आज रात मुझे कई काम करने थे। सोचा था एक अधूरी किताब पूरी कर सकूंगी। संडे को बुक फेयर जा सकने और उससे पहले सिर में तेल लगवाकर सिर धो सकने का वक़्त निकालने के लिए जैसे-तैसे सुबह होने से पहले सो सकूंगी....। लेकिन हमेशा तो यही हुआ है कि जो सोचा वो नहीं हो सका। सोना तो बहुत दूर की बात है मैं लेट भी नहीं पा रही हूं। बार-बार बालकनी में जाकर उसे देख रही हूं और दुआ कर रही हूं कि किसी तरह इसका दुख दूर हो जाए। क्या दुख है इसका वो तक पता नहीं। ये एक गाय है दो घंटे से गली में रंभाती घूम रही है। इसकी आवाज़ में जो तकलीफ़ है वो सोने नहीं देगी, पक्का है।
पता नहीं ये किसी से बिछुड़ गई है, रास्ता भूली है या इसका बच्चा इससे दूर हो गया है....? दिमाग़ में कई तरह की बातें हैं, काश इसके लिए कुछ किया जा सकता। जब भी वो बालकनी के सामने सड़क से आवाज़ सी लगाती गुज़रती है उसे आवाज़ लगाती हूं, लेकिन वो सुनती नहीं....मेरी आवाज़ शायद उस तक जा भी नहीं रही है। क्या उसकी आवाज़ वहां तक जा रही है जहां वो पहुंचाना चाहती हो.....ईश्वर तक तो जा ही रही होगी न....क्या सुन रहा है ईश्वर...? जब वो कुछ दूर तक चली जाती है और आवाज़ आना बंद हो जाए तो लगता है शायद इस बार लौटेगी नहीं लेकिन थोड़ी देर में ही फिर लौटती है। हर बार उसका लौटना दुख को और गहरा कर रहा है।
बचपन में सुनते थे कि कुत्ता, बिल्ली, तोता और गाय अपने घर और मालिक को बहुत अच्छी तरह पहचानते हैं। कभी खो जाएं या बिछड़ जाएं तो ढूंढते हुए वापस आ जाते हैं। ईश्वर इस गाय का दुख दूर कर दे, इसका जो भी खोया हो उसे इससे मिला दे, जहां से ये बिछड़ गई हो, वहां इसे पहुंचा दे, मैं उसके लिए रब से दुआ मांग रही हूं- मैंने अगर कोई अच्छा काम कभी किया हो तो प्लीज़ इस गाय का दुख दूर कर दे।
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Sunday, October 25, 2009
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