कुछ तो ऐसा है जो मुझे समझ नहीं आता, जिसे डीकोड करने की कोशिश में अक्सर मैं उस जगह जाकर खड़ा होता हूं , जहां से पहली बार उसे आते हुए देखा था। अब वहां खड़ा होने पर मैं उसे नज़र नहीं आता... न ही वहां खड़े हुए उसका आना मैं देख पाता हूं। इस पहेली का सिरा कहां है...? कल देर तक इसे सुलझाने की कोशिश करते हुए एक कड़वाहट और पल्ले पड़ ही गई। गाड़ी के धूल पर भरे शीशे पर लिखा एक शब्द अमली...मुझे काटने क्यों दौड़ा? इस नाम को तो कभी मैने खु़द अपने लिए तय किया था। पन्ने खोलने पड़ते हैं उन दिनों की तहों में जाने के लिए जब हर वक़्त एक नशे मंे रहने का सा अहसास होता था। मै उससे बाहर कब आना चाहता था? एक दिन मैंने गहरे डूबकर उससे कहा-तुम औरत नहीं अफीम हो...और साथ ही उसके मोबाइल के कॉन्टेक्ट ऑप्शन में जाकर अपने नाम के बदले अमली सेव कर दिया था। लंबे समय तक उसके फोन पर वहां अमली शब्द दिखता रहा...पता नहीं अब भी उसने बदला है या नहीं। लेकिन अपने दिमाग से मैं उस नशे और अमल...सब को डिलीट कर चुका हूं। एक उंगली से उकेरे गए इन नाम पर कभी मैं किस तरह न्यौछावर होने को उतावला था...आज उस उंगली को चूम लेने का खयाल एक अजीब सी koft से भर देता है।
कैसे बदल जाते हैं दिन....और क्यों बदल जाते हैं? मैं खु़द से हज़ार सवाल पूछते हुए हैरान होता हूं कि क्या ये मैं ही हूं जो आज यह सब कर रहा हूं जबकि कभी मैंने ही इस अफीम जैसी औरत को घूंट-घूंट चख लेने तक का सब्र नहीं किया था। मुझे बहुत जल्दी थी। उस नशे की बात बिल्कुल अकेलेपन में सोचते हुए भी शर्मसारी सिर चढ़ी जाती है। क्या जवाब दूंगा मै¡ अपनी उम्र के उन बरसों को जो मैंने उस नशे मंे बिता दिए..जिसका आज कोई मतलब नहीं। कल जब मैं लिखूंगा इन सबके बारे में तो शब्द मेरे पास आने से इनकार तो नहीं कर देंगे? अपने लेखन मंे उसे खारिज करने का काम मैंने काफी पहले कर दिया था। यहां तक कि जिन जगहों पर अफीम में डूबे उन दिनों का जि़क्र था उन्हें एक फलसफे का जामा पहनाकर दोबारा इस तरह दुरुस्त कर दिया है कि कोई पारखी वहां तक जाकर उसके असली रंग को देख नहीं सकेगा। लेकिन ये सब करते रहना क्या हमेशा आसान बना रह सकेगा मेरे लिए?
अपनी होशियारी पर कायल होना मुझे कभी भूलता नहीं। लेकिन उसे अपने सामने पाकर मेरे अंदर एक कॉप्लेक्स तो ज़रूर जागता है कि मेरी कोई होशियारी उससे छिप क्यों नहीं पाती? अपनी बढ़ाई हुई दाढ़ी के कारण भाव छिपा जाने की कला में मुझे महारत है, लेकिन वो न देखते हुए भी सब कैसे समझ लेती है। कई बार ऐसा लगता है जैसे मैं उसके सामने पारदर्शी हो गया हूं। मेरे अंदर की हर हलचल उसे दिख रही है। यहां तक कि मेरी सोच का सारा सर्किट उसकी नज़र मंे है और आंतों से लेकर ब्लड कॉपोनेंट तक की सारी तफसील उसके पास दर्ज है। इतना खुलापन...मैं इस सब से उकता गया हूं, इस हद तक कि अब लगता है बस...और नहीं। मैं छिपकर रहना चाहता हूं, अपने आप पर एक ऐसा parda चढ़ाकर जिसके परे सिर्फ वही दिखे जो मैं दिखाना चाहता हूं। काश कि मैं उसे कह सकूं वो उस हवा मंे सांस न ले जहां मैं ले रहा हूं...दूर चली जाए अपनी अफीम की महक वाली सारी सांसें लेकर ताकि मैं उन दिनों की सारी स्मृतियांे को जड़ से खुरच कर साफ कर सकूं।
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-इस पोस्ट का शीर्षक ब्लॉगर महेन मेहता की एक कविता की एक लाइन ही है। जब मैंने यह कविता पढ़ी तो ये लाइन अटक गई थी कहीं। खै़र यहां बिना पूछे लगा ली गई है, आभार सहित।
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ek diary ka panna
Sunday, May 17, 2009
कैसी अफीम घुली थी उन दिनों मंे
कुछ तो ऐसा है जो मुझे समझ नहीं आता, जिसे डीकोड करने की कोशिश में अक्सर मैं उस जगह जाकर खड़ा होता हूं , जहां से पहली बार उसे आते हुए देखा था। अब वहां खड़ा होने पर मैं उसे नज़र नहीं आता... न ही वहां खड़े हुए उसका आना मैं देख पाता हूं। इस पहेली का सिरा कहां है...? कल देर तक इसे सुलझाने की कोशिश करते हुए aur एक कड़वाहट और पल्ले पड़ ही गई। गाड़ी के धूल पर भरे शीशे पर लिखा एक शब्द अमली...मुझे काटने क्यों दौड़ा? इस नाम को तो कभी मैने खु़द अपने लिए तय किया था। पन्ने खोलने पड़ते हैं उन दिनों की तहों में जाने के लिए जब हर वक़्त एक नशे मंे रहने का सा अहसास होता था। मै उससे बाहर कब आना चाहता था? एक दिन मैंने गहरे डूबकर उससे कहा-तुम औरत नहीं अफीम हो...और साथ ही उसके मोबाइल के कॉन्टेक्ट ऑप्शन में जाकर अपने नाम के बदले अमली सेव कर दिया था। लंबे समय तक उसके फोन पर वहां अमली शब्द दिखता रहा...पता नहीं अब भी उसने बदला है या नहीं। लेकिन अपने दिमाग से मैं उस नशे और अमल...सब को डिलीट कर चुका हूं। एक उंगली से उकेरे गए इन नाम पर कभी मैं किस तरह न्यौछावर होने को उतावला था...आज उस उंगली को चूम लेने का खयाल एक अजीब सी koft से भर देता है।
कैसे बदल जाते हैं दिन....और क्यों बदल जाते हैं? मैं खु़द से हज़ार सवाल पूछते हुए हैरान होता हूं कि क्या ये मैं ही हूं जो आज यह सब कर रहा हूं जबकि कभी मैंने ही इस अफीम जैसी औरत को घूंट-घूंट चख लेने तक का सब्र नहीं किया था। मुझे बहुत जल्दी थी। उस नशे की बात बिल्कुल अकेलेपन में सोचते हुए भी शर्मसारी सिर चढ़ी जाती है। क्या जवाब दूंगा मै¡ अपनी उम्र के उन बरसों को जो मैंने उस नशे मंे बिता दिए..जिसका आज कोई मतलब नहीं। कल जब मैं लिखूंगा इन सबके बारे में तो शब्द मेरे पास आने से इनकार तो नहीं कर देंगे? अपने लेखन मंे उसे खारिज करने का काम मैंने काफी पहले कर दिया था। यहां तक कि जिन जगहों पर अफीम में डूबे उन दिनों का जि़क्र था उन्हें एक फलसफे का जामा पहनाकर दोबारा इस तरह दुरुस्त कर दिया है कि कोई पारखी वहां तक जाकर उसके असली रंग को देख नहीं सकेगा। लेकिन ये सब करते रहना क्या हमेशा आसान बना रह सकेगा मेरे लिए?
अपनी होशियारी पर कायल होना मुझे कभी भूलता नहीं। लेकिन उसे अपने सामने पाकर मेरे अंदर एक कॉप्लेक्स तो ज़रूर जागता है कि मेरी कोई होशियारी उससे छिप क्यों नहीं पाती? अपनी बढ़ाई हुई दाढ़ी के कारण भाव छिपा जाने की कला में मुझे महारत है, लेकिन वो न देखते हुए भी सब कैसे समझ लेती है। कई बार ऐसा लगता है जैसे मैं उसके सामने पारदर्शी हो गया हूं। मेरे अंदर की हर हलचल उसे दिख रही है। यहां तक कि मेरी सोच का सारा सर्किट उसकी नज़र मंे है और आंतों से लेकर ब्लड कॉपोनेंट तक की सारी तफसील उसके पास दर्ज है। इतना खुलापन...मैं इस सब से उकता गया हूं, इस हद तक कि अब लगता है बस...और नहीं। मैं छिपकर रहना चाहता हूं, अपने आप पर एक ऐसा parda चढ़ाकर जिसके परे सिर्फ वही दिखे जो मैं दिखाना चाहता हूं। काश कि मैं उसे कह सकूं वो उस हवा मंे सांस न ले जहां मैं ले रहा हूं...दूर चली जाए अपनी अफीम की महक वाली सारी सांसें लेकर ताकि मैं उन दिनों की सारी स्मृतियांे को जड़ से खुरच कर साफ कर सकूं।
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-इस पोस्ट का शीर्षक ब्लॉगर महेन मेहता की एक कविता की एक लाइन ही है। जब मैंने यह कविता पढ़ी तो ये लाइन अटक गई थी कहीं। खै़र यहां बिना पूछे लगा ली गई है, आभार सहित।
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ek diary ka panna
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ek diary ka panna
Wednesday, May 13, 2009
अब कभी ऐसी खबर न मिले
मिल गए मुकुल शिवपुत्र। होशंगाबाद रेलवे स्टेशन से इन्हें लगभग उसी तरह नशे की हालत में पहचाना गया जैसा पिछले दिनों भोपाल में देखा गया था। अखबार में खबर छपने के बाद वे वहां से चले गए थे। उनके दोस्त, मीडिया और सरकारी अधिकारी सभी उन्हें ढूंढने में लगे थे। ब्लॉग्स पर भी मुकुल की इस हालत के बाद लोगों की बेचैनी जाहिर हुई। संतोष की बात है कि वे मिल गए और उनके दोस्त अब उन्हें अपने साथ भोपाल ले आए हैं। मुकुल को वास्तव में बहुत सारे अपनेपन, भावनात्मक सहारे और मेडिकल हेल्प की ज़रूरत है। कुमार गंधर्व के बेटे और खु़द बेहद काबिल गायक के बारे में अब कभी ऐसी खबर न मिले और वे जल्दी ही इस स्थिति से उबरकर संगीत यात्रा को आगे बढ़ाएं ऐसी दुआ है।
जानकारी दैनिक भास्कर से साभार।
जानकारी दैनिक भास्कर से साभार।
Monday, April 27, 2009
मैं न सोने से डरती हूं....
मैं सोचती थी कि हम एक-दूसरे की आत्मा तक को देख सकते हैं, कि हम जुड़े हुए हैं, एक-दूसरे से....सियामी जुड़वाओं की तरह संबद़ध हैं। उसने ख़ुद को मुझसे दूर कर लिया था, मुझसे झूठ बोला था, और मैं यहां बैठी थी, कैफे़ की बेंच पर अकेली। मैं लगातार उसके चेहरे और आवाज़ को अपने ज़हन में लाती रही और उस क्रुद़ध नाराज़गी की आग को हवा देती रही, जिसमें मैं जले जा रही थी। यह वैसी बीमारी की तरह था, जिसमें आप ख़ुद ही अपनी पीड़ा निर्मित करते हैं- हर सांस आप के फेफड़ों को चिथड़े कर देती है, पर उसके बावजूद आप सांस लेने को मजबूर होते हैं....
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मैं न सोने से डरती हूं, और सो जाने से भी डरती हूं। मेरे बिस्तर के बग़ल में वह ख़ाली बिस्तर, ये बेसिलवट ठंडी चादरें....मैं नींद की गोलियां लेती हूं, पर बेकार....क्योंकि मुझे सपने आ जाते हैं। सपनों में मैं अक्सर परेशानी से बेहोश हो जाती हूं। मैं निश्चल और ज़माने भर का दुख अपने चेहरे पर लिए मॉरिस की निगाहों के सामने पड़ी रहती हूं। मुझे लगता है कि वह लपककर मेरे पास आएगा। वह उदासीनता से मेरी ओर देखता है और चल देता है। मैं जाग गई, अभी भी रात थी। मैं अंधेरे के बोझ को महसूस कर सकती थी। मैं कॉरीडोर में थी, मैं तेज़ी से उसमें चली जा रही थी, और वह संकरा, और संकरा होता जा रहा था। मैं सांस नहीं ले पा रही थी। फि़लहाल मुझे उसमें रेंगना होगा और मरने तक दो दीवारों के बीच फंसे रहना होगा। मैं चिल्ला पड़ी। मैं ज़्यादा हौले से उसे पुकारने लगी, और पुकारते हुए रोने लगी। मैं उसे हर रात पुकारती हूं। उसे नहीं दूसरे को, उसे, जो मुझे प्यार करता था। और मैं सोचने लगती हूं कि क्या उसका मर जाना मुझे ज़्यादा अच्छा नहीं लगेगा...।
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शायद सबके साथ ऐसा होता है कि कहीं किसी देशकाल, संदर्भ और मनोस्थिति में किसी लिखे गए गए को पढ़ते हुए आप ठिठक जाते हैं, सोच में पड़ जाते हैं कि जो यहां लिखा दिख रहा है वह सिर्फ़ वहीं नहीं है, वह कहीं और भी है। कभी आपके इर्द-गिर्द तो कभी आपके बिल्कुल भीतर भी...जबकि आप तो वहां महज़ पाठक ही होते हैं, .फिर कैसे जुड़ते जाते हैं सारे शब्द और भाव.... हैरान ही होती हूं देखकर....।
खै़र उपरोक्त दो टुकड़े दिमाग़ में अटके थे, सिमोन वाली एक गुमशुदा औरत की डायरी से...।
Thursday, March 26, 2009
आखि़री रंग की नीलाई
ख़्वाब का दर शायद खुला रह गया था...पांव एक बार बाहर निकला और वापसी की राह धुंधला गई। बाहर की दुनिया में सात रंग थे..दिखते तभी थे जब उनपर नज़र रखो, पाबंदी इतनी कि आंखें झपक न जाएं। .उसने दोनों हाथों में भरकर उन्हें बंद कर लिया...इतना कसकर कि उड़ न सकें। पर हथेलियों को रंग छुपा सकने का हुनर कहां याद था और सीख सकने की सारी गुंजाइशों के रास्ते सपनो से होकर ही तो गुज़रते थे। आंख झपकी और पहला रंग हाथ से फिसलकर हवा में घुल गया। वो रंग के पीछे दौड़ती है...भला इस रंग का नाम क्या है...कोई बता सकेगा..? कोई बताता नहीं और एक अनचीन्ही धुन उसे खींचती है ... पांव पूरा करते हैं एक चक्कर...कोई गिन रहा है क्या..? एक और रंग फिर हाथ से छूटता है....हवा में बिखर जाने के बाद ..उसे पलकों से बुहार कर वापस हथेलियों तक लाने की सीख तो किसी ने दी ही नहीं...। रंगों की चटख़ आंखों को खुलने भी कहां देती है...।
सारंगी बजाती हुई जो छाया अभी-अभी पीछे छूटी है उस ने तो हांक लगाकर कहा था ...पांव के नीचे जब भी कांटा आए. या हाथ से छूटकर रंग उड़े तो एक बार..मुझे पुकार लेना..लेकिन पुकारने पर तो वो चुप ही रह गया...शायद अपनी धुन रहा होगा, सुन न पाया हो अपनी ही बात की प्रतिगूंज को। वो पीछे कैसे छूट गया... खु़द ही अपनी रफ़तार को धीमा क्यों कर लिया....सोच में डूबने से पहले ही रंग फिर हाथ से फिसल जाता है। बाहर की दुनिया में रंगों के बिना जीने की अनुमति है क्या...? बीन बजाती छाया से वो पूछना चाहती है...जवाब यहां भी नहीं मिलता... और आगे जाना होगा क्या..शायद वहीं तक जहां से वो आवाज आ रही है, एक रंग अब भी कसके पकड़ रखा है उसने ...लेकिन कितनी देर ।
कैसे छूटा उसके हाथ ये आखि़री रंग....नीलाई दूर तक फैली है...कुछ नज़र नहीं आता साफ़-साफ़.। कैसी .थकान है कि झुककर उन कांटों को भी नहीं निकाल पाती जिनसे पांव बिंधे हैं...। रेत पर कुछ निशान हैं...गिरे हुए रंगों के और लहूलुहान पांव के भी....रंग लगी ख़ाली हथेलियों से वो उस द्वारे को बार-बार टोह लेना चाहती है जो कहीं खो गया है....वही दर तो उसे ले जाएगा सपनों की उस दुनिया में वापस, वहां रंगहीन होने पर जी सकने की इजाज़त अब भी बाक़ी है ..।
.............................................अंदर ख़्वाब विछोड़ा होया, ख़बर न पैंदी तेरी।
सुज्जी बन विच लुट़टी साइयां, चोर शंग ने घेरी।
बुल्लेशाह कहते हैं- हम ख़्वाब में एक दूजे से बिछुड़ गए हैं, अब पता नहीं चलता कि तुम कहां हो। मेरे साईं मैं वन में अकेली लुट रही हूं, चोर-डाकुओं ने मुझे घेर रखा है।
नोट-तस्वीर में नीली रोशनी का यह जादू कै़द किया हमारे सहयोगी सुनील कैंथवास ने।
Monday, February 23, 2009
सांड, टेपचू और एक उम्मीद के बहाने
...और जब किसी मनुष्य के पास स्वप्न न रह जाएं, फैंटेसी न रहे और मिथक नष्ट हो जाएं तो वह घनघोर व्यवहारिक, यर्थाथवादी आदमी के रूप में बचा रह जाता है। स्म्रतिहीन, आध्यात्मवंचित, स्वप्नशून्य, आदर्श विरत, सपाट, चौकोर, दुनियादार, तिकड़मी, घटिया आदमी.....।
....ज्ञान अब सिर्फ़ उसकी स्म्रतियों में संग्रहीत डाटा या तथ्य भर रह गया था। पहले की तरह भावुकता, आस्था और विमूढ़ सम्मोहन अब कहीं नहीं था। वह वस्तुपरक, व्यवहारिक और निपट वास्तविकतावादी हो गया था। (उदय प्रकाश की वॉरेन हेस्टिंग्स का सांड से ली गई पंक्तियां)
दुनियादार हो जाना बुरा नहीं है लेकिन उसे निभाने के लिए तिकड़मी हो जाना अक्षम्य है , ख़ासतौर पर इंसान के संदर्भ में, जिसे बंजर ज़मीन पर सपने बीजने से लेकर, उनकी लहलहाती खेती के उल्लसित होने तक नाचते देखा हो। मैंने उसके सपनों की हरियाली बेल को सूखते और उसे स्वप्नशून्य होते भी देखा। फैंटेसी से लबालब एक जीवन को सपाट होते देखा। घोर व्यवहारिकता के जंगल में एक जिंदादिल इंसान को बेलौस दौड़ते देखा सुविधाओं और दुनियादारी के पीछे। उसके जीवन का सपाट हो जाना, दुनियादार और तिकड़मी हो जाना कितना दुखद है। एक मनुष्य का अमानुष हो जाना उससे भी ज़्यादा त्रासद लगता है। उसने बहुत जल्दी स्वीकार किया सपनों के मर जाने को, लेकिन मैं याद दिलाना चाहती हूं कि सपने कभी मरते नहीं। उनकी सूखी हुई बेल को उखाड़कर जला डालो तो भी हरे हो उठते हैं, राख बनकर हवा में घुल जाएं तो भी जिंदा रहते हैं। ये पोस्ट सपनों और उम्मीदों के नाम ही है। साथ ही हार मान बैठे उस इंसान के नाम भी जिसके पास सलामत पांव, हाथ और दिमाग़ था जबकि उसने कहा कि मैं थक कर गिर चुका हूं हमेशा के लिए।
हां, मुझे बिल्कुल मंजूर नहीं है जिंदगी को इस तरह सपाट कर लेना। ऊबड़-खाबड़ और पथरीली जिंदगी पर बार-बार जख़्मी होना, थककर गिर जाना मैं बेहतर समझती हूं। मैं खिलाफ़ हूं इस तरह दुनियादार हो जाने के। मुझे तकलीफ़ होगी उस बैल को देखकर जो दो वक़्त का चारा आराम से खा सकने के लिए जीवन भ्ार आंख के आसपास लगे उस पतरे को सहता रहता है जो उसे एक ही दिशा में देखने की इजाज़त देता है। मैं उस बिगड़ैल सांड के पक्ष में हूं जो इम्पीरियल बग्घी को चकनाचूर कर देता है, बिना इस बात की परवाह किए कि उसे इम्पीरियल आर्मी की टुकड़ी गोली मार देगी। बख्शा नहीं जाएगा।
मैं इंसान बने रहना चाहती हूं इसीलिए मुझे यक़ीन है सांड के जिंदा होने पर, टेपचू के पोस्टमार्टम के वक़्त आंख खोलकर देखने पर और उस उम्मीद पर जो पूरी तरह टूट चुकी हो, चूर-चूर होकर रेत हो चुकी हो लेकिन थकी आंखों के झपकने से पहले ही पूरी की पूरी आपके सामने आकर जिंदा हो जाए। मैं कायल हूं ऐसी उम्मीद की जो कभी मरती नहीं, किसी भी स्थिति में हार नहीं मानती और परिस्थितियों को पूरा मौका देती है अपना दम-ख़म आज़मा लेने का। उम्मीद को कोई कैंसर कहे, जिन्न कहे, हारी हुई बाज़ी कहे या फिर रेत में मुंह छिपा लेने की आदत ...मैं नहीं मान सकती कि उम्मीद की मौत कभी होती है। वो तो जि़दा रहती है बेड़ा ग़र्क हो जाए तो भी।
नोट- ठीक एक साल पहले आज के दिन खू़ब सर्दी थी और अवसाद भी। मैं दफ़तर से पंजाब यूनिवर्सिटी तक पैदल ही चली गई थी। एक वादा पूरा करना था जो कुछ माह पहले हमने इंडियन थिएटर डिपार्टमेंट के प्रोफेसर जी कुमारवर्मा से किया था, जब वे उदयप्रकाश की कहानी वॉरेन हेस्टिंग्स का सांड पर नाटक करने के शुरुआती प्रोसेस में थे। बाद में हमने इस बात को भुला दिया लेकिन प्रोफेसर को याद रहा। एक दिन उनका फ़ोन आया कि नाटक देखने ज़रूर आएं। नाटक तभी देखा था और टेपचू कहानी बाद में पढ़ी। मैंने इन दोनों क्रतियों में जिस चीज़ को बहुत गहरे तक महसूस किया वह है ऐसी उम्मीद का हर हाल में जिंदा रह जाना जो इंसान के मर जाने पर भी मरती नहीं। फरवरी की उस शाम मैं मर सकने लायक उदास थी लेकिन नाटक देखने के बाद मुझे अपनी उम्मीद का पता मिल गया था।
Saturday, February 21, 2009
वो क्यों नहीं किसी के साथ भाग जाती....
मुझे सचमुच इस चीज़ से फ़र्क नहीं पड़ता कि उसे कैसा लगता है मेरे बिना...खा़सतौर पर मैं उन दिनों से सीधे-सीधे आंख बचाकर निकल जाता हूं जिन पर हमने अपने नाम लिखकर उड़ा दिए थे। मैं वाकई नहीं जानना चाहता कि उड़ते रहने वाले वे दिन जब उसकी आंखों में उतर कर धुंआं घोलते हैं कि कितनी कड़वाहट होती है, दरअसल मैं उसकी तरफ़ देखता ही नहीं। क्यों देखूं जबकि मुझे पता है कि न देखने की क़सम मैंने ही खाई है, और क्यों फिर जाऊं अपनी क़सम से जबकि मुझे पता है कि इससे मेरी जि़दगी में कितना आराम आया है। कवि होने का यह अर्थ तो हरगिज़ नहीं निकाला जाना चाहिए कि सारी चिरकुटई की जि़म्मेदारी मैंने ही ली है, अरे जिसे जो महसूस करना है करे, मैं तो अपनी जिंदगी को ठीक करना चाहता हूं, कर भी रहा हूं।
ये वेलेंटाइन-डे था और मैं उस सारी मनहूसियत का सामना नहीं करना चाहता था जो उसके चेहरे से बरसती रहती है, तो भी मेरा रास्ता काटकर ही गई न। बाद में हरे कांच से बाहर झांकती रही शायद ये सोचकर कि मैं उसे देख रहा हूं। मेरा ईश्वर जानता है कि मैंने एक बार नज़र भर कर उसकी तरफ़ नहीं देखा लेकिन वो शायद मुझे चिढ़ा देना चाहती थी, तभी तो वही झुमके पहनकर आई थी जो मैंने अपनी मूर्खता की पराकाष्ठा को छूते हुए उसे लाकर दिए थे। अब कितनी कोफ़त होती है ये सोचकर कि मैंने झुमके ख़रीदने के लिए अपनी बीवी का क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल किया, जबकि घर में लंबे समय से इस बात को लेकर तकरार थी कि मैं घरवाली के लिए कोई तोहफ़ा लाता ही नहीं। कवि हूं तो क्या इस शर्मिंदगी को महसूस करना भी बंद कर दूं कि जीवन का एक पहला वेलेंटाइन वही था जब मैंने अपनी पत्नी के अलावा किसी और को गुलाब का फूल भी लाकर दिया था।
कितने बरस गुज़र गए लेकिन हर साल इस दिन अब भी घर में उस ग़लती के लिए ताना सुनना पड़ता है और काम पर आओ तो ये बेवकूफ़ औरत हमेशा अपना बेसुरा प्रेमगीत अलापती घूमती है। मैं सचमुच इस सब से ऊब चुका हूं, ये औरत कहीं चली क्यों नहीं जाती....क्यों नहीं किसी और के प्रेम में पड़ जाती, क्यों नहीं किसी के साथ भाग जाती, क्यों मेरे प्रेम को माथे पर इश्तेहार की तरह चिपकाए घूमती है, बिना ये सोचे कि मुझे कितनी परेशानी होती है इस ख़याल से भी कि कभी मैंने उसी माथे को चूमकर कुछ कहा था। मैं सचमुच चाहता हूं कि वो बेवफ़ा हो जाए, मैं उसे किसी के साथ इस तरह देख लूं कि उसे सरे राह दो झापड़ रसीद कर सकूं.... रंगे हाथों इस तरह धर दबोचूं कि वो मिमियाकर, दुम दबाकर मेरे सामने से हमेशा के लिए दफ़ा हो जाए। कुछ ऐसा देख लेना चाहता हूं कि दोस्तों के बीच खड़े होकर उसे चार गालियां दे सकूं....मैं सचमुच चाहता हूं कि वो मुझे धोखा दे दे....सचमुच का धोखा।
-एक डायरी se..
ये वेलेंटाइन-डे था और मैं उस सारी मनहूसियत का सामना नहीं करना चाहता था जो उसके चेहरे से बरसती रहती है, तो भी मेरा रास्ता काटकर ही गई न। बाद में हरे कांच से बाहर झांकती रही शायद ये सोचकर कि मैं उसे देख रहा हूं। मेरा ईश्वर जानता है कि मैंने एक बार नज़र भर कर उसकी तरफ़ नहीं देखा लेकिन वो शायद मुझे चिढ़ा देना चाहती थी, तभी तो वही झुमके पहनकर आई थी जो मैंने अपनी मूर्खता की पराकाष्ठा को छूते हुए उसे लाकर दिए थे। अब कितनी कोफ़त होती है ये सोचकर कि मैंने झुमके ख़रीदने के लिए अपनी बीवी का क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल किया, जबकि घर में लंबे समय से इस बात को लेकर तकरार थी कि मैं घरवाली के लिए कोई तोहफ़ा लाता ही नहीं। कवि हूं तो क्या इस शर्मिंदगी को महसूस करना भी बंद कर दूं कि जीवन का एक पहला वेलेंटाइन वही था जब मैंने अपनी पत्नी के अलावा किसी और को गुलाब का फूल भी लाकर दिया था।
कितने बरस गुज़र गए लेकिन हर साल इस दिन अब भी घर में उस ग़लती के लिए ताना सुनना पड़ता है और काम पर आओ तो ये बेवकूफ़ औरत हमेशा अपना बेसुरा प्रेमगीत अलापती घूमती है। मैं सचमुच इस सब से ऊब चुका हूं, ये औरत कहीं चली क्यों नहीं जाती....क्यों नहीं किसी और के प्रेम में पड़ जाती, क्यों नहीं किसी के साथ भाग जाती, क्यों मेरे प्रेम को माथे पर इश्तेहार की तरह चिपकाए घूमती है, बिना ये सोचे कि मुझे कितनी परेशानी होती है इस ख़याल से भी कि कभी मैंने उसी माथे को चूमकर कुछ कहा था। मैं सचमुच चाहता हूं कि वो बेवफ़ा हो जाए, मैं उसे किसी के साथ इस तरह देख लूं कि उसे सरे राह दो झापड़ रसीद कर सकूं.... रंगे हाथों इस तरह धर दबोचूं कि वो मिमियाकर, दुम दबाकर मेरे सामने से हमेशा के लिए दफ़ा हो जाए। कुछ ऐसा देख लेना चाहता हूं कि दोस्तों के बीच खड़े होकर उसे चार गालियां दे सकूं....मैं सचमुच चाहता हूं कि वो मुझे धोखा दे दे....सचमुच का धोखा।
-एक डायरी se..
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