Wednesday, November 11, 2009

कैसे उसका सामना करूं


आज  सुबह मैंने एक पाप किया। बच्‍चे पर अपना गुस्‍सा निकाला,  अपनी खीज और फ्रस्‍ट्रेशन उस पर उतार दी। वो रोकर स्‍कूल चला गया लेकिन मैं इतने गहरे अपराधबोध में धंसी हूं कि समझ नहीं आ रहा कैसे उसका  सामना कंरूं ..। उसकी शरारतों और गलतियों पर अब तक मैंने हमेशा हल्‍का-फुल्‍का थप्‍पड़ मारा है या फिर डांट दिया है। आज मैंने उसे गुस्‍से में मारा। मैंने जब उसे पहला थप्‍पड़ मारा तो शायद उसे मुझसे ये उम्‍मीद नहीं रही होगी...उसने हैरान होकर मेरी तरफ देखा और तब तक मैंने उसे दूसरा चांटा मार दिया था। ये सब बहुत बुरा था। क्‍या बड़े होते जाना मानवीयता को खोते जाने जैसा है, क्‍या हम उतने ही निर्दोष और मासूम नहीं रह सकते सारी उम्र, जितना बचपन में थे।
दोपहर में जब वो स्‍कूल से वापस आया तो सारी बात भूल चुका था,लेकिन मुझे तो याद था अपना अपराध। मैं उसका सामना नहीं कर सकी। घर से निकलते हुए आज मैंने उससे बात नहीं की, चुपचाप निकल आई। मैं कैसे इस ग्‍लानि और अपराधबोध से बाहर आ सकूंगी...क्‍या सबको ऐसा ही लगता है बच्‍चों को मारने के बाद...क्‍या सब ठीक हो जाएगा जल्‍दी ही...।


-ये बच्‍चा मेरे भाई का बेटा है, इसका नाम शान है जिसे हम प्‍यार से पिंगू कहते हैं। मैं इसके साथ रहती हूं।

15 comments:

Udan Tashtari said...

मुझे लग रहा है आप ज्यादा संवेदनशील हो रही हैं और खामखाँ अपराध बोध पाल बैठी हैं. बच्चे भी जानते हैं आपकी ममता को.

इत्मिनान रखिये, बच्चा तो भूल भी गया होगा इस बात को. जाईये, उसे दुलारिये, मुस्कराईये.

अर्कजेश said...

यह बडों के अहंकार का परिणाम जिसकी वजह से वह बच्‍चों के प्रति ऐसा व्‍यवहार करते हैं । पीछा
छुडाना भी एक वजह है ।
बच्‍चों के प्रति ऐसा व्‍यवहार करने वालों से मुझे जरा भी सहानुभूति नहीं है ) चाहे वह बच्‍चे की मॉं ही क्‍यों न हो ।

Krishna Kumar Mishra said...

गुस्सा आये तो महादेव को जरूर याद कर ले ! वो दुम दबा के भाग जायेगा !

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आपकी आत्मस्वीकारोक्ति भली लगी. भविष्य में कभी भी यह न दोहराने का प्रण व पालन इससे भी बेहतर है ...

शारदा अरोरा said...

ग्लानि महसूस करना ख़ुद ही प्रायश्चित है , बस इस चुभन को अब सीख में बदल डालो | बड़े प्यार से उसे या तो सॉरी कह कर मन का भेद मिटा डालो |ऐसा होता है कि कभी कभी हम दूसरे तनाव की वजह से भी बच्चे पर अपना गुस्सा उतारते हैं , जो कि बहुत ही ग़लत है , कोशिश ये करनी चाहिए कि प्रेम ही हमारा हथियार व् ताकत बने |

डॉ .अनुराग said...

शायदा जी हम बड़े होते ही ऐसे है .कुछ साल पहले ठीक मैंने भी वैसा महसूस किया था अपने बेटे के लिए ....".आई एम् सोरी बेटा " .वो दिन आज भी मेरे गिल्ट में से एक है

सागर said...

इश्वर आपसे प्यार करता है... इसलिए छोटी सी घटना इतने गहरे पैठ गयी... ताकि दोबारा ऐसी गलती न हो... यह क्या कम है इस बहाने आपके मन में 'पिंगू' ही चलता रहा...

कंचन सिंह चौहान said...

इस पोसट को पढ़ते ही मुझे वही पोस्ट याद आई जिसका अनुराग जी ने ज़िक्र किया है।

देखिये ना आप लोग तो कंफेस भी कर लेते हैं हम जैसे लोग तो ये भी नही कर पाते हैं। बस दिन भर मूड खराब किये रहते हैं।

हो जाता है ऐसा...! शअम को जब गले लगा के एक चॉकलेट दे कर सॉरी बोलेंगी तो थोड़ी देर ठमकने के बाद कूल हो जायेगा मैटर....!!!! :)

शायदा said...

आप सभी का शुक्रिया यहां आने के लिए। वैसे सच में वो रात तक सारी बात भूल चुका था, उसे चेहरे या आंखों में कोई ऐसा निशान नहीं जो किसी दुख का‍ निशान दिखाता हो। कितना अच्‍छा होता हम भी अगर ऐसे ही सारे निशान मिटा पाते और हंस पड़ते।

Beji said...

......it is very easy to be hard on soft targets....

नीरज गोस्वामी said...

कई बार भावावेश में ऐसा हो जाता है अपनी खीज हम बच्चों पर उतार देते हैं...लेकिन ये क्षणिक आवेश ही है...बात गलत है लेकिन उसे लेकर अधिक ना सोचें...बच्चे को गोद में बिठाएं और उसे वो दिलाएं जो उसे सबसे अधिक पसंद है...गिल्ट में मत जियें क्यूँ की ये उस मार से अधिक पीडा दायक है...आपके लिए भी और बच्चे के लिए भी...
नीरज

ali said...

बर्दाश्त नहीं तो बड़प्पन कैसा , जो किया गलत किया !
आपका अपराध बोध सही है !

शरद कोकास said...

अब आइन्दा ऐसा न हो इसका ध्यान रखे बच्चे बार बार नही भूलते ..आपका एक तमाचा उसे जीवन भर के लिये दब्बू बना सकता है ।

Pradeep Jilwane said...

एक दोहा याद आ रहा है-
गुरू कुम्हार श्शि कुम्भ है
गढ़-गढ़ काढ़े खोट।
भीतर हाथ सँवार दे,
भीतर बाहै चोट।।

इसीलिए इस विषम में अधिक संवेदनशील न होते हुए घटना को स्‍वप्‍न समझकर भूल जाइये. और हो सके तो भविष्‍य में हाथ न उठाते हुए भरसक समझाने का प्रयास करें.

Neha said...

ye to sahi hai ki hum bade apne gusse ko chhoton par nikalte hain...aur baad me hum apradhbhaav se grasit hote hain...lekin sabse pahle wahi baccha humse baaten karta hai jaise kuchh hua hi na ho....isiliye to bachpan ko sabse acchha vakt kaha jata hai...shayad