Sunday, October 25, 2009

रब से एक दुआ

आज रात मुझे कई काम करने थे। सोचा था एक अधूरी किताब पूरी कर सकूंगी। संडे को बुक फेयर जा सकने और उससे पहले सिर में तेल लगवाकर सिर धो सकने का वक्‍़त निकालने के लिए जैसे-तैसे सुबह होने से पहले सो सकूंगी....। लेकिन हमेशा तो यही हुआ है कि जो सोचा वो नहीं हो सका। सोना तो बहुत दूर की बात है मैं लेट भी नहीं पा रही हूं।  बार-बार बालकनी में जाकर उसे देख रही हूं और दुआ कर रही हूं कि किसी तरह इसका दुख दूर हो जाए। क्‍या दुख है इसका वो तक पता नहीं। ये एक गाय है दो घंटे से गली में रंभाती घूम रही है। इसकी आवाज़ में जो तकलीफ़ है वो सोने नहीं देगी, पक्‍का है।

पता नहीं ये किसी से बिछुड़ गई है, रास्‍ता भूली है या इसका बच्‍चा इससे दूर हो गया है....? दिमाग़ में कई तरह की बातें हैं, काश इसके लिए कुछ किया जा सकता। जब भी वो बालकनी के सामने सड़क से आवाज़ सी लगाती गुज़रती है उसे आवाज़ लगाती हूं,  लेकिन वो सुनती नहीं....मेरी आवाज़ शायद उस तक जा भी नहीं रही है। क्‍या उसकी आवाज़ वहां तक जा रही है जहां वो पहुंचाना चाहती हो.....ईश्‍वर तक तो जा ही रही होगी न....क्‍या सुन रहा है ईश्‍वर...? जब वो कुछ दूर तक चली जाती है और आवाज़ आना बंद हो जाए तो लगता है शायद इस बार लौटेगी नहीं लेकिन थोड़ी देर में ही फिर लौटती है। हर बार उसका लौटना दुख को और गहरा कर रहा है।

बचपन में सुनते थे कि कुत्‍ता, बिल्‍ली, तोता और गाय अपने घर और मालिक को बहुत अच्‍छी तरह पहचानते हैं। कभी खो जाएं या बिछड़ जाएं तो ढूंढते हुए वापस आ जाते हैं। ईश्‍वर इस गाय का दुख दूर कर दे, इसका जो भी खोया हो उसे इससे मिला दे, जहां से ये बिछड़ गई हो, वहां इसे पहुंचा दे, मैं उसके लिए रब से दुआ मांग रही हूं- मैंने अगर कोई अच्‍छा काम कभी किया हो तो प्‍लीज़   इस गाय का दुख दूर कर दे।

10 comments:

Dipak 'Mashal' said...

Ek bhav pravan rachna... takleef jayaz hai padhne ke baad..

वाणी गीत said...

इश्वर आपकी दुआ कुबूल करे ...हमारी भी ...!!

M VERMA said...

आपकी संवेदना के लिये साधुवाद! काश उस गाय का दु:ख दूर हो.

शरद कोकास said...

शायदा जी आदाब , पता नहीं याद नहीं आ रहा इससे पहले आपके ब्लॉग पर आया या नहीं !! शायद नहीं !! शायद हाँ!! कभी कभी कुछ पढ़ते हुए नहीं लगता जैसे इसे पढ़ा हो जबकि हमने उसे नहीं पढ़ा होता । यह अपने लिखे हुए के बारे में भी हो सकता है । कई बार अपनी ही नज़्म देख कर जैसे मुझे लगता है अरे यह किसने लिखा है .. मैने तो नहीं लिखा .. इतना अच्छा मैं कैसे लिख सकता हूँ !! आज आपका लिखा हुआ यह देख कर कुछ ऐसा ही लगा । बरसों से मैं डायरी लिखता हूँ .. बहुत से कवि लिखते हैं .. लेकिन यह आपका लिखा मुझे अपने लिखने के बहुत करीब लगा । अभी दो रोज़ पहले ही एक पोस्ट मैने लिखी है पाबला जी की पेट डॉगी डेज़ी की मौत पर .. ।आपकी सम्वेदना को मै सलाम करता हूँ यह सम्वेदना पूरी दुनिया मे फैल जाये ..आमीन !! बस इससे आगे क्या कहूँ "उनीन्दरा " ..अच्छा लगा यह नाम .. इसलिये भी कि अभी सुबह का साढ़े पाँच बजा है और मुझे अभी अभी खयाल आया कि अरे! मै तो आज सोना ही भूल गया । -शरद कोकास ,दुर्ग छ.ग.

धर्मेन्‍द्र चौहान said...

आप तो दार्शनिक हो गई हैं!

ललित शर्मा said...

मैंने अगर कोई अच्‍छा काम कभी किया हो तो प्‍लीज़ इस गाय का दुख दूर कर दे।

अवश्य ही रब ने आपकी दुआ सुन ली होगी,
वह किसी को दुखी देखना नही चाहता,

kase kahun?by kavita. said...

ek smvedansheel rachana.sadhuvad.
kavita

विनोद कुमार पांडेय said...

कितनी अच्छी बात सोची आपने..निश्चित रूप से भगवान सुनेंगे आपकी...

शायदा said...

आप सबका शुक्रिया कि इस फिक्र में शामिल होकर मेरी बात पर ग़ौर किया। गाय की ख़बर भी सुनिए सुबह 5 बजे के बाद से उसकी कोई आवाज़ नहीं आई। शायद उसे राह मिल गई हो।

सागर said...

ट्रु ब्लॉग्गिंग...