Saturday, February 21, 2009

वो क्‍यों नहीं किसी के साथ भाग जाती....

मुझे सचमुच इस चीज़ से फ़र्क नहीं पड़ता कि उसे कैसा लगता है मेरे बिना...खा़सतौर पर मैं उन दिनों से सीधे-सीधे आंख बचाकर निकल जाता हूं जिन पर हमने अपने नाम लिखकर उड़ा दिए थे। मैं वाकई नहीं जानना चाहता कि उड़ते रहने वाले वे दिन जब उसकी आंखों में उतर कर धुंआं घोलते हैं कि कितनी कड़वाहट होती है, दरअसल मैं उसकी तरफ़ देखता ही नहीं। क्‍यों देखूं जबकि मुझे पता है कि न देखने की क़सम मैंने ही खाई है, और क्‍यों फिर जाऊं अपनी क़सम से जबकि मुझे पता है कि इससे मेरी जि़दगी में कितना आराम आया है। कवि होने का यह अर्थ तो हरगिज़ नहीं निकाला जाना चाहिए कि सारी चिरकुटई की जि़म्मेदारी मैंने ही ली है, अरे जिसे जो महसूस करना है करे, मैं तो अपनी जिंदगी को ठीक करना चाहता हूं, कर भी रहा हूं।

ये वेलेंटाइन-डे था और मैं उस सारी मनहूसियत का सामना नहीं करना चाहता था जो उसके चेहरे से बरसती रहती है, तो भी मेरा रास्‍ता काटकर ही गई न। बाद में हरे कांच से बाहर झांकती रही शायद ये सोचकर कि मैं उसे देख रहा हूं। मेरा ईश्‍वर जानता है कि मैंने एक बार नज़र भर कर उसकी तरफ़ नहीं देखा लेकिन वो शायद मुझे चिढ़ा देना चाहती थी, तभी तो वही झुमके पहनकर आई थी जो मैंने अपनी मूर्खता की पराकाष्‍ठा को छूते हुए उसे लाकर दिए थे। अब कितनी कोफ़त होती है ये सोचकर कि मैंने झुमके ख़रीदने के लिए अपनी बीवी का क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल किया, जबकि घर में लंबे समय से इस बात को लेकर तकरार थी कि मैं घरवाली के लिए कोई तोहफ़ा लाता ही नहीं। कवि हूं तो क्‍या इस शर्मिंदगी को महसूस करना भी बंद कर दूं कि जीवन का एक पहला वेलेंटाइन वही था जब मैंने अपनी पत्‍नी के अलावा किसी और को गुलाब का फूल भी लाकर दिया था।

कितने बरस गुज़र गए लेकिन हर साल इस दिन अब भी घर में उस ग़लती के लिए ताना सुनना पड़ता है और काम पर आओ तो ये बेवकूफ़ औरत हमेशा अपना बेसुरा प्रेमगीत अलापती घूमती है। मैं सचमुच इस सब से ऊब चुका हूं, ये औरत कहीं चली क्‍यों नहीं जाती....क्‍यों नहीं किसी और के प्रेम में पड़ जाती, क्‍यों नहीं किसी के साथ भाग जाती, क्‍यों मेरे प्रेम को माथे पर इश्‍तेहार की तरह चिपकाए घूमती है, बिना ये सोचे कि मुझे कितनी परेशानी होती है इस ख़याल से भी कि कभी मैंने उसी माथे को चूमकर कुछ कहा था। मैं सचमुच चाहता हूं कि वो बेवफ़ा हो जाए, मैं उसे किसी के साथ इस तरह देख लूं कि उसे सरे राह दो झापड़ रसीद कर सकूं.... रंगे हाथों इस तरह धर दबोचूं कि वो मिमियाकर, दुम दबाकर मेरे सामने से हमेशा के लिए दफ़ा हो जाए। कुछ ऐसा देख लेना चाहता हूं कि दोस्‍तों के बीच खड़े होकर उसे चार गालियां दे सकूं....मैं सचमुच चाहता हूं कि वो मुझे धोखा दे दे....सचमुच का धोखा।




-एक  डायरी se..

10 comments:

Udan Tashtari said...

एक भागे हुए कवि की डायरी पढ़ना वाकई बड़ा दिलचस्प और भावपूर्ण रहा. बहुत खूबसूरती से भाव उकेरे हैं.

विनय said...

प्रभावकारी शब्द प्रयोग


----
गुलाबी कोंपलें
सरकारी नौकरियाँ

MANVINDER BHIMBER said...

भागे हुए कवि की मनोदशा का सच्चा चित्रण कर दिया है shayda आपने....बहुत khoob

Ashok Pande said...

अवाक हूं!

अनिल कान्त : said...

बहुत ही दिलचस्प रहा ...

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Mired Mirage said...

मैं भी अवाक !
घुघूती बासूती

Ajay said...

किसी पुरुष ब्लॉगर की पोस्ट होती यह तो कथित नारीवादी यह कहकर उठ खड़े होते कि यह तो पुरुष प्रवृत्ति है.. प्यार करता है फिर छोड़ देता है।

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

विस्मयता वाली बाते । झन्झकोर ने वाली बात। चिन्तनिय बात।

डॉ .अनुराग said...

अच्छी लगी डायरी इस बार बिना भारी भरकम शब्द ओर विम्ब का प्रयोग किए हुए .कवि ने बहुत सारी बात कह दी ...जब लेखक अनोपचारिक हो जाता है तो बहुत भला सा लगता है...

batkahi said...

sachmuch ke muh khula ka khula rah jaye..aisi maarak diary...aap ki anubhutiyon aur unki likhyi ko salaam