अगर किसी गुलाब या perfumed कागज़ का असर हुआ तो खत्म हो जाएगा...लेकिन खु़शबू कहीं गई नहीं। मैंने उससे पूछा था कि हर दिन मुझे इतने लंबे खत को लिखते हुए वो कभी थकती नहीं और इनमें खु़शबू कहां से भरकर लाती है...उसने कभी मेरी बात का जवाब नहीं दिया.। ये बात तभी की है जब मैं इस ख़ुशबू में खो जाना चाहता था, बाद में मेरा मन उससे भर गया और एक दिन उन सबको एक बड़े लिफाफे में भरकर मैंने परछत्ती पर फेंक दिया।

मैं सुन रहा था...मुझको प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह...और मेरी आंख छलक-छलक जाती थी। इस भावुकता का क्या अर्थ है जब मैंने अरसे से उन खतो को खोलकर देखा तक नहीं । परछत्ती की सफाई का zimma अगर न लिया होता तो शायद मुझे खयाल तक न आता कि उनका कोई वजूद अब है भी। नज्म का एक टुकड़ा आकर  दिल पर लगता है-जिनको एक उम्र कलेजे से लगाए रखा...साथ ही याद आ जाता है कि लंबे अरसे तक मैं हर रोज़ सारे खतों को एक बार पढ़कर सोया करता था। पूरी नींद खु़शबू से गमक जाती थी। बाद में जब मैंने इस खु़शबू को खारिज किया तो भी वो हर रोज मेरी डायरी के बीच एक खत रखकर जाती थी। फिर पूरा दिन मेरी तरफ इस उमीद से देखा करती कि अब मैं उसे पढ़ूंगा.. लेकिन मैंने उन्हें पढ़ना बंद कर दिया था।

नज्म को बार-बार सुनने के पीछे भावुक होकर उन खतों को सीने से लगा लेने का मेरा कोई इरादा नही था। मैं दरअसल इन खतों को बाइज्ज़त गंगा के सुपुर्द कर देने का जज्बा अपने अंदर पैदा करने की कोशिश कर रहा था। कितनी पवित्र qism का आइडिया है खतों को गंगा के हवाले कर देना...न मन पर किसी तरह का बोझ रहे और न ही उन्हें अपने साथ रखे रहने का टंटा बचे। मुझे vishwas था कि मैं अगर लगातार इसे सुनता रहूंगा तो  दो दिन की छुट्टी लेकर गंगा तक जाने का प्रोग्राम बना लूंगा। हर बार नज्म के शुरु होने पर मैं सोचता रहा कि इन्हें जला देना ठीक होगा और aakhir तक आते-आते उन्हें गंगा में बहा देने का मूड बन जाता।

लगातार तीसरे दिन नज्म को सुनते हुए मैंने वो लिफा़फा गाड़ी में रखा। तेरे खु़शबू में बसे खत मैं जलाता कैसे...सचमुच जलाना मेरे लिए मुश्किल है और गंगा तक जाने का वक्त वाकई मेरे पास नहीं है। मैंने गाड़ी शहर के बाहर वाली उस सड़क पर डाल दी जहां एक छोटा  राजबाहा जाकर आगे बड़ी नहर से मिलता है। हां इसमें गंगा का नाम कहीं नहीं है लेकिन इस वक्त मेरे पास इससे बेहतर और कोई रास्ता भी कहां है। मैंने पुल के ऊपर खड़े होकर वो लिफाफा खोला और उसका मुंह नीचे की तरफ कर दिया। सारे कागज़ पानी में गिर गए थे। बीच में रखे सूखे गुलाब के फूलों की कुछ पçत्तयां पानी के ऊपर नज़र आ रही थीं। दो मिनट खड़े होकर मैंने उन्हें देखा और वापस आकर गाड़ी में एक बार फिर वही नज्म सुनी।  खु़शबू अब भी गाड़ी में बाकी  थी।








-जगजीत सिंह और राजेंद्र नाथ रहबर से माफी चाहते हुए।






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Sunday, May 17, 2009

कैसी अफीम घुली थी उन दिनों में

कुछ तो ऐसा है जो मुझे समझ नहीं आता, जिसे डीकोड करने की कोशिश में अक्सर मैं उस जगह जाकर खड़ा होता हूं , जहां से पहली बार उसे आते हुए देखा था। अब वहां खड़ा होने पर मैं उसे नज़र नहीं आता... न ही वहां खड़े हुए उसका आना मैं देख पाता हूं। इस पहेली का सिरा कहां है...? कल देर तक इसे सुलझाने की कोशिश करते हुए  एक कड़वाहट और पल्ले पड़ ही गई। गाड़ी के धूल पर भरे शीशे पर लिखा एक शब्द अमली...मुझे काटने क्यों दौड़ा? इस नाम को तो कभी मैने खु़द अपने लिए तय किया था। पन्ने खोलने पड़ते हैं उन दिनों की तहों में जाने के लिए जब हर वक़्त एक नशे मंे रहने का सा अहसास होता था। मै उससे बाहर कब आना चाहता था? एक दिन मैंने गहरे डूबकर उससे कहा-तुम औरत नहीं अफीम हो...और साथ ही उसके मोबाइल के कॉन्टेक्ट ऑप्शन में जाकर अपने नाम के बदले अमली सेव कर दिया था। लंबे समय तक उसके फोन पर वहां अमली शब्द दिखता रहा...पता नहीं अब भी उसने बदला है या नहीं। लेकिन अपने दिमाग से मैं उस नशे और अमल...सब को डिलीट कर चुका हूं। एक उंगली से उकेरे गए इन नाम पर कभी मैं किस तरह न्यौछावर होने को उतावला था...आज उस उंगली को चूम लेने का खयाल एक अजीब सी koft से भर देता है।
कैसे बदल जाते हैं दिन....और क्यों बदल जाते हैं? मैं खु़द से हज़ार सवाल पूछते हुए हैरान होता हूं कि क्या ये मैं ही हूं जो आज यह सब कर रहा हूं जबकि कभी मैंने ही इस अफीम जैसी औरत को घूंट-घूंट चख लेने तक का सब्र नहीं किया था। मुझे बहुत जल्दी थी। उस नशे की बात बिल्कुल अकेलेपन में सोचते हुए भी शर्मसारी सिर चढ़ी जाती है। क्या जवाब दूंगा मै¡ अपनी उम्र के उन बरसों को जो मैंने उस नशे मंे बिता दिए..जिसका आज कोई मतलब नहीं। कल जब मैं लिखूंगा इन सबके बारे में तो शब्द मेरे पास आने से इनकार तो नहीं कर देंगे? अपने लेखन मंे उसे खारिज करने का काम मैंने काफी पहले कर दिया था। यहां तक कि जिन जगहों पर अफीम में डूबे उन दिनों का जि़क्र था उन्हें एक फलसफे का जामा पहनाकर दोबारा इस तरह दुरुस्त कर दिया है कि कोई पारखी वहां तक जाकर उसके असली रंग को देख नहीं सकेगा। लेकिन ये सब करते रहना क्या हमेशा आसान बना रह सकेगा मेरे लिए?
अपनी होशियारी पर कायल होना मुझे कभी भूलता नहीं। लेकिन उसे अपने सामने पाकर मेरे अंदर एक कॉप्लेक्स तो ज़रूर जागता है कि मेरी कोई होशियारी उससे छिप क्यों नहीं पाती? अपनी बढ़ाई हुई दाढ़ी के कारण भाव छिपा जाने की कला में मुझे महारत है, लेकिन वो न देखते हुए भी सब कैसे समझ लेती है। कई बार ऐसा लगता है जैसे मैं उसके सामने पारदर्शी हो गया हूं। मेरे अंदर की हर हलचल उसे दिख रही है। यहां तक कि मेरी सोच का सारा सर्किट उसकी नज़र मंे है और आंतों से लेकर ब्लड कॉपोनेंट तक की सारी तफसील उसके पास दर्ज है। इतना खुलापन...मैं इस सब से उकता गया हूं, इस हद तक कि अब लगता है बस...और नहीं। मैं छिपकर रहना चाहता हूं, अपने आप पर एक ऐसा parda चढ़ाकर जिसके परे सिर्फ वही दिखे जो मैं दिखाना चाहता हूं। काश कि मैं उसे कह सकूं वो उस हवा मंे सांस न ले जहां मैं ले रहा हूं...दूर चली जाए अपनी अफीम की महक वाली सारी सांसें लेकर ताकि मैं उन दिनों की सारी स्मृतियांे को जड़ से खुरच कर साफ कर सकूं।
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-इस पोस्ट का शीर्षक ब्लॉगर महेन मेहता की एक कविता की एक लाइन ही है। जब मैंने यह कविता पढ़ी तो ये लाइन अटक गई थी कहीं। खै़र यहां बिना पूछे लगा ली गई है, आभार सहित।
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ek diary ka panna