Monday, August 11, 2008

अपने-अपने इमरोज़




पहली पोस्ट पर अपने कमेंट में घुघूती जी ने लिखा था...हम सब अपने-अपने इमरोज़ को ढूँढ रही हैं। परन्तु क्या इतने इमरोज़ इस संसार ने पैदा किये हैं?....ऐसे ही सवाल निरुपमा में घर में भी उठे थे उस दिन। लंबी बातचीत के बीच कभी कोई कह उठती हमें इमरोज़ क्यों नहीं मिला.. तो किसी ने कहा- हमारे हिस्से का इमरोज़ कहां है....? कहां है वो शख्स जो अपनी पीठ पर एक गै़र नाम की इबारत को महसूस करते हुए भी पीठ नहीं दिखाता? एक हाथ से दी गई थाली को दो हाथों से स्वीकार करते हुए अपने चेहरे पर एक शिकन तक आने नहीं देता... कहां है वो प्रेम जो खु़द को मिटा देने की बात करता है.... कहां है वो इंसान जो किसी के चले जाने के बाद भी उसके साथ होने की बात करता है? हम सब ढूंढती हैं पर वो कहीं नहीं दिखता। शायद इसलिए कि ऐसे इमरोज़ को पाने से पहले अमृता हो जाना पड़ता है। दुनियादारी की चादर को इस तरह तह करके रखकर भूल जाना होता है कि उसकी याद तक न आए। उस चादर को बिना बरते जिंदगी गुज़ार सकने की हिम्मत पैदा कर लेनी होती है। हो सकता है, बहुत सारे अमृता और इमरोज एक ही वक़्त पर एक ही जगह इसलिए भी न दिख पाते हों कि उन्हें याद ही नहीं रहा है दुनियादारी और दुश्वारियों की चादर को कैसे तह करके रखा जाता है।

खै़र अपनी-अपनी चादरों की संभाल के बीच भी अपने-अपने इमरोज़ को ढूंढते रहा जा सकता है, क्योंकि ईश्वर अभी भी है कहीं...। मैंने उनसे इजाज़त ली और एक बार फिर ये नज़्म सुनाने को कहा-


साथ

उसने जिस्म छडया है, साथ नहीं
ओह हुण वी मिलदी है
कदे बदलां छांवे
कदे तारेयां दी छांवे
कदे किरणां दी रोशनी विच
कदे ख्यालां दे उजाले विच
असी रल के तुरदे रैंदे वां।

दुख-सुख, इक दूजे नूं वेख-वेख
कुझ कैंदे रैंदे आं
कुझ सुणदे रैंदे आं।
बगीचे विच सानूं
तुरदेयां वेख के
फुल्ल हर वार सानूं बुला लेंदे हण
असी फुल्लां दे घेरे विच बैठ के
फुल्लां नूं वी
अपणा-अपणा कलाम सुनादें आं।

ओ अपनी अनलिखी कविता सुनांदी है
ते मैं वी अपणी अनलिखी नज़म सुनांदा वा
कोल खड़ा वक्त
एह अनलिखी शायरी सुनदा-सुनदा
अपणा रोज दा
नेम भुल जांदा ए।
जदों वक्त नूं
वक्त याद आंदा ए
कदे शाम हो गई होंदी है
कदे रात उतर आई होंदी है
ते कदे दिन चढ़या आया होंदा है।

उसने जिस्‍म छडया है साथ नहीं...

- इमरोज़

18 comments:

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर! पंजाबी के बेहद मीठे शब्द!
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

बहुत आभार इस प्रस्तुति का.

anurag vats said...

imroz jaise shakhs km hote hain...amrita ne apni aakhri kavitaon men ek jagah likha hai...yh jism jab mitta hai/ tab sab-kuch khatm ho jata hai/ pr chetna ke dhage kaynati hote hain/ main un kanon ko chunungi/ dhagon ko lapetungi/ aur/ tumhe main fir milungi...

बालकिशन said...

खुबसूरत अंदाजे बयान.
"हम सब ढूंढती हैं पर वो कहीं नहीं दिखता। शायद इसलिए कि ऐसे इमरोज़ को पाने से पहले अमृता हो जाना पड़ता है। "
बहुत सही

मीत said...

ओ अपनी अनलिखी कविता सुनांदी है
ते मैं वी अपणी अनलिखी नज़म सुनांदा वा
कोल खड़ा वक्त
एह अनलिखी शायरी सुनदा-सुनदा
अपणा रोज दा
नेम भुल जांदा ए।
जदों वक्त नूं
वक्त याद आंदा ए
कदे शाम हो गई होंदी है
कदे रात उतर आई होंदी है
ते कदे दिन चढ़या आया होंदा है।

उसने जिस्‍म छडया है साथ नहीं...

कहना क्या है ???? बस पढ़वाती रहें यूं ही .... It all sounds too good to be real, Ma'am.

Parul said...

amrita aur imroz ka rishta jab tak padhtey raho gungunahat deta hai...per zyaati taur par agar kabhi iski partey kholney baith jao...to andar bahar sab ulajh jata hai..kitney sawaal khadey ho jaatey hain...aap to aur padhvaiye..bahut acchha lag raha hai yun...

अनुराग said...

जो बात मै कहना चाह रहा था वो आपने ख़ुद ही कह दी के इमरोज पाने के लिए अमृता होना पड़ता है ...ओर ये होना ही सबसे मुश्किल काम है....इमरोज भी अपनी सदी के एक ऐसे पुरूष है जो स्त्री को अपने से बड़ा देखकर भी छोटा नही होते .

नीरज गोस्वामी said...

कोल खड़ा वक्त
एह अनलिखी शायरी सुनदा-सुनदा
अपणा रोज दा
नेम भुल जांदा ए।
वाह...जिस शायरी को सुनकर वक्त ठहर जाए उसके बारे में किन शब्दों में कुछ कहा जाए...इमरोज़ शायद हम सब में होता है लेकिन हम डर कर उसे बाहर नहीं आने देते...इमरोज को उजाले में लाने के लिए कलेजा चाहिए.
नीरज

शोभा said...

ओ अपनी अनलिखी कविता सुनांदी है
ते मैं वी अपणी अनलिखी नज़म सुनांदा वा
कोल खड़ा वक्त
एह अनलिखी शायरी सुनदा-सुनदा
अपणा रोज दा
नेम भुल जांदा ए।
जदों वक्त नूं
वक्त याद आंदा ए
कदे शाम हो गई होंदी है
कदे रात उतर आई होंदी है
ते कदे दिन चढ़या आया होंदा है।

उसने जिस्‍म छडया है साथ नहीं...
बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें।

सुजाता said...

बहुत आभार इस पोस्ट के लिए । पर अमृता बनकर भी हमेशा इमरोज़ नही मिलता ...

ravindra vyas said...

एक दूसरे ब्लॉग से आपके इस नए ब्लॉग का पता चला। सारी पोस्ट पढ़ गया और स्मृतियों की धुंध से गुजरते हुए इमरोज के साथ बिताए कुछ लम्हे याद करता रहा। मैंने बहुत पहले अपने एक पुराने ब्लॉग पर इमरोज से बातचीत पोस्ट की थी। मैं पिछली बारिश के इसी महिने में उनसे मिला था। आपके ब्लॉग पर जो पढ़ा, उससे एक दूसरी बारिश शुरू हो चुकी है और मैं तरबतर हूं। जल्द ही अपने ब्लॉग पर इमरोज को लेकर एक पोस्ट दूंगा।
बाकी किस्तें कब पढ़वा रही हैं?

mahendra mishra said...

बहुत सुन्दर बहुत सही......

Dr. Chandra Kumar Jain said...

शायदा जी,
आज पिछली तीन पोस्ट पढ़ ली मैंने एक साथ.
यहाँ सवाल अमृता-इमरोज़ प्रसंग से कहीं ज्यादा
प्रेम व समर्पण की बेलाग स्थिति का है.
आपने जो सवालात सामने रखे हैं वो एक आईने से
रत्ती भर भी कम नहीं हैं....लेकिन ये सिर्फ़
सवाल नहीं, ज़वाब भी तो हैं कि पीठ न दिखाने
वाले एहसास के बगैर प्रेम सीना चीरकर भी
दिखा दे तो बेमानी है....!
आपकी पेशकश ब्लॉग-जगत् ही नहीं
शब्द और भाव जगत् की भी
बड़ी उपलब्धि है......सचमुच यह दुर्लभ है.
===============================
मेरी शुभकामनाएँ
डा.चन्द्रकुमार जैन

Ajay said...

इन तीन वाक्यों में तुमने ज़िंदगी का फलसफ़ा उतारकर रख दिया है।
".......इमरोज़ को पाने से पहले अमृता हो जाना पड़ता है। दुनियादारी की चादर को इस तरह तह करके रखकर भूल जाना होता है कि उसकी याद तक न आए। उस चादर को बिना बरते जिंदगी गुज़ार सकने की हिम्मत पैदा कर लेनी होती है......."

समर्पण कोई जज़्बा नहीं है, इक जंग है.... वो जंग जो ख़ुद से ही लड़नी होती है, किसी की परवाह न करने की ज़िद ठान लेने के लिए।

बधाई... बेहतरीन लिखने के लिए।

सुभाष नीरव said...

बहुत खूब शायदा जी, आपने तो "उनींदरा" में भी कमाल कर दिखाया। "अपने अपने इमरोज़" में आपने बहुत सही लिखा है- ऐसे इमरोज़ को पाने के लिए पहले अमृता हो जाना पड़ता है। इमरोज़ की कविता को बिना हिन्दी में अनुवाद किए देना भी अच्छा लगा। अभी कुछ दिन पहले मैंने पढ़ीं इमरोज़ की चंद कविताएं पंजाबी त्रैमासिक "प्रवचन" में और हैरान रह गया। रंगों और कूची की दुनिया में जाने-माने शख़्स इमरोज़ का नाम तो बहुत सुना था, पर वह इतनी सुन्दर शायरी भी करते हैं, उन कविताओं को पढ़कर पहलीबार पता चला। मैंने तुरन्त उन्हें अपने ब्लाग "सेतु साहित्य" के लिए हिन्दी में अनुवाद किया और फोन पर उनसे उनकी अनुमति और फोटो मांगा। इमरोज़ जी ने बड़ी सहजता से अपनी प्रवानगी दी और चित्र जल्दी भेजने का वायदा किया है। जल्द ही उनकी कविताएं "सेतु साहित्य" पर हिन्दी पाठकों के सम्मुख होंगी।

Vijendra S Vij said...

बेहद खूबसूरत , बेहद उम्दा... जाने कैसे छूट गया...देर से ही सही...
आमीन॥

harkirathaqeer said...

sach me imroj ji jaisa insan n kabhi hua n ho sakta hai. prem ka adbhut udaharan!aur ab unki ye rachnaye padh mai to hairan ho gayi. dilee iccha thi kabhi un dono pr likhi apni kavita unhen padhva sakun sayad ab puri ho jaye. maine unhen apni pustak "ek dard" bheji hai ph pr bhi bat hui unhone kaha maine aapko khat likha hai phele aap khat padh len phir vistar se bat karege. mujhe unke khat ka intjar hai. Harkirat Kalsi`Haqeer`.

Vijay Kumar Sappatti said...

Dear madam,

I came first time on your blog . I don't know as how my one hour went ...reading such classic .

mera naman hai aapko ..

bahut badhai


kabhi mere blog par aakar meri nazmen bhi padhiyenga .

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/